भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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स्वसमवेवबोध

( ११७ )

चौपाई

छन यक जीवनको सुख दैऊ । जिव बँध मेटि पुरुषपहँ गेऊ ॥

अथ जीवमुक्तावन हेत सत्य कबीरको संसारमें आगमन कथा—चौपाई

यहि विधि काल जक्त धरि खायौ । जिव नहिं कोई मुक्तिपद पायौ ॥

तीनों पुर पसरा यमजाला । सकल जीव कहँ कीन बिहाला ॥

कालके करते जीव न छूटे । बहुविधि योगयुक्तिमें जूटे ॥

विनशत शब्द न जीव उवारा । तब समरथ अस वचन उचारा ॥

सत्य पुरुष वचन—चौपाई

कैल सकल जग बारचौ खाई । एको जीव लोक नहिं आई ॥

तातै समरथ मोहि फरमाई । साँचे जीव आन मुक्ताई ॥

पुरुष वचन कीने तिहि बारा । ज्ञानी बेगि जाहु संसारा ॥

प्रथमहि चलयौ जीवके काजा । पुरुष प्रताप शीस पर छाजा ॥

सतयुग सत्य सुकृत मोर नाऊँ । आज्ञा पुरुष जीव बर आऊँ ॥

करि परनाम तब पगधारा । पहुँच्यौ आय धर्म दरबारा ॥

द्रीप झांझरी नाम बखानी । कैल पुरुषकी सो रजधानी ॥

पगके देत झांझरी गाजा । कैल पुरुष बैठा तहँ राजा ॥

गये झांझरी द्रीप मँजारा । गर्बित काल न बुद्धि विचारा ॥

मोकहँ देखि धर्म ढिग आई । महाक्रोध बोले अतुराई ॥

योगजीत इहवाँ कस आवो । सो तुम हमसे वचन सुनावो ॥

योगजीत वचन—चौपाई

तासो कह्यौ सुनो धर्मराई । जीवकाज संसार सिधाई ॥

तुम तो कष्ट जिवनको दीना । तबहि पुरुष मोहि आज्ञा कीना ॥

जीव चिताय लोक ले आवो । काल कष्टते जीव छोड़ावो ॥

ताते मैं संसारहि आवो । देय परवाना लोक पठावो ॥

अथ कालपुरुष और सत्यकबीरका युद्धवर्णन—चौपाई

काल क्रोध करि वचन उचारा । भवसागरमें राज हमारा ॥