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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

क्रोध और क्षमाका युद्ध

(८२)

विवेकसागर

तामस तेज नाम तोहि कुद्धा । करु विवेक ज्ञानसो युद्धा ॥ कई अस प्रबल तोहि को सहै । तोरे तेज ज्ञान कई रहै ॥ वह सुनि कोध चला ससुहाई । करी गवन पहुँचा रन आई ॥ तनमें आइ कियो परवेशा । छाँडो ज्ञान हमारो देशा ॥ जो तुम निश्चय जीतो कामा । तो अब मोसों करो संग्रामा ॥ यह सुनि ज्ञान अचम्भित भयऊ । जाइ विवेक राइ सों कहेऊ ॥ राजा तब यक मंत्र विचारचो । जेहि विधि प्रबल क्रोध को मारचो ॥ साखी-यह अति क्रोध प्रचण्ड है, कोपि करै भयमंत ॥ सुधि बुधि धीरज ना रहै, जब यह कोपि चंढंत ॥

चौपाई

तब राजा मंत्रिन सो कहै । प्रबल क्रोध क्यहि कारण दहै ॥ तब सबहि मिलि मंत्र विचारा । यह तो जाय क्षमा ते मारा ॥ बोलि विवेक क्षमा सो कहै । तुम तो जाइ क्रोध रन बहै ॥ भक्ति ज्ञान तेहि देह सहाई । प्रबल क्रोध को मारो जाई ॥ यहि सुनि क्षमा रोपे रन आर्या । लीन्हो शील जो धनुष चढायी ॥

क्रोध और क्षमा का युद्ध

देखि क्षमा क्रोध चले धायी । मनसा भूमि रोप्यो रन आयी ॥ सुनो क्षमा क्रोध संग्रामा । लरही दोउ जुझै संग्रामा ॥ उतते क्रोध उठे रन कोपी । इतते क्षमा रहै रण रोपी ॥ मारन क्रोध उठे जब धायी । इतते क्षमा दीन्ह मुसकायी ॥ क्रोध आन तब गारी दयी । सुनि क्षमा अन बोली भयी ॥ मीठे वचन क्षमा अति बोलै । कोपै क्रोध पवन ज्यों डोलै ॥ क्षमा से अग्नि शितल है जाई । जैसे जलमें अग्नि बुझाई ॥ यहि विधि क्रोध क्षमा सो भिरई । मानहु अँगार पानिमहँ परई ॥

साखी-भलो भलो सब कोई कहै, रहि गइ क्षमा दुहाइ ॥

कहैं कबीर शीतल भये, गयी सो अग्नि बुझाइ ॥

विवेकसागर

( ८३ )

चौपाई

क्रोध जरनते गयऊ बुझायी । राजा मोह समाचार तब पायी॥ बहुते मन मँहँ कीन्ह पछिताई । सकल सैन को लिये बुलाई ॥ हारचो क्रोध काम जब जाना । महा मोह राजा डर माना ॥ चकित मोह मन्त्री हँकरावा । सम्मुख मोह विवेक डरावा ॥ लोभ मन्त्री आय भये ठाढा । देखत राव छोभ अति बाढा ॥ तब लोभ मोहहि माथ नवाई । कहु राजा मोहि काहे बुलाई ॥ जबलगि अहै मोह रणधीरा । तब लग काहे होहु अधीरा ॥ जबलग प्रबल मोह है आगे । तब लग कहा ज्ञान कह जागे ॥ महा मोह राजा सुनु बैना । जबलगिहौं तबलगि सब सैना ॥ जबलगिहौं तब लगि आही । मोरे गये सबै मिटि जाही ॥ हौं निज सर्व पापका मूला । मोरे ते तुम रहत हो फूला ॥ जीतौं ज्ञान विवेक हि जायी । देश आपनो लेउ छुडायी ॥ तो कहँ फिर मैं दैहौं राजू । महामोह मोरे बल गाजू ॥ यह सुनि हर्ष मोह मन भयऊ । तत्क्षण लोभको आयसु दयऊ ॥ मोह कहै दैहौं सब राजू । तबही लोभ रणै मँहँ गाजू ॥ जबही मोह लोभहि कहेऊ । देई बीरा आयसु दयऊ ॥ बाचा बन्ध राजा जब भयऊ । तबही लोभ रण कहँ गयऊ ॥ जाई रण दियो लोभ हँकारा । ज्ञान तुम का करहु तक़रारा ॥ हम बन्दोबस्त कियो परवेशा । छोडहु ज्ञान हमारो देशा ॥ तजहु ज्ञान तुम हमरो ठाकं । मैं प्रचण्ड लोभ मोर नाकं ॥ अब मैं रनमहँ अग्नि परजारी । करि बल एक एक कै मारौं ॥ चिन्ता शक्ति पापको मूला । कोउ न जाने मम डर भूला ॥ आशा तृष्णा तहां अति बहे । सुनत ज्ञान तहां नहि रहै ॥ नहि जानो तुम क्रोध औ कामा । हौं अति प्रबल लोभ मोहि नामा ॥

लोभ और संतोषका युद्ध

( ८४ )

विवेकसागर

छांडहु ज्ञान हमारो ठाऊं । नहिं तो तोहि धरि धरि खाऊं ॥ यह सुनिज्ञान मन्त्रयक ठयऊं । फिर विवेक राजा पहुँ गयऊं ॥ राजा मन्त्र करो ठहराई । लोभ न मोपै जीतो जायी ॥ जो तुम लोभ जीतौ आजू । तौ तुम करो निकंटक राजू ॥ तब बोले मन्त्री प्रकाशा । यहि बिधि होई लोभको नाशा ॥ राजा मन्त्र कियो मन चाही । पुत्र तुम्हारो जीते याही ॥ सो सन्तोष कुवरकर नामा । सो निश्चय जीते संग्रामा ॥ तब राजा बोले सन्तोखा । लोभै जीतौ मिटै सब धोखा ॥ भक्ति ज्ञान तोहि देहुँ सहाई । प्रबल लोभ कहँ जीतहु जाई ॥

लोभ और सन्तोषका युद्ध

इत भौ लोभ उत भौ सन्तोषा । मनसा भूमि उठचो रन रोषा ॥ लालच बाण लोभ संचारा । क्षमा बाण सन्तोष तेहि मारा ॥ लोभ चलावै धनुष कहँ खैंची । सन्तोष लीन्ह सुमिरनकी ऐंची ॥ चिता शक्ति लोभ पठायी । ज्ञान शक्तिसो निष्फल जायी ॥ अतिदुखफांसीलोभ कर लयऊ । उग्र ज्ञान सन्तोष मिटैऊ ॥ परम सन्ताप लोभ कर लयऊ । सोदया खङ्ग ते निष्फलगयऊ ॥ अचेत शक्ति लोभ चलाई । जागृत शक्ति सन्तोष पठाई ॥ लोभ कहै पैसा तुम लहिये । सन्तोष कहै कहु नहिं चहिये ॥ लोभ कहे नीको है रूपा । सन्तोष कहै छाडि गय भूपा ॥ लोभ कहे लेव कंचन मोरा । सन्तोष कहे जीवन है थोरा ॥ लोभ कहे घोडा जोडा नीका । सन्तोष कहै कारज नहिं जीका ॥ लोभ कहै हीरा ल्यो लालू । सन्तोष कहे संग नहीं चालू ॥ सांच धनुष कर महि धयऊ । चपल लोभ चापि दल गयऊ ॥ उदासी शक्ति उरमैं उपजायी । कंध्यो लोभ ज्यों विष खायी ॥ धीरज खङ्ग गह्यो सन्तोखा । बिचल्यो लोभ मिटचो सब धोखा ॥

विवेकसागर

(८५)

सारखी-काम क्रोध विचले, विचले लोभ अकाज ॥ महामोह मनमहँ झखे, गयो हमारो राज ॥ काम क्रोध दोऊ गये, गये लोभ दल भाज ॥ दया क्षमा सन्तोष बल, रहै विवेक सो गाज ॥

चौपाई

मोह बुलायि गर्ब सन कहेऊ । विचलो सबै एक तुम रहेऊ ॥ अब मेरो तुम करो सहाऊ । मोरे संग गर्ब उठि धाऊ ॥ ज्ञान विवेकको मारि भगावें । जप तप साधन मारि सब लावें ॥ बोले गर्ब मोह ते तबहों । का बिसात विवेक की अहहों ॥ मेरो हँकार फिरे जेहि देशा । रहै न ज्ञान विचारको लेशा ॥ बाकी सैन रहे सब जोही । लीन्ह बुलाय मोह तब ओही ॥ लीन्ह सजाय सैन बहु रंगी । मोह गर्ब चढे एकसंगी ॥ मोह दल जब पहुँचे रणमाहीं । खबर भयो विवेक पहुँ ताहीं ॥ सज्यो सेन तब बहु समुदाई । होय निशंक चले रण भाई ॥ उतते मोह रण रंग मचावा । इत विवेक राजा चढि आवा ॥

सारखी-दोउ दल चढि ठाढे भये, मनमें भये निर्वित ॥ कहे कबीर विचारिकै, डरे मोह मदमन्द ॥

चौपाई

देख्यो गर्ब मोह सकाना । करी क्रोध बाण संधाना ॥ बहु बडाइ सो बोलन लाग्यो । ज्ञान विवेक कहाँ अब भाग्यो ॥ आवे सन्मुख मोसे सब काहू । सुनत वचन माह उत्साहू ॥ बेसुध बाण गर्ब तब धारा । उतते चैतन बाण सम्भारा ॥ बल करि गर्ब उठे समुदाई । तबहिँ खवास गयो ठहराई ॥ उग्रज्ञान राजा पहुँ गयऊ । गर्ब गँवार हठ अति भयऊ ॥ राजा मोकहँ आयसु देहू । कौन बाण ते मारी एहू ॥

न. ३ कबीरसागर - ५

( ८६ )

विवेकसागर

दीन तब बाण राजा कर लयऊ । हित कै उग्र ज्ञान कहि दयऊ ॥ मारच्यो ज्ञान दीन तेहि बाना । हारच्यो गर्व लाग्यो विरहाना ॥ हारच्यो गर्व राजा जब जाना । तब निज गयो अपनपौ माना ॥

साखी-गर्व सुये विकल होई, चले आप रणमाहि ॥

मनही मन पछतावई, मोर कुशल अब नाहिं ॥

चौपाई

सुन्यो मोह चल्यो गलगाजी । जीतन विवेक चला दल साजी ॥ पहुँची रण अस बोलै मोहा । कहाँ विवेक आजु मम सोहा ॥ महा मोह राय मम नामा । सहो ज्ञान मोरो संग्रामा ॥ सबै उमराव गयो हरायी । अब नहिं होई तोर कुशलार्ई ॥ मैं बाण चलाओं जबहीं । क्षणमहँ होहु नाश तुम तबहीं ॥ कहै विवेक बड़का हाको । करो लडाई नाशहि ताको ॥ सुनत मोह क्रोध तब कीन्हा । धनुष उठाय कर गहि लीन्हा ॥ ममता बाण तबहीं ताना । विचित्र बाण विवेक संधाना ॥ आलस शक्ति मोह उपजाई । चैतन शक्ति विवेक चलाई ॥ अमण चक्र मोह गहि डारा । चैतन चक्र विवेक पसारा ॥ अनर्थ खड़ मोह लियऊ । अर्थ खड़ ते निरफल गयऊ ॥ निद्रा शक्ति मोह संचारी । जाग्रत शक्ति विवेक तहँ मारी ॥ मोहफांस माया विस्तारी । विवेक विचार छिनक महँ टारी ॥ उपजायो तब मोह अंधेरा । हँसे विवेक यहै बल तेरा ॥ प्रकाश बाण विवेक चलयऊ । ततक्षण अंधकार मिटि गयऊ ॥ सत्यबाण विवेक संचारा । असत खवास मोह कहँ मारा ॥ ज्ञान बाण विवेक जब छाडा । मूर्छित मोह महारथ पाडा ॥ करि विवेक मोह तज दीढी । विचल्यो मोह हृदय गौ पीढी ॥ विचल्यो मोह दशहू दिशि गयऊ । सुपथ सकल द्रन्द मिटि गयऊ ॥

विवेकसागर

( ८७ )

साखी-कहै कबीर विवेक दल, अटल ज्ञान दल गाज ॥

अब तो निर्मल होगये, गये मोह दल भाज ॥

सुनहु धर्मनि सत्य विचारा । विना विवेक नहिं उतरे पारा ॥ विना विवेक काल धर खाई । धरि धरि मारे काल कसाई ॥ काल दूत जग फिरे फिरावै । मोह सैन की वृद्धि करावै ॥ जेत महातम जग महाँ होई । काल फन्द जानहु सब सोई ॥ विवेक ही न जीव जग जेते । सुनि सुनि धाय धाय तेहिलेते ॥ विना विवेक पारख नहिं पावै । झूठी आश लगी सो धावै ॥ विना विवेकन न चीन्हे सोई । काल दयाल दोऊ कस होई ॥ विना विवेक काल गुण गावै । बार बार भौ चक्कर जावै ॥ सतगुरु उपदेश जब देही । काल जाल छुडावन लेही ॥ विवेक सागर जो सुनै सुनावै । करै विचार परम पद पावै ॥ निर्मल बुधि अटल गुण गावै । सो हँसा भवजल नहिं आवै ॥ मोह विवेक लड़ाई भारुयो । छुडावन मोह पक्ष नहिं राख्यो ॥

साखी-यह विवेक सागरकथा, करे श्रवण मन लाइ ॥

अद्वुत ज्ञान प्रकाश तेहि, जियत मोक्ष फल पाइ ॥

कहै कबीर धर्मदाससों निर्मल ज्ञान विवेक ॥

जाहि सुने सुख ऊपजे, संशय रहै न नेक ॥

इति श्रीविवेकसागर समाप्त

मोह और विवेककी कथा - धर्मदासजीका प्रश्न

सत्यनाम

अथ हंसमुक्तावली

अन्तर्गत

मोह और विवेककी कथा सटीक

धर्मदास वचन

धरमदास विनयकरि गुरुपदपंकज गहे ॥ हो प्रभु होहु दयाल दास चित अतिहि दहे ॥ मन स्थिर नहि राजत पल प्रति संधना ॥ कैसे मन थिर होय कहो जग वन्दना ॥

टीका—एक समयके विषय जब कबीर साहब और गुरु धर्मदास साहब दोनोंही प्रसन्नचित्त सत्संगमें मगन थे उस समय मनके प्रसंग पड़ने पर कबीर साहबने कहा कि मनको स्थिर कर गुरुकी वाणी में लौ लगाकर पारख करनेसे सत्य पद की प्राप्ति होती है।

इतने वचनको सुनकर गुरु धर्मदासजीने सतगुरुके चरणको पकड़कर बहुत अधीनतासे विनय किया कि, हे भगवन् ! हे प्रभु ! मुझ दासका चित्त सदाही चिन्ता से दहन हुआ करता है। चित्त किस लिये दहन होता है इस प्रश्न के उपस्थित होनेपर कहते हैं कि, हे प्रभु ! आपने कहा कि, मनको स्थिर कर गुरुके शब्दमें लौ लगा, सो मन तो पलमात्र भी स्थिर नहीं होता है, यह मन जिस प्रकारसे स्थिर होकर आपके चरण-कमलोंमें लग जावे सो मुझसे कहिये। हे प्रभो ! आप समस्त जगत्के पूज्य और वन्दनीय हो, आप के विना मेरे चित्तका दुःख कोई भी छुड़ानेको समर्थ नहीं है।

कबीरसाहबका उत्तर

विवेकसागर

( ८९ )

गुरु धर्मदासजीके ऐसे विनय पूर्वक जिज्ञासाको सुनकर सद्गुरु कबीर साहब कहने लगे कि,

सद्गुरुकबीर वचन

सुनो धर्मदास यह भेद बूझे बनिआवई ॥ सद्गुरु कहै समतूल थितै जब पावई ॥

टीका—हे धर्मदास ! यह मन स्थिर करनेकी युक्ति जो तुमने पूछी सो बूझनेसेही बन आती है, किन्तु मनुष्यको इसकी समझ कब पड़ती है जब कि, एक तो सद्गुरुभी पूर्णरीतिसे स्पष्ट समझाने वाला हो और दूसरे शिष्य अधिकारी हो । समझनेकी योग्यता के साथ २ गुरु में सच्ची श्रद्धा रखनेवाला हो । ऐसे गुरु शिष्य जब एकत्र होवें तब शिष्यको थिरता मिलती है और मन भी शान्त होता है ।

यहां तो दोनों सत्य कबीर जैसे गुरु और धर्मदासजी जैसे शिष्य हैं इस कारणसे सद्गुरुने सैनसे यह दिखाया कि यहाँ पर सब सामग्री यथास्थितिइकट्ठी हैं । इसी कारणसे सद्गुरुने विशेषकर न कहकर मनविरोधका मार्ग ( राजयोग ) कहना आरम्भ किया ।

मन राजा अति दारुण तेहि दोय अंगना ॥

एक कहेउ प्रवृति अतिहिं तेहि रंगना ॥

टीका—सद्गुरु कबीर साहब कहते हैं हे धर्मदास ! यह मन इस शरीररूपी नगरका राजा है राजा भी ऐसा वैसा नहीं बहुत दारुण अर्थात् भीषम अर्थात् भयंकर है । तहां श्री अनाथदास- जीकृत प्रबोधचन्द्रोदय नाटकमें मनकी उत्पत्ती इस प्रकार लिखी हैं ।

प्रवृत्ति वंश वर्णन

(९०)

विवेकसागर

दोहा-निर्विकल्प व्यापक सकल, साखी सर्व असंग ॥ सर्वरूप सबते परे, सबविधि जान अभंग ॥ आदि पुरुष सर्वज्ञ अज, पूरण रूप अनन्त ॥ यही भांति हरि नित्त हैं, नेति वेद गावन्त ॥ त्रिगुण नियन्ता ईश जो, सत चित सदा निवृत्त ॥ ताकी इच्छा मात्रही, बल पायो प्राकृत ॥ प्रकृति पुरुष संयोगते, प्रगट भयो मन भूप ॥ संकल्प विकल्प दोष उठे तेमन शक्ति अत्रूप ॥ मन माया विस्मृति कियो, नाम विचित्रा तासु ॥ आच्छादन कर पुरुषको, विलसे देह विलासु ॥ मन माया बहु छल कियो, कीन्हो बहु विस्तार ॥ सुगति गयी निजरूपकी, प्रगटचो तन हंकार ॥

इस प्रकारसे इस मनकी उत्पत्ति हुई ।

सद्गुरु कहते हैं हे धर्मदास ! शरी को इस भयानक राजा मनकी दो स्त्रियाँ हैं तिनमेंसे एक प्रवृत्ति है । जिसमें यह मन बहुत ही राग को प्राप्त हुआ है, अर्थात् उसके साथ अत्यन्त स्नेह करता है ।

प्रवृत्तिवंशवर्णन

महामोह तेहि सम्भव सुत अति लायका ॥ गर्व अति बलवान विजय रण शायका ॥ महाकोध अनुजै तेहि निकट अघोरता ॥ लोभ संगेतहि ठाढ आशा अधिक कठोरता ॥ तृष्णा वीर महाबलि अखिल संचारई ॥ को बांचे मेरी घात सो ऐसो विचारई ॥

विवेकसागर

(११)

जडता ताहि सखी संग मनकहँ राचई ॥ अहनिशि करत कोलाहल उमैं ना छाजई ॥

टीका-मनकी प्रवृत्ति स्त्री है उसके पुत्रोंको बतलाते हैं, हे धर्मदास ! उस प्रवृत्तिको सबसे बड़ा और योग्यपुत्र मोह उत्पन्न हुआ है । और दूसरा उनका गर्व महाबलवान और प्रवृत्ति की रक्षा करनेमें महा योद्धा रणबांकुरा है । महामोहका तीसरा भाई अर्थात् प्रवृत्तिका तीसरा पुत्र काम है और चौथा क्रोध है । ये दोनों बहुत ही मलीनता से पूर्ण हैं । मोहका पांचवाँ भाई और प्रवृत्तिका पांचवाँ पुत्र लोभ है जिसके साथ आशा और कठोरता दो बहिन रहती हैं । और तृष्णा वीरा भी उनके साथ है, वह महाबलवान है सर्वमें उसका संचार है, वह अपने मनमें ऐसा गर्व रखती है कि मुझसे कोई भी बच नहीं सकता । और जडता भी उसी तृष्णा के साथ रहती है जो मनको अत्यन्त प्यारी है । मनकी अत्यन्त प्रीति के कारण वह जडता सदा कोलाहल करती रहती है अर्थात् सदा द्रन्द्व उठाया करती है ।

यद्यपि इस ग्रन्थ में प्रवृत्ति की संतानके वर्णन करनेमें बहुत कुछ भूल हुई है क्योंकि तृष्णा जो स्त्रीलिंग शब्द है उसको पुँछिंग करके लिखा है और हंसमुक्तावलीके प्रसिद्ध टीकाकार श्रीभजनदासजीकी टीकामें भी ऐसा भूल पायी जाती है, तथापि यदि यह मानलिया जावे कि यह भूल ग्रन्थकर्ता और टीकाकारकी है सो ठीक नहीं है, क्योंकि वर्तमान कबीरपंथ के साहित्य भंडार में बहुत परिश्रम करनेपर भी जब एक भी ग्रन्थ लेखक भट्टाचार्य्योंकी कृपासे शुद्ध नहीं मिलता है तब ग्रन्थकार अथवा टीकाकारके ऊपर दोष कदापि नहीं आ सकता । इस कारण मूल प्रबोधच-

मोह परिवार

( ९२ )

विवेकसागर

न्द्रोदयनाटक जिसके आधारपर यह मोह और विवेकके युद्धकी कथा प्रचलित हुई है, उसके अनुसार प्रवृत्तिकी सन्तानका वर्णन नीचे लिखता हूँ। देखो श्रीअनाथदासजीकृत प्रबोधचन्द्रोदयनाटक—

दोहा-त्रिया युगल मनभूपके, तिन ढिग सब संपत्ति ॥ एक नाम प्रवृत्ति है, एक नाम निवृत्ति ॥ प्रथमै दल प्रवृत्तिको, वरणि कहौ विस्तार ॥ तेहि पाछे निवृत्तिको, वरणों सब परिवार ॥ प्रथमें पुत्र प्रवृत्तिके, भयो मोहैं भयभीत ॥ दूजो सूत उत्पत्ति भयो, कामैसकलरणजीत ॥ महाकूर भौ तीसरो, क्रोधै नाम अतितेज ॥ चौथो अतिदारुण भयो, लोभै पापको एज ॥ दमैं पुत्र भयो पश्चमो, छठो गर्वै परियार ॥ सातैं मदैं उत्पत्ति भयो, विकटवीर विकरार ॥ अष्टम पुत्र प्रवृत्तिके, नाम अर्धर्म कुरूप ॥ सुक्तिपंथते चरण गहि, डारत है भवकूप ॥ आठैं पुत्र प्रवृत्तिके, असत्य वासना धीर ॥ वर्णनकरोंकुटुम्ब अब, जो जाको सुत तीर ॥

मोहपरिवार

महामोहकी नारिप्रिय, मिथ्या दृष्टि प्रमान ॥ पुत्र तासु हंकार है, ममता वधू सुजान ॥

कामपरिवार

मदननारि रतिप्रकट है, लालच सुवन बखान ॥ लोलुपता ताकी वधू, रंच नहीं परमान ॥

१ प्रबोधचन्द्रोदय नाटक संस्कृतका वेदान्त विषयक एक प्रसिद्ध नाटक है।

लोभ परिवार

विवेकसागर

( १३ )

क्रोधपरिवार

क्रोध नारि हिंसा असत, ताको सुत अविचार ॥ भूल वधू ताकी कठिन, पोषै सब परिवार ॥

लोभपरिवार

तृष्णा स्त्री लोभ की, ताको सुत है पाप ॥ चिन्ता त्रिय जाके चितै, करै सदा सन्ताप ॥

दम्भपरिवार

दंभ नारि आशा मलिन, ताको सुत पाखण्ड ॥ वधू अविद्या तासु तिय, भरमावे नौ खण्ड ॥

गर्वपरिवार

निन्दा वनिता गर्वकी, जाको अपयश पूत ॥ अपकीरति ताकी वधू, प्रकट निरंकुश धूत ॥

मदपरिवार

नारी मदकी ईषणा, जाके सुवन विरोध ॥ सा परधां ताकी, वधू, मेटै उरको बोध ॥

अधमपरिवार

अश्रद्धा नारि अधर्मकी, सुत असत्य बलवान ॥ विषय वधू आसक्ति पुनि, मेटै सुक्ति निधान ॥ आठ पुत्र कुटुम्ब यह, कहो भित्र विस्तार ॥ सुता प्रिया प्रवृत्ति की, बणीं तेहि परिवार ॥ जो अदया भगवान की, ताते भयो अज्ञान ॥ दीनी ताहि विवाहि सो, मोह हर्ष बलवान ॥ मिलि अज्ञान वासना, तिनते बहु संतान ॥ जेते लिखनेमो परै, तेते करौं बखान ॥ प्रथमै सुत संशय भयो, लै विशेष बहु भाव ॥

१ स्पर्धा ।

( ९४ )

विवेकसागर

आलस नींद अनर्थ पुनि, रजतम कपट चवाव ॥ कर्म असंयम तापत्रय, नानारोग विशाल ॥ यंत्र मंत्र नाटक घने, अरु प्रपंच जंगजाल ॥ और अर्घत धृष्टता, व्याकुलता अति चाह ॥ भुक्ति कामना कृपणता, जनमन कर उरदाय ॥ अयश ईषणा विषमता, अकृपा कुटिलता नाम ॥ इत्यादिक औरै घने, कहे काम दुख धाम ॥ असत्य वासनाके भये, पुत्र प्रचण्ड अनेक ॥ सुता भयी पुनि जगमती, भूली कुलकी टेक ॥ पुत्र वासना को बली, असत्संग आलस्य ॥ लै विशेष मंत्री तिने, करि राख्यो नृप वस्य ॥ सेना बहुत मोहकी, वर्णन बने न सोय ॥ पलमें हैरै विवेक बल, रहै ममता रस भोय ॥ महा कुन्यायी अति छली, चंचल बली कुटेव ॥ जग पोषक दोषक सुमत, करै मोह पद सेव ॥

छन्द-छाजतसेनमदमोहमंसा, क्रोध दारुणभटमहा ॥

आशातृष्णा तेहि भंडारी, विभौकी काँछाकहा ॥

टीका-सद्गुरु कहते हैं हे धर्मदास ! इस प्रकारसे प्रवृत्ति की सेना मोह, मद महावीर क्रोध से सुशोभित होरही है । और आशा, तृष्णा, भंडारी है जो चाहे कितना भी उसके भण्डारमें आवे किन्तु कभी उसकी तृप्ति नहीं होती है । जब मन

१ वाजीगरी हाथ चालाकीका काम । २ बेशर्मी निलंज्जता बे अदनी इस अष्टता के स्थानमें एक पुस्तक में अष्टता लिखा पाया गया है, यदि अष्टता यहां माना जाय तो वह अष्टताका विशेषण हो जायगा जिसका अर्थ होगा आगे चलानेवाली अष्टता और अष्टता प्रधान है जहाँ किन्तु इसकी अपेक्षा अष्टता शब्द यहां अधिक उपयुक्त है इस कारणसे अष्टताही लिखा है ।

निवृत्ति वंशवर्णन

विवेकसागर

( ९५ )

राजाकी प्रवृत्तिका यह ठाटवाट तब है मनको अन्य विभौकी इच्छा कहाँसे होवे ।

अथ निवृत्तिवंश वर्णन

निवृत्ति दूजी अंगना जिहि तिहि मन राजा थोरो चहै ॥ प्रवृत्ति पूजा गति न दूजा ताहि चित निशिदिन रहै ॥

टीका-उस मन राजाकी दूसरी स्त्री निवृत्ति है जिससे मन प्रेम नहीं करता क्योंकि मन प्रवृत्ति नामक स्त्रीमें ऐसा लुब्ध रहता है कि दिन रात उसके बिना मनको क्षणमात्र भी कल नहीं पड़ता है।

तेहि सुत जनेउ विवेक परम दृढ़ आसना ॥

सात्त्विक अस्त्र ले हाथ खड़्ग सो शासना ॥

टीका-उस मन राजाकी निवृत्ति नामक स्त्रीमें विवेक नामका पुत्र उत्पन्न हुआ सो विवेक निश्चल और दृढ़ आसनवाला है और उसने अपने हाथमें सतोगुणका अस्त्र ग्रहण किया है ।

वस्तु विचार, क्षमा दया तेहि आता भयो ।

तेहिको अनुज संतोष अतिहि आनन्द ठयो ॥

विद्या ताहि सहेली नीति बिचारई ॥

शील सनेह, सिखावन, पाठ सुधारई ॥

टीका-विवेक के और भी भाई बहिन उत्पन्न हुए । वस्तु विचार, क्षमा, दया, संतोष, विद्या, नीति, शील, सनेह, शिक्षा-पन और अध्ययन इत्यादि निवृत्तिकी संतान इत्यादि प्रकट हुई । प्र० चं० ना० श्रीअ० दा० जी कृत ।

दोहा-अब रानी निवृत्तिको, वणों सब परिवार ॥

जाके श्रवण बिचारते, मिटै कुमति संसार ॥

सुत विवेक प्रथमे भयो, बड उदार गुण धाम ॥

दूजो वस्तु विचार पुनि, हरे कामना काम ॥

तीजे सुत धीरज भयो, अचल वीर सुखकन्द ॥

विवेक परिवार

( ९६ )

विवेकसागर

चौथो सुत संतोष पुनि, हरे सकल जग द्रन्द ॥ पञ्चम पुत्रसु है मुक्ति धाम सुख रूप ॥ छठौ पुत्र पुनि शील है, लक्षण सबै अनूप ॥ धर्म पुत्र भयो सातवों कुलमण्डन अतिधीर ॥ अष्टम सुत बैराग है, मेटै ताप शरीर ॥ विष्णुभक्ति कन्या भयी, लक्षण सब गम्भीर ॥ सुवन सबै निरवृत्तिके, करै मोह उर पीर ॥ ये रानी निवृत्ति के करै, आठ पुत्र अति शूर ॥ भक्ति सुता कुलपोषिनी, करै कुमतिको दूर ॥ अब इनके सुत त्रिय बधू, बरणि कहौं तिन नाम ॥ मुक्ति पंथ अनुकूल सब, पुनि सुख प्रति अभिराम ॥

विवेकपरिवार

रानी रायविवेक की, ब्रह्मसुविद्या नाम ॥ पुत्र ज्ञान आनन्द त्रिय, ता असंग सुखधाम ॥

विचारपरिवार

रानी राय विचार की, निश्चय पूरण काम ॥ पुत्र नेम दृढता बधू, भय मिटै सुखधाम ॥ धीरज की त्रिय है क्षमा, हरे क्रोध को ताप ॥ पुत्र आर्जव गर्व हर, मुदिता बधू अलाप ॥

संतोषपरिवार

तृप्ति नारि संतोष की, जाको सुत आनन्द ॥ करुणा बधू अनूप है, भय मेटै सुखकन्द ॥

सत्यपरिवार

सत्यनारि निज साधुता, सुत निष्कपट उदार ॥ जिज्ञासा ताकी बधू, प्यारी सब परिवार ॥

शील परिवार

विवेकसागर

( १७ )

शीलपरिवार

शील नारि लब्धा सुभग, प्रलय करै उरझूल ॥ सुयश सुवन कीरति बधू, शुभ मार्ग अनुकूल ॥

धर्मपरिवार

श्रद्धा नारि सो धर्म की, सुत प्रकाशता नाम ॥ सुता भयी सतवासना, बधू साधता जाम ॥

वैराग्यपरिवार

रानी निज वैराग्य की, उदासीनता नाम ॥ सुत अभ्यास निराशता, बधू सकल सुखधाम ॥ प्रवृत्ति सौत सिहात सो देखत परजरी ॥ सबहि सुनत हँकार पौरुष बातें करी ॥ धिग सुत तुव पुरुषार्थ मृतक लेखऊँ ॥ सौतिन सुनत विदार मरण निज पेशऊँ ॥

टीका—हे धर्मदास ! इस प्रकारसे मन राजाकी दोनों स्त्रियोंके परिवार हुए उनमेंसे प्रवृत्तिके वंशकी अत्यन्त वृद्धि होने पर भी वह निवृत्तिके वंशको देखकर सिहाती है । इससे अपने सब पुत्रोंको बुलाकर कहती है कि हे पुत्रो ! तुम्हारे पुरुषार्थको धिक्कार है । सौतनके वंशकी वृद्धि देखकर मेरा कलेजा जलता है । इससे यातो तुम निवृत्तिके पुत्रोंको मारकर मेरेको सन्तोष दो नहीं तो अपनी मृत्युकी राह देखो ।

महामोह सुनि गरजेउ मातुल सूनियो ॥ तुव आज्ञा होय निपातों चितकितगूनियो ॥ विवेकहिं आदि सँहारु नेक न बाँचई ॥ करूँ निकंटक राज प्रश्न मन राँचई ॥

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विवेकसागर

छन्द-प्रश्न राचे कोइ न वाचे कटक देखत रिपु डरे ॥ ब्रह्माण्ड कंपे अखिल झंपे इंद्र दशदिश खरभरे ॥ विविधआयुध युत्थयुत्थप सुभट जहँ तहँ तरजहीं ॥ पव पात सम अवघात मनो एकएकन गर्जहीं ॥

टीका—हे धर्मदास ! प्रवृत्तिके उपर्युक्त वचनको सुनकर मोहने कहा कि हे माता ! आप चित्तमें इतनी चिन्ता क्यों करती है ? आप आज्ञा देवें तो विवेक आदि निवृत्ति आदिके समस्त परिवारको नाश करहूँ । मेरे मनमें तो सदा ऐसी लगी रहती है कि, विवेक आदि सबको मारकर निष्कण्टक राज कहूँ । अब तो आपके मनमें भी जब ये बात आई है और आपने मुझसे पूछा है तब मैं अपनी प्रबल सेनाके साथ विवेकका सर्व नाश कर दूँगा । मेरी सेना ऐसी प्रबल है कि, जिसके तेजसे ब्रह्माण्ड भी कम्पायमान होता है । मेरे इस प्रबल सेनाको देख करके शत्रुकी सेना कभी धीरज नहीं धारण कर सकेगी । मेरी सेना अखिल ब्रह्माण्डको आच्छादन करनेवाली है । इन्द्र जो देवतों का राजा है वह भी मेरी सेनाको देखकर घबरा जाता है ॥

मेरी सेनाके योद्धा लोगों ने नाना प्रकारके अस्त्र शस्त्र धारण किये हैं और एक २ बारकी गर्जनाही ऐसी है जिसको सुनकर पवनके झपाटे लगनेसे समान सब गिर जाते हैं ।

हे धर्मदास ! इस प्रकारसे मोह अपनी शूरता और प्रतापका बखान करके, माताकी आज्ञा पाकर विवेकराजासे युद्ध करनेको रवाना हुआ ॥

जननी कहँ शिर नाय समर शीघ्रहि चले ॥ युत्थप दंभ समाज कहत रिपु दलमले ॥

विवेकसागर

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टीका-माताको नमस्कार करके दम्भके समाजको आगे करके मोह राजा विवेकके सन्मुख आया। तब विवेक उसकी चमक दमकको देखकर घबराने लगा। विवेकको घबराते देखकर निवृत्तिकी सहेली विद्याने निवृत्तिसे जाकर सब वृत्तांत कहा।

विद्या जाय निवृत्तिहि बात जनायउ ॥

तब सौतिन सुतन अनुज विरोधहिं आयउ ॥

टीका-विद्याने निवृत्तिसे कहा कि, तुम्हारी सौत प्रवृत्तिके पुत्र तुम्हारे पुत्रसे विरोध करके युद्ध करनेको आये हैं और।

चाहत बन्धु विमातहि तुरति घातऊँ ॥

छाड़ै नेक न काहू सबहि निपातऊँ ॥

टीका-और वह ऐसी इच्छा रखता है कि, तुम्हारे सब पुत्रोंका नाश करके एकको भी जीता न छोड़े ॥

निवृत्ति निज दूतहि धर्म बुलायउ ॥

ताते सुत कह बुलाई भाव बुझायउ ॥

टीका-विद्याकी बातको सुनकर निवृत्तिने अपने दूत द्वारा धर्म आदि सब पुत्रोंको बुलाकर उसने कहा कि,

बन्धु विमातिकधरि सो, रणयुत्थ आवहीं ॥

समर सोई सुन ठयो पराजय पावहीं ॥

सुमता करि सब सुन्दर मंत्र विचारहूँ ॥

दुविधा अरि अज्ञान सो जानि सँभारहूँ ॥

टीका-निवृत्ति अपने पुत्रोंसे कहती है हे पुत्रौ ! देखो तुम्हारे सोतेले भाई सब तुमपर चढ आये हैं और युद्ध करके तुम्हारा नाश

प्रवृत्तिकी ईर्षा और युद्धका मूल विवेक का संविन्यासे मन्त्र विचार

(१००)

विवेकसागर

करना चाहते हैं इस कारण तुम्हें अब उचित है कि, परस्परसुमति करके ऐसा उपाय विचारो जिसमें उसने अपनी रक्षा कर सको।

दृढता दण्ड विमलचित धीरज दीजिये ॥

दया पताका साजि समर सुत कीजिये ॥

टीका-निवृत्ति कहती है हे पुत्रो ! दृढता और राग द्वेष रहितता और धीरज द्वारा परस्पर एकमेक होकर दयारूपी पताका को फहराते हुए तुम भी युद्धके लिये परस्थान करो ।

छन्द--पार्ई शिक्षा भयी इच्छा भूमिरणसर सजि चले ॥

आनन्द तबल बजाय तब रिपु सेन चाहत दलमलै ॥

मद मोह आदि विराजता सब ध्वजा ईर्षासजावहीं ॥

निजमूर्खताको दण्ड गहि ममता निशान बजावहीं ॥

टीका-इस प्रकार जब निवृत्ति अपने पुत्रोंको आह्वा दे चुकी तब विवेक राजा अत्यन्त दृढ इच्छाके साथ आनन्दका धौसा बजाकर इस उत्साहके साथ सेना लेकर रणभूमिको चले मानो तत्कालही शत्रुके दलका नाश कर देंगे ।

विवेककी सेनाको ऐसे ठाटबाटसे आती देखकर मोह राजा अपने सब भाइयोंके साथ ईर्षाकी पताका स्वरूपकी अज्ञानताका दण्ड और ममताका निशान लेकर आगे बढ़ा ॥

तब विवेक निजमन्त्री तुरंत हँकारेऊँ ॥

कहु मन्त्री दृढ आगम समा विचारऊँ ॥

टीका-मोहराजाकी सेना रणमें प्रस्तुत देखकर विवेक राजाने अपने मंत्रियोंसे संमति पूछी कि, हे मित्रवरो ! समयानुसार विचार बतलाइये जिससे मोह राजाको प्राप्त कर सकें ।

लड़ाईकी तय्यारी

विवेकसागर

(१०१)

सुमती कहे सुनु पुंगव मतिके आगरा ॥ समर वृद्धिके कीजे जगत उजागरा ॥ प्रथमहीं दूत पठाय नीति बहु विधि कहो ॥ नहि माने सतभाय तबहि आयुध गहो ॥

टीका—विवेक राजाके पूछनेपर सुमतिने कहा कि, हे राजन् ! आप बुद्धिमान हो विग्रह करनेमें जहाँतक हो विचार कर कार्य करना चाहिये । प्रथम दूत भेजकर मोहको बहुत प्रकारसे नीति द्वारा समझाइये यदि वह मान जाय तब तो ठीक ही है और नहीं तो फिर पीछे हथियार उठाकर युद्ध करना चाहिये ॥

शील दूत कहैं बोली शिशुवापन दीनेऊ ॥ चलयो तुरत शिर नाय विदा जब कीनेऊ ॥

टीका—हे धर्मदास ! जब सुमतिने इस प्रकारसे कहकर नीति का मार्ग बताया तब विवेक राजाने शीलको बुलाकर कहा कि, हे शील ! आप दूत बनकर मोहराजाके पास जाओ । और जो कुछ मोह राजासे कहना था वह सब अच्छी प्रकार शीलको सिखाकर विदा किया । फिर तो शीलविवेकके पाससे चल कर मोह राजाके दरबारमें पहुँचा ॥

मोह आदि भ्राता जे सबहि सुनायऊ ॥ बन्धु विमात संदेश सो सबहि बुझायऊ ॥

टीका—शील दूतने मोह राजाकी सभामें जहाँ सब भाइयों सहित मोह राजा बैठा था पहुँच उसके सौतेले भाई विवेकका संदेश सुनाया ॥

कारण कौन विरोधेऊ बोलहु नागरा ॥ बन्धव सम होय कीजे राज उजागरा ॥