कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
रामचन्द्र वन भये दुखारी । तबहिं मुनींद्र तहाँ पग धारी ॥ योग युक्ति रघुपतिहि दृढ़ाई । बहुविधि ताकहैं शांति धराई ॥ जब मुनींद्रजी दायो कीने । सेत बांधि लंका पग दीने ॥ मन संशय कीने हनुमाना । सतगुरु कृपा लह्यौ दृढ़ ज्ञाना ॥ गरुड़ जो परम प्रेमते ध्याये । परम हंसकी पदवी पाये ॥ यहि बिधि केते जीव चेतार्ई । तब मुनींद्र निज लोक सिधार्ई । पहुँचे हंस पुरुष दरबारा । दरस पाय दुख हंस विदारा ॥ कछुक दिवसजबयहिबिधि बीते । त्रेता गत द्वापर तब थीते ॥
इति त्रेतायुगवृत्तान्त
अथ द्वापर युगमें मुनींद्रजीको पृथ्वीमें आगमन कथा और करुणामय स्वामी नामधारन और जवतजीव तारन--बोपाई
पुरुष अवाज भई तेहि बारा । ज्ञानी बेगि जाहु संसारा ॥ परम पुरुष कह शीस नवाई । महि मंडल मुनींद्र चलि आई ॥ जो प्रभु आहि नाम अरु नामी । द्वापर कह करुणामय स्वामी ॥ प्रथमहि जब भूलोक सिधारे । गढ गिरनार तहाँ पग धारे ॥ चंद्रविजय नृप नाम बखानी । गढ गिरनार तासु रजधानी ॥ परम भक्ति मय ताकी रानी । इंद्रमती तेहि नाम बखानी ॥ साधुसे परम प्रीति सो धारे । नित साधुनकी बाट निहारे ॥ साधुको जहाँ कहुँ आवत हेरे । नित आपने ढिग सो टरे ॥ परम प्रीतिसे सेवा धारे । तन मन धन साधुनपर वारे ॥ तासु प्रीतिकी रीति बिचारी । करुणामय स्वामी पग धारी ॥ जात चले तेहि मारग माहीं । रानीको मंदिर रह जाहीं ॥ देखे रानी चढ़ी अटारी । साधु जानि हरषित भइ भारी ॥ त्वरित पठायौ तहाँ निज चेरी । बेगि साधुको आनहु टेरी ॥ वृषली चलि हमकहैं शिर नावा । रानीको संदेश सुनावा ॥