भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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विवेकसागर

( ८३ )

चौपाई

क्रोध जरनते गयऊ बुझायी । राजा मोह समाचार तब पायी॥ बहुते मन मँहँ कीन्ह पछिताई । सकल सैन को लिये बुलाई ॥ हारचो क्रोध काम जब जाना । महा मोह राजा डर माना ॥ चकित मोह मन्त्री हँकरावा । सम्मुख मोह विवेक डरावा ॥ लोभ मन्त्री आय भये ठाढा । देखत राव छोभ अति बाढा ॥ तब लोभ मोहहि माथ नवाई । कहु राजा मोहि काहे बुलाई ॥ जबलगि अहै मोह रणधीरा । तब लग काहे होहु अधीरा ॥ जबलग प्रबल मोह है आगे । तब लग कहा ज्ञान कह जागे ॥ महा मोह राजा सुनु बैना । जबलगिहौं तबलगि सब सैना ॥ जबलगिहौं तब लगि आही । मोरे गये सबै मिटि जाही ॥ हौं निज सर्व पापका मूला । मोरे ते तुम रहत हो फूला ॥ जीतौं ज्ञान विवेक हि जायी । देश आपनो लेउ छुडायी ॥ तो कहँ फिर मैं दैहौं राजू । महामोह मोरे बल गाजू ॥ यह सुनि हर्ष मोह मन भयऊ । तत्क्षण लोभको आयसु दयऊ ॥ मोह कहै दैहौं सब राजू । तबही लोभ रणै मँहँ गाजू ॥ जबही मोह लोभहि कहेऊ । देई बीरा आयसु दयऊ ॥ बाचा बन्ध राजा जब भयऊ । तबही लोभ रण कहँ गयऊ ॥ जाई रण दियो लोभ हँकारा । ज्ञान तुम का करहु तक़रारा ॥ हम बन्दोबस्त कियो परवेशा । छोडहु ज्ञान हमारो देशा ॥ तजहु ज्ञान तुम हमरो ठाकं । मैं प्रचण्ड लोभ मोर नाकं ॥ अब मैं रनमहँ अग्नि परजारी । करि बल एक एक कै मारौं ॥ चिन्ता शक्ति पापको मूला । कोउ न जाने मम डर भूला ॥ आशा तृष्णा तहां अति बहे । सुनत ज्ञान तहां नहि रहै ॥ नहि जानो तुम क्रोध औ कामा । हौं अति प्रबल लोभ मोहि नामा ॥