भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 394, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 394

( ९८ )

विवेकसागर

छन्द-प्रश्न राचे कोइ न वाचे कटक देखत रिपु डरे ॥ ब्रह्माण्ड कंपे अखिल झंपे इंद्र दशदिश खरभरे ॥ विविधआयुध युत्थयुत्थप सुभट जहँ तहँ तरजहीं ॥ पव पात सम अवघात मनो एकएकन गर्जहीं ॥

टीका—हे धर्मदास ! प्रवृत्तिके उपर्युक्त वचनको सुनकर मोहने कहा कि हे माता ! आप चित्तमें इतनी चिन्ता क्यों करती है ? आप आज्ञा देवें तो विवेक आदि निवृत्ति आदिके समस्त परिवारको नाश करहूँ । मेरे मनमें तो सदा ऐसी लगी रहती है कि, विवेक आदि सबको मारकर निष्कण्टक राज कहूँ । अब तो आपके मनमें भी जब ये बात आई है और आपने मुझसे पूछा है तब मैं अपनी प्रबल सेनाके साथ विवेकका सर्व नाश कर दूँगा । मेरी सेना ऐसी प्रबल है कि, जिसके तेजसे ब्रह्माण्ड भी कम्पायमान होता है । मेरे इस प्रबल सेनाको देख करके शत्रुकी सेना कभी धीरज नहीं धारण कर सकेगी । मेरी सेना अखिल ब्रह्माण्डको आच्छादन करनेवाली है । इन्द्र जो देवतों का राजा है वह भी मेरी सेनाको देखकर घबरा जाता है ॥

मेरी सेनाके योद्धा लोगों ने नाना प्रकारके अस्त्र शस्त्र धारण किये हैं और एक २ बारकी गर्जनाही ऐसी है जिसको सुनकर पवनके झपाटे लगनेसे समान सब गिर जाते हैं ।

हे धर्मदास ! इस प्रकारसे मोह अपनी शूरता और प्रतापका बखान करके, माताकी आज्ञा पाकर विवेकराजासे युद्ध करनेको रवाना हुआ ॥

जननी कहँ शिर नाय समर शीघ्रहि चले ॥ युत्थप दंभ समाज कहत रिपु दलमले ॥