कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविवेकसागर
( ९१ )
टीका-माताको नमस्कार करके दम्भके समाजको आगे करके मोह राजा विवेकके सन्मुख आया। तब विवेक उसकी चमक दमकको देखकर घबराने लगा। विवेकको घबराते देखकर निवृत्तिकी सहेली विद्याने निवृत्तिसे जाकर सब वृत्तांत कहा।
विद्या जाय निवृत्तिहि बात जनायउ ॥
तब सौतिन सुतन अनुज विरोधहिं आयउ ॥
टीका-विद्याने निवृत्तिसे कहा कि, तुम्हारी सौत प्रवृत्तिके पुत्र तुम्हारे पुत्रसे विरोध करके युद्ध करनेको आये हैं और।
चाहत बन्धु विमातहि तुरति घातऊँ ॥
छाड़ै नेक न काहू सबहि निपातऊँ ॥
टीका-और वह ऐसी इच्छा रखता है कि, तुम्हारे सब पुत्रोंका नाश करके एकको भी जीता न छोड़े ॥
निवृत्ति निज दूतहि धर्म बुलायउ ॥
ताते सुत कह बुलाई भाव बुझायउ ॥
टीका-विद्याकी बातको सुनकर निवृत्तिने अपने दूत द्वारा धर्म आदि सब पुत्रोंको बुलाकर उसने कहा कि,
बन्धु विमातिकधरि सो, रणयुत्थ आवहीं ॥
समर सोई सुन ठयो पराजय पावहीं ॥
सुमता करि सब सुन्दर मंत्र विचारहूँ ॥
दुविधा अरि अज्ञान सो जानि सँभारहूँ ॥
टीका-निवृत्ति अपने पुत्रोंसे कहती है हे पुत्रौ ! देखो तुम्हारे सोतेले भाई सब तुमपर चढ आये हैं और युद्ध करके तुम्हारा नाश