कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्वसमवेदबोध
( १२१ )
कहा तुमार जीव नहीं माने । हमरी दिशभै वाद बखानै ॥ मैं हठ फंदा रच्यौ बनाई । जामें जीव परा अरुझाई ॥ वेद शास्त्र सुमिरन गुन नाना । पुत्र हैं तीन देव परधाना ॥ देवल देव पखान पुजार्ह । तीरथ व्रत जप तप मन लाई ॥ यज्ञ होम अरु नियम अचारा । और अनेक फंद हम डारा ॥ जौ ज्ञानी जैहो संसारा । जीव न माने कहा तुमारा ॥
ज्ञानी वचन-चौपाई
ज्ञानी कहै सुनो धर्मराई । काटो फंद जीव ले जाई ॥ जेतो फंद रची तुम बारी । सत्यशब्द ले सकल विडारी ॥ जिहि जिवको हम शब्द हटै हैं । फंद तुम्हार सबै सुतैहैं ॥
निरंजन वचन चौपाई
सतयुग त्रेता द्वापर माहीं । तीनों युग जिव थोरे रहिजाही ॥ चौथा युग जब कलऊ आई । तब तुव शरण जीव बहु जाई ॥ ऐसे वचन हारि मोहि दीजै । तब संसार गौन तुम कीजै ॥
ज्ञानी वचन चौपाई
अरे काल परंपंच पसारा । तीनो युग जीवन दुख डारा ॥ बिनती तोरि लीन मैं मानी । मोकहैं ठगे काल अभिमानी ॥ चौथा युग जब कलऊ आई । तब हम अपनो अंश पठाई ॥ काल फन्द छूटे नर लोई । सकल सृष्टि परवानिक होई ॥ घर घर देखो बोध विचारा । सत्य नाम सब ठोर उचारा ॥ पांच हजार पांचसौ पांचा । तब यह वचन होयगा सांचा ॥ कलियुग बीत जाय जब येता । सब जिव परम पुरुषपद चेता ॥
निरंजन वचन चौपाई
ज्ञानी बिनती सुनो हमारी । द्वापर अंत होय जिहि बारी ॥ बोध शरीर धरब हम जाई । जगन्नाथको नाम धराई ॥