कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
सिंधु मंथन और चौदहरत्न उत्पत्तिकी कथा (प्रारम्भ)
अनुरागसागर
( २७ )
सिन्धुमथन और चौदह रत्न उपसिकी कथा
त्रय बालक जब भये सयाने । पठये जननी सिंधु मथाने ॥ बालक माते खेले खिलारी । सिंधुमथनहिं गयउ खरारी ॥ तेहि अंतर इक भयौ तमासा । सो चरित्र बूझो धर्मदासा ॥ धान्यो योग निरंजन राई । पवन आरंभ कीन्ह बहुताई ॥ त्यागो पवन रहित पुनि जबही । निकसेउ वेदस्वास सँग तवही ॥ स्वास सँग आयउ सो वेदा । बिरला जन कोई जानेभेदा ॥ अस्तुति कीन्ह वेद पुनि ताहां । आज्ञाका मोहि निर्गुनाहां ॥ कह्यौ जाव करू सिंधुनिवासा । जेहि भेटे जैहौ तिहिपासा ॥ उठी आवाज रूप नहिं देखा । जोति अगम दिखलावतभेखा ॥ जलेउ वेद पुनि तेज अपाने । तेज अन्न पुनि विष संधाने ॥ चले वेद तहैंवा कहैं जाई । जहैंवा सिंधु रचा धर्मराई ॥ पहुँचे वेद तब सिंधु मैझारा । धर्मराय तब युक्ति विचारा ॥ गुप्त ध्यान देविहि समुझावा । सिंधुमथनकहैंकसबिलमावा ॥ पठवहु बेगि सिंधुत्रय बारा । दृढ़कै शोचहु वचन हमारा ॥ बहुरिआपपुनि सिंधु समाना । देवी कीन्ह मथन अनुमाना ॥ तिहुँबालक कहैंकह समुझायी । आशिष दे पुनि तहां पठायी ॥ पैहौ वस्तु सिन्धुके पाहीं । जाहु वेगि तीनों सुत ताहीं ॥ चलिभौ ब्रह्मा मान सिखाई । दोउ लहुरा पुनि पाछे जाई ॥
छन्द
त्रय सुत बाल खेलेत चले, ज्योंसुभगबालमरालहो ॥ एकगहिछोड़तमहीपुनि, एककरगहिचलतलटपटचालहो ॥ क्षणहिधावतक्षणस्थिर खड़े, क्षणभुजहिगरलावही ॥ तेहि समयकी शोभा भली, नहि वेद ताकहैं गावही ॥
प्रथमवार सिंधु मंथन
( २८ )
अनुरागसागर
सोरठा-गये सिंधुके पास, भये ठाढ़ तीनों जाने ॥ युक्तिमथनपरकास, एक एकको निरखही ॥२१॥
प्रथमवार सिन्धु मथन
तीनों कीन्ह मथन तब जाई । तीन वस्तु तीनों जन पाई ॥ ब्रह्मा वेद तेज तेहि छोटा । लहुरा तासुमिलेविष खोटा ॥ भेटि वस्तु त्रय तीनों भाई । चलिभये हर्षकहत जहँमाई ॥ मातापहँ आये त्रय वारा । निजनिजवस्तुप्रगट अनुसारा ॥ माता आज्ञा कीन्ह प्रकाशा । राखुवस्तुतुमनिजनिज पास।
द्वितीय बार सिन्धुमथन
पुनितुम मथहु सिन्धु कहे जाई । जो जेहि मिले लेख सो भाई ॥ कीन्ह चरित अस आदि भवानी । कन्या तीन कीन्ह उत्पानी ॥ कन्या तीन उत्पान्यो जबहीं । अंसवारि मँ नायो सबहीं ॥ सब माताको आगे कीन्हा । माता बाँटि तिन्हन कहँ दीन्हा ॥ पठयो सिंधु महि पुनि ताही । त्रय सुत मर्मसो जानत नाहीं ॥ पुनि तिन मथन सिंधुको कीन्हा । भेटयो कन्या हाँपित है लीन्हा ॥ कन्या तीनहु लीन्हे साथ। औ जननी कहँ नायहु माथा ॥ माता कहे सुनहु सुत मोरा । यह तो काज भये सब तोरा ॥ एक एक बाँटि तीनहुको दीन्हा । काहु भोग कस आज्ञा कीन्हा ॥ सावित्री ब्रह्मा तुम लेख । है लक्ष्मी विष्णु कहँ देख ॥ पारवती शंकर कहँ दीन्ही । ऐसी माता आज्ञा कीन्ही ॥ तीनउ जन लीन्हीं सिरनाई । दीन्ह अध्याजस भाग लगाई ॥ पाई कामिनि भये अनन्दा । जस चकोर पाये निशिचंदा ॥ काम बसी भए तीनों भाई । देव दैत दोनों उपजाई ॥ धर्मदास परखो यह बात। नारी भयी हती सो माता ॥ माता बहुरि कहँ समझाई । अब फिर सिंधु मथो तुम भाई ॥ जो जेहि मिलै लेहुसो जाई । अब जनिकरो विलंब तुम भाई ॥
तृतीयवार सिंधु मंथन
अनुरागसागर
( २९ )
तृतीयवार सिंधुमथन
त्रयसुत चले तब माथ निवायो । जो कछु कहेउ करव हम जायो॥ मध्योसिंधुकछु विलंवन कीन्हा । मिला वेद सो ब्रह्म लीन्हा ॥ चौदह रतन की निकसी खानी । ले माता पहुँ पहुँचे आनी ॥ तीनहु बन्धु हरषि हौ लीन्हा । विष्णु सुधा पाय उहर विषदीन्हा ॥
अथाका तोनों पुत्रोंको सृष्टिरचनेकी आज्ञा देना और सब
मिलकर पांच खानकी उत्पत्ति करना
पुनि माता अस वचन उचारा । रचहु सृष्टि तुम तीनों वारा॥ अण्डज उत्पत्ति कीन्हा माता । पिंडज ब्रह्मा कर उत्पाता ॥ ऊष्मजरखानि विष्णु व्यवहारा । शिव अस्थावर कीन्ह पसारा॥ चौरासी लख योनिन कीन्हा । आधा जल आधा थल कीन्हा ॥ एक तत्त्व अस्थावर जाना । दोय तत्त्व ऊष्मज परवाना ॥ तीन तत्त्व अण्डज-निरमाई । चार तत्त्व पिंडज उपजायी ॥ पांच तत्त्व मानुष विस्तारा । तीनों गुण तेहि माहिँ सँवारा ॥
ब्रह्माका वेद पढ़कर निराकारका पता पाना
ब्रह्मा वेद पढ़न तब लागा । पढ़त वेद तब भा अनुरागा ॥ कहे वेद पुरुष इक आही । हैं निरंकार रूप नहिं ताही ॥ शून्य माहिँ वहि जांत दिखावे । चितवन देह दृष्टि नहिं आवे ॥ स्वर्ग सीस पग आहि पताला । तेहिमत ब्रह्मा भौ मतवाला ॥ चतुरानन कहैं विष्णु बुझावा । आदिपुरुष मोहिं वेद लखावा ॥ पुनि ब्रह्मा शिवसों अस कहई । वेद मथन पुरुष एक अहई ॥
ब्रह्मावचन विष्णुप्रति
अहै पुरुष इक वेद बतावा । वेद कहे हम भेद न पावा ॥ कबीरवचन अथाप्रति
तब ब्रह्मा माता पहुँ आवा । करि प्रणाम तब टेके पावा ॥
ब्रह्मावचन अथाप्रति
हे माता मोहि वेद लखावा । सिरजनहार और बतलावा ॥
( ३० )
अनुरागसागर
छन्द
ब्रह्मा कहे जननी सुनौ, कहहु कन्त तुम्हार है ॥ कीजै कृपा जनि मोहि दुरावो, कहाँ पिता हमार है ॥
अद्यावचन ब्रह्माप्रति
कहे जननी सुनहु ब्रह्मा, कोउ नहिं जनक तुम्हार हो ॥ हमहिते भई सब उत्पति, हमहि सब कीन सम्हार हो ॥ २१ ॥
ब्रह्मावचन अद्याप्रति
सोरठा-ब्रह्मा कहे पुकार, सुनु जननी तैं चित्त दे ॥ कहत वेद निस्वार, पुरुष एक सौगुप्त है ॥ २२ ॥
अद्यावचन ब्रह्माप्रति
कहे अद्या सुनु ब्रह्मकुमारा । मोसे नहिं कोउ क्षण न्यारा ॥ स्वर्ग मृत्यु पाताल बनाई । सात समुन्दर हम निरमाई ॥
ब्रह्मावचन अद्याप्रति
मानो वचन तुमहि सब कीन्हा । प्रथमगुप्त तुम कसरखलीन्हा ॥ जबै वेद मोहि कहै बुझाई । अलखनिरंजन पुरुष बताई ॥ अब तुम आप बनो करतारा । प्रथम कहेन किया विचारा ॥ जो तुम वेद आप कथि राखा । तोकसतुम अलखनिरंजन भाखा आपे आप आप निरमाई । काहे न कथन कीन तुम माई ॥ अब मोसन तुम छल जनिकरहु । सांचे सांच सब कहि उच्चरहु ॥ जब ब्रह्मा यहि विधि हठाना । तब अध्यामन कीन्हतिवाना ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
केहि विधि याहि कहैं समझाई । विधि नहिं मानत मोर बड़ाई ॥ जो यदि कहाँ निरंजन वाता । केहि विधि समझे यह विख्याता ॥ प्रथम कह्यो निरंजन राई । मोर दर्श काहु नहि पाई ॥ जबै जो यहीं अलख लखावों । केहि विधि कहिता को दिखलावों ॥
अनुरागसागर
( ३१ )
अद्यावचन ब्रह्माप्रति
असविचार पुत्रब्रह्मै समझावा । अलखनिरञ्जनहिंदरसदिखावा ॥
ब्रह्मावचन अद्याप्रति
ब्रह्मा कहे मोहि ठौर बतावो । आगा पीछा जनितुमलावो ॥ मैं नहिं मानौं तुम्हारी बाता । ऐसी बात न मोहि सुहाता ॥ प्रथम तुम मुहि दीनभुलावा । अब तुम कहो न दरसदिखावा ॥ तासु दरश न पैहो पूता । ऐसी बात कहो अजगूता ॥
छन्द
दरशदिखायतत्कालदीजै, मोहिनभरोसतुम्हारहो ॥ संशयनिवारयहिकालदीजै, कीजेनविलंबलगारहो ॥
अद्यावचन ब्रह्माप्रति
कह जननी सुनो ब्रह्मा, कहौं तोसों सत्तही ॥ सातस्वर्ग है माथ ताको, चरण पतालसमही ॥२२॥ सोरठा-लेहु पुष्प तुम हाथ, जो इच्छा तेहि दरशकी जाय नवाओ माथ, ब्रह्मा चले शिरनाइके ॥२३॥
जननी गुन्योवचन चितमाहीं । मोरि कहौ यह मानति नाही ॥ यह कहैं वेद दीन्ह उपदेशा । पै दरश ते नहिं पावै भेशा ॥ कह अष्टंगि सुनो रे वारा । अलखनिरञ्जन पिता तुम्हारा ॥ तासु दरश नहिं पैहै पूता । यह मैं वचन कहौं निजगूता ॥ ब्रह्मा सुनि व्याकुल है धावा । परसन सीस ध्यानहियलावा ॥ ब्रह्मा चले जननि सिर नाई । सीस परसि आवै तेही ठाई ॥ तुरतहि ब्रह्मा दीन्ह रिगारी । उत्तर दिशा बेगि चलि जाई ॥ आज्ञा मांगि विष्णु चलेबाला । पिता दरशको चले पताला ॥ इत उत चितयमहेशन डोला । सेवा करत कष्ट नहीं बोला ॥
विष्णुका पिताके खोजसे लौटकर पिताके घरतक न पहुँचनेका वृत्तांत मातासे कहना और माताका प्रसन्न होना
( ३२ )
अनुरागसागर
तेहिशिवमनअर्चितअभावा । सेवा करनजननि चितलावा॥ यहिविधिबहुतदिवसचलियऊ। माता सोचपुत्रकह कियऊ॥
विष्णुका पिताके खोजसे लौटकर पिताके चरणतक
न पहुँचनेका वृत्तान्त कहना
प्रथमविष्णुजननी ढिग आये । अपनी कथा कहि समुझाये॥ भेटचो नहि मोहि पगु ताता । विषज्वालास्यामल भौगाता॥ व्याकुल भयउतबैफिर आवा । पिता पगुदरश मैं नहि पावा॥ सुनिहगषित भइआदिकुमारी । लीन्हविष्णुकहैनिकटदुलारी॥ चूमेउ बदन सीस दिये हाथा । सत्य सत्य बोलउ सुतबाता॥
धर्मदासवचन कबीरप्रति
कहे धरमनि यह संशय बीती । साहब कहहु ब्रह्मकी रीती ॥ पितासीस तना परसन कीन्हा । किहोयनिरासपीछेपग पीन्हा॥
छन्द
गयउ ब्रह्मा सीस परसन, कथा ता दिनकी कही॥ भयो दिष्ट मेराव कि,नहि तासु दरशन तिनलही॥ यह बरनि सब कहो सतगुरु, एकएक विलीयके ॥ निजहास जानि परगासकीजे, धरहुनिजजनिगायके२३॥ सो०-प्रभु हम हैं तुव दास, जन्मकृतारथमोरिकरि॥ करहु वचन परगास, तेहि पीछे जो चरित भा ॥२४॥
पिताके खोजमें गये हुए ब्रह्माकी कथा । कबीरवचन धर्मदासप्रति
धरमदास मुहि अतिप्रिय अहहू । कहो संदेश परखि हटगहहू ॥ चलत ब्रह्म तब वार न लावा । पिता दरश कहैअतिमनभावा॥ तेहि स्थान पहुँचि गे जाई । नहि तहैरविशशि शून्यरहाई॥ बहुविधि अस्तुति करे बनायी । ज्योति प्रभावध्यानतहैलाई॥
ब्रह्माके लिये अद्याकी चिन्ता
अनुरागसागर
( ३३ )
ऐसे बहु दिन गये बितायी । नहि पायो ब्रह्मा दरशपितायी॥ शून्य ध्यानयुग चार गमावा । पिता दरश अजहुँ नहि पावा॥
ब्रह्मा के लिये अथाकी चिन्ता
ब्रह्मा तात दरश नहि पाई । शून्य ध्यान महाँ जुग बहु जाई॥ माता चिन्ता करत मनमाहाँ । जेठ पुत्र ब्रह्मा रह काहाँ ॥ किहि विधिरचना रचहुँ बनाई । ब्रह्मा आवै कौन उपाई ॥
गायत्री उत्पत्ति
उबटि शरीर मैल (न) गहिकाढी । पुत्री रूप कीन्ह रचिठाढी ॥ शक्ति अंशनिज ताहि मिलावा । नाम गायत्री ताहि धरावा ॥ गायत्री मातहि सिर नावा । चरणचूमिनिज सीस चढ़ावा ॥
गायत्री वचन अध्यामति
गायत्री विनवै कर जोरी । सुनु जननी यक विनती मोरी ॥ कौन काज मोहँ निरमाई । कहो वचन लेऊँ सीस चढ़ाई ॥
अद्यावचन गायत्री प्रति
कहे अद्या पुत्री सुनु वाता । ब्रह्मा आहि जेठहि तुव भ्राता ॥ पिता दरश कहँ गयो अकाशा । आनौ ताहि वचन प्रकाशा ॥ दरश तातकर वह नहि पावे । खोजत खोजत जन्म गमावे ॥ जौने विधिते इहँवा आई । करो जाय तुम तीन उपाई ॥
गायत्रीका ब्रह्मा के खोजमें जाना । कबीर वचन धर्मदास प्रति
चलि गायत्री मारग आई । जननी वचन प्रीति चितलाई ॥ चलत भई मारग सुकुमारी । जननी वचन ध्यान उर धारी ॥
छन्द
जाय देखो चतुरमुख कहँ, नाहि पलक उधारई ॥ कछुक दिन सो रही तहवों, बहरि युक्ति विचारई ॥ कौन विधि यह जागि है, अब करौँ कौन उपायहो ॥ मन गुनित सो चबहुत विधि, ध्यान जननी लायहो र४॥
ब्रह्माको जगानेके लिये अद्याका गायत्रीको युक्ति बताना
( ३४ )
अनुरागसागर
ब्रह्माको जगानेके लिये अधाका गायत्रीको युक्ति बताना
सो०-अद्या आयसु पाइ, गायत्री तब ध्यान महँ ॥ निज कर परसेउ जाय,ब्रह्मा तबहीं जागिहै ॥२४॥ गायत्री पुनि कीन्ह तैसी । माता युक्ति बताई जैसी ॥ गायत्री तब चित्त लगाई । चरणकमल कहँ परसेउ जाई॥
ब्रह्माका जागकर गायत्रीपर क्रोध करना
ब्रह्मा जाग ध्यान मन डोला ॥ व्याकुल भयो वचन तब बोला ॥ कवन अहै पापिन अपराधी । कहा छुड़ायहु मोरि समाधी ॥ शाप देहुँ तोकहँ मैं जानी । पिताध्यानमोहिखण्डचोआनी
गायत्री वचन ब्रह्माप्रति
कहि गायत्री मोहिन पापा । बृक्षि लेहु तब देहहु शापा ॥ कहाँ तोहिसो सांची बाता । तोहि लेन पठयी तुव माता ॥ चलहु वेगि जननिलावहुबारे । तुम विन रचना को विस्तारे ॥
ब्रह्मावचन गायत्रीप्रति
ब्रह्मा कहे कौन विधि जाऊँ । पितादरश अजहुँ नहि पाऊँ ॥
गायत्रीवचन ब्रह्माप्रति
गायत्री कह दरशन पैहो । बेगि चलहु नहि तो पछते हो ॥
ब्रह्माका गायत्रीको साक्षी देनेको कहना और गायत्रीका
ब्रह्मासे रति करनेकी बात कहना
ब्रह्मा कहै देहु तुम साखी । परस्यो सीस देख मैं आंखी ॥ ऐसे कहो मातु समुझायी । तोतुम्हरे सङ्ग हम चलिजायी ॥
गायत्रीवचन ब्रह्माप्रति
कह गायत्री सुन श्रुति धारी । हम नहीं मिथ्या बचन उचारी ॥ जो मम स्वारथ पुरवहु भाई । तो हम मिथ्या कहब बनाई ॥
ब्रह्मावचन गायत्रीप्रति
कह ब्रह्मा नहि लखी कहानी । कहौँ बुँझाय प्रगटकी बानी ॥
सावित्री उत्पत्तिकी कथा
अनुरागसागर
( ३५ )
गायत्री वचन
कह गायत्री देहु रति मोही । तो कह झूठ जित्ताऊं तोही ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
गायत्री कहै है यह स्वारथ । जानि कहौं मैं पुन परमारथ ॥ सुनि ब्रह्मा चित करे विचारा । अबका यत्न करहुँ इहिवारा ॥
छन्द
जो विमुख या कह करौं अब तो नहीं बन आवई ॥ साखि तो यह देय नहीं जननि मोहि लजावई ॥ यहाँ नाहि पिता पायो भयो न एको काज हो ॥ पाप सोचत नहि बने अब करौं रतिविधि साजहो २५ सो०-कियो भोगरतिरंग, विसरन्यो सो मनदर्शका दोउ कहैं बढयो उमंग, छलमति बुद्धिप्रकाशकिले २६ ॥
सावित्री उत्पत्तिकी कथा
कह ब्रह्मा चल जननी पास । तब गायत्री वचन प्रकाशा ॥ औरो करौ युक्ति इक ठानी । दूसरी साखि लेहु उत्पानी ॥ ब्रह्मा कहे भली है बाता । करहु सोई जेहि मानै माता ॥ तब गायत्री यतन विचारा । देहि मैल गहि कीन्ह नियारा ॥ कन्यारचि निज अंशमिलावा । नाम सावित्री तासु धरावा ॥ गायत्री तिहि कह समुझावा । कहियो दरशब्रह्म पितु पावा ॥ कह सावित्रीहम नहि जानी । झूठ साखि दे आपनि दानी ॥ यह सुनिदोउकहैंचिन्ता व्यापा । यह तौ भयो कठिन संतापा ॥ गायत्री बहु विधि समुझाई । सावित्री के मन नहि आयी ॥ पुनि गायत्री कहा बुझाई । तब सावित्री वचन सुनाई ॥ ब्रह्मा कर मोसों रति साजा । तो मैं झूठ कहौं यहि काजा ॥ गायत्री ब्रह्महि समुझावा । दै रति या कहैं काज बनावा ॥ ब्रह्मा रति सावित्रीहि दीन्हा । पापमोट आपन शिर लीन्हा ॥
ब्रह्माका गायत्री और सावित्रीके साथ माताके पास पहुँचना और सबका शाप पाना
( ३६ )
अनुरागसागर
सावित्री कस दूसर नाऊं । कहि पुहुपावति वचन सुनाऊं॥ तीनों मिलिके चलि भे तहवां । कन्या आदिकुमारी जहवां ॥
ब्रह्माका गायत्री और सावित्री के साथ माताके पास पहुँचना
और सबका शाप पाना
करि प्रणाम सन्मुख रहे जाईं । माता सब पूछी कुशलार्ह ॥
अद्यावचन ब्रह्माप्रति
कह ब्रह्मा पितु दर्शन पाये । दूसरि नारि कहाँसे लाये ॥
ब्रह्मावचन
कह ब्रह्मा दोऊ हैं साखी । परस्यो सीस देव इन आंखी॥
अद्यावचन गायत्रीप्रति
तब माता बूझे अनुसारी । कहु गायत्री वचन विचारी॥
तुम देखा इन दर्शन पावा । कहा सत्य दर्शन परभावा ॥
गायत्रीवचन
तब गायत्री वचन सुनावा । ब्रह्मा दर्श सीस पितु पावा ॥
मैं देखा इन परसेउ शीशा । ब्रह्महि मिले देव जगदीशा ॥
छन्द
लेह पुहुप परसेउ शीशपितु इन दृढमें देखत रही॥
जल दार पुहुप चढ़ाय दीन्ह हे जननि यह है सही ॥
पुहुपते पुहुपावती भयी प्रगट ताही ठामते ॥
इनहु दर्शन लह्यो पितुको पूछहु इहि वामते ॥२६॥
हे जननी यह है सही तुम पूछि लो पुहुपावती ॥
सबही सांच मैं तोसों कहूँ नहीं झूठहै एको रती ॥
अद्यावचन पुहुपावतीप्रति
माता कह पुहुपावतीसी कहो सत्य हि मो सना ॥
जो चढ़े सीसाहि पिताके तुम वचन बोलहु ततखना॥
१ यह छन्द पुरानी प्रतियोंमें नहीं है
अद्याका ब्रह्माको शाप देना
अनुरागसागर
( ३७ )
सो०-कहु पुहुपावति मोहि, दरश कथानिरवारके। यह मैं पूछों तोहि, किम ब्रह्मादरशन किये॥२७॥
सावित्री वचन
पुहुपावंती वचन तब बोली । मातासत्य वचन नहीं डोली॥ दर्शन सीस लह्यो चतुरानन । चढ़े सीसयह धर निश्चय मन॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति
साख सुनत अद्या अकुलानी । भा अचरज यह मर्म न जानी॥
अद्याकी चिंता
अलखनिरंजन अस प्रण भार्खी । मोकहैं कोउ न देखै आंखी ॥ ये तीनहुँ कस कहहिँ लबारी । अलखनिरंजन कहहु सम्हारी॥ ध्यान कीन्ह अछुंगी तिहि क्षण । ध्यानमहिँ अस कहा निरंजन ॥
निरंजन वचन
ब्रह्मा मोर दरश नहि पाया । झूठिसाखिइन आन दिवाया॥ तीनों मिथ्या कहा बनाई । जनि मानहु यह है लबराई॥
अद्याका ब्रह्माको शाप देना
यह सुनि माता कीन्हे दापा । ब्रह्मा कहैं तब दीन्हो शापा ॥ पूजा तोरि करै कोई नाहीं । जो मिथ्या बोलेउ मनमाहीं ॥ इक मिथ्या अरु अकरम कीन्हा । नरक मोट अपने शिर लीन्हा॥ आगे है जो शाख तुम्हारी । मिथ्या पाप करहिँ बहुभारी॥ प्रगट करहिँ बहु नेम अपारा । अन्तर मैल पाप विस्तारा ॥ विष्णु भक्तोंसे करहिँ हँकारा । तांते परिहैं नरक मँझारा ॥ कथा पुराण औरहिँ समुझे हैं । चाल बिहून आपन दुख पैहैं ॥
१ पुराने ग्रन्थोंमें यह चौपाई इस प्रकार है—
सावित्री अस वचन उचारी । मानो निश्चय वचन हमारी
नं. २ कबीरसागर ३
अद्याका गायत्री को शाप देना
( ३८ )
अनुरागसागर
उनसे और सुनैँ जो ज्ञाना । करिसो भक्ति कहाँ परमाना॥ और देवको अंश लखैहैं । औरन निन्द काल मुख जेहै॥ देवन पूजा बहु विधि लैहैं । दछिना कारण गला कटै हैं॥ जा कहा शिष्य करै पुनि जाई । परमारथ तिहि नहिं लखायी॥ परमारथके निकट न जेहैं । स्वारथ अर्थ सबै समुझैहैं॥ आप स्वारथी ज्ञान सुनैहैं । आपनि पूजा जगत दृढ़ै हैं॥ आप ऊंच औरहि कहै छोटा । ब्रह्मा तोर सखा होइ खोटा ॥
कबीर वचन धर्मदासप्रति
जब माता अस कीन्ह प्रहारा । ब्रह्मा मूर्छित महीकर धारा ॥
अद्याकागायत्रीको शाप देना
गायत्री जान्यो तेहि वारा । हुए है तोर पंच भरतारा ॥ गायत्री तोर होई वृषभ भर्तारि । सांत पांच और बहुत पसारि॥ धर औतार अखज तुम खायी । कहा जानियह दीन्ही सारखी॥ निजस्वारथ तुम मिथ्या भारी । कहा जानियह दीन्ही सारखी॥ मानि शाप गायत्री लीन्ही । सावित्रिहि तबचितवन कीन्ही॥
अद्याका सावित्री को शाप देना
पुढुपावति निजमान धरायेहु । मिथ्या कहनिजजन्मनशायेहु॥ सुनहुपुष्पावतितुम्हरोविश्वासा । नहिं पूजिहैं तुम्हसे कछु आशा॥ होय कुगंध ठौर तव बासा । भुगतहु नरक कामगहि आशा॥ जो तोहि सींच लगावे जानी । ताकर होय वंशकी हानी ॥ अब तुम जाय धरौ औतारा । कयोडा केतकी नाम तुम्हारा॥
कबीर वचन धर्मदासप्रति छन्द
भये शापवश तीनों विकलमति, हीनछीन कुकर्मते॥ यह काल कलाप्रचंडकामिनि, डस्यो सब कहैं चर्मते ॥
शाप देने पर अद्याका पश्चात्ताप और निरंजनके डरसे डरना और शाप पाना, निडर होना
अवुरागसागर
( ३९ )
ब्रह्मादि शिवसनकादिनारदको उन बचि भागहो ॥ सुनुधरमनिविरलाबच शब्द सतसो लागि हो ॥२८॥ सो-० सत्य शब्द परताप, कालकला व्यापै नहीं ॥ निकट न आवै पाप, मनवच कर्म जो पदगहे ॥२९॥
शाप देदेने पर अधाका पश्चाताप और निरंजनके डरसे डरना । छन्द
शाप तीनोंको दैलियो मन माहीं तब पछतावई ॥ कस करहि मोहि निरंजनापल छमा मोहि नआवई ॥
निरंजनका अधाको शाप देना
आकाशबानी तबै भयी यहू काह कीन भवानिया ॥ उत्पत्तिकारणतोहिपठाई कहा चरित यह ठानिया ॥ सो-० नीचहि ऊच सिताय, बदल मोहि सोपावई ॥ द्वापर युग जब आय तुमहिं पञ्च भर्तार हो ॥३०॥
अधाका निडर होना । कबीर वचन धर्मदासप्रति
शाप ओयल जब सुनेउ भवानी । मनसन गुने कहा नहि बानी ॥ ओयल प्रभाव शाप हम पाया । अब कहा करब निरंजनराया ॥ तोरे वस परी हम आई । जस चाहौ तस करौ मितार्ई ॥
विष्णुका गौरसे श्याम होने का कारण अधावचन विष्णुप्रति
पुनि कहि माता विष्णु दुलारा । सुनहु पुत्र इकवचन हमारा ॥ सत्य सत्य तुम कहौ बुझाई । पितुपद परसन जब गै भाई ॥ प्रथमहु तो तुम गौर शरीरा । कारण कौन श्याम भये धीरा ॥
विष्णुवचन अधा प्रति
आज्ञा पाय हम तत्काला । पितुपद परसन चले पताला ॥ अक्षत पुहुप लीन्ह करमाहां । चले पताल पंथ मग जाहां ॥ पहुँचि शेष नाग पहुँ गयऊ । विषके तेज हम अलसयऊ ॥
अद्याका विष्णुकी ज्योतिका दर्शन करना
( ४० )
अनुरागसागर
भयो श्याम विषतेज समावा । भइ अवाज अस वचन सुनावा ॥ अहो विष्णु माता पहुँ जाई । वचन सत्य कहियो समुझाई ॥ सतयुग त्रेता जैसे जबही । द्वापर है चौथा पद तबही ॥ तब तुम होहु कृष्ण अवतारा । लैहौ ओयलसो कही विचारा ॥ नाथ हु नाग कलिन्दी जाई । अब तुम जाहु विलंब न लाई ॥ ऊंच होइके नीच सतावे । ताकर ओयल मोहिसो पावे ॥ जो जिव देई पीर पुनि काहू । हम पुनि ओयल दिखावे ताहू ॥ पहुँचे हम तब ही तुव पास । कीन्हैउ सत्य बचन परकाशा ॥ भेटउ नाहि मोहि पद ताता । विषज्वाला साँवल भो गाता ॥ व्याकुल भयो तवै फिर आयो । पितु पद दर्शन मैं नहि पायो ॥
अवाका विष्णुको ज्योतिका दर्शन कराना
इतना सुनि हर्षित भइ माई । लीन्ह विष्णु कहैं गोद उठाई ॥ पुनि अस कहेउ आदि भवानी । अब सुनहु पुत्रप्रियममबानी ॥ देख पुत्र तोहि पिता भिटावों । तोरे मन कर धोख मिटावों ॥ प्रथमहि ज्ञान दृष्टिसों देखो । मोर वचन निजहृदय परेखो ॥ मनस्वरूप करता कहैं जानो । मनते दूजा और न मानो ॥ स्वर्ग पताल दौर मन केरा । मन अस्थिर मन अहै अनेरा ॥ क्षणमहैं कला अनन्त दिखावे । मनकहैं देख कोइ नहि पावे ॥ निराकार मनहीको कहिये । मनकी आशा दिवस निशि रहिये ॥ देखहु पलटि शून्यमह जोती । जहवां झिलमिलझालर होती ॥ फेरहु श्वास गगन कह धायो । मार्ग अकाशहि ध्यान लगायो ॥ जैसे माता कहि समुझावा । तैसे विष्णु ध्यान मन लावा ॥
छन्द
पेठि गुंफा ध्यान कीन्हो श्वास संयम लायके ॥ पवन धूँका दियो जबते गगन गरज्यो आयके ॥
ज्योतिदर्शन रहस्य
अवुरागसागर
( ४१ )
बाजासुनततबमगनभापुनिकीन्हमनकसख्यालहो ॥ शून्यस्वेतपीतसब्जलालदियायरंगजगालहो ॥३०॥ सो०-ताहपीछे धर्मदास, मनपनि आपदिखायल ॥ कीन्ह ज्योति परकास, देखि विष्णु हरित भये३०॥ मातहि नायो शीश, बहु अधीन पुनि विष्णुभा ॥ मैं देखा जगदीश, हे जननी परसाद तुव ॥ ३१ ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास गहि टेके पाया । हे साहिबइकसंशय आया ॥ कन्या मनको ध्यान बतावा । सो यह सकल जीव भरमावा॥
सदगुरु वचन
धर्मदास यह काल स्वभाऊ । पुरुष भेद विष्णु नहीं पाऊ ॥ कामिनिकी यह देखहु बाजी । अमृतगोय दियो विष साजी ॥ जात काल दूजा जनिजानहु । निरखि धर्म सत्यहिं पुरआनहु ॥ प्रगट सु तोहि कहो ससुझाई । धर्मदास परखहु चितलाई ॥ जब परगट तस गुप्त सुभाऊ । जोरह हृदय सो बाहर आऊ ॥ जब दीपक बारे नर लोई । देखहु ज्योति सुभाव विलोई ॥ देखत ज्योति पतंग हुलासा । प्रीति जान आवै तिहिपासा ॥ परसत होवे भसम पतंगा । अनजाने जरि परहि मतंगा ॥ ज्योतिस्वरूपकाल अस आही । कठिनकाल यह छांडत नाही ॥ कोटि विष्णु औतारहि खाया । ब्रह्मा रुद्रहि खाय नचाया ॥ कौन विपति जीवनकी कहऊँ । परखि वचन निज सहजहि रहऊँ ॥ लाख जीव वह नित्यहि खाई । असविकरालसोकालकसाई ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कह सुनहुँ गुसाई । मोरे चित संशय असआई ॥ अष्टंगीहि पुरुष उत्पानी । जिहिविधि उपजी सो मैं जानी ॥
मायाका विष्णुको सर्व प्रथम बनाना
( ४२ )
अनुरागसागर
पुनि वहि मास लीन्ह धमराई । पुरुष प्रताप सु बाहर आई ॥ सो अछंगीहि असछल कीन्ह । गोइसि पुरुष प्रगटयम कीन्ह ॥ पुरुष भेद नहि सुनन बतावा । कालनिरञ्जन ध्यान करावा ॥ यह कस चरित कीन्ह अछंगी । ताजा पुरुष भइकाल किसंगी ॥
सद्गुरु वचन
धर्म सुनहु जन नारि सुभाऊ । अब तुहि प्रगटवरणिसमझाऊ ॥ होय पुत्री जेहि घर माहीं । अनेक जतन परितोषै ताहीं ॥ वन्न भक्ष सुख सेज निवासा । घरबाहर सब तिहि विश्वासा ॥ यज्ञ कराय देय पितु माता । बिदाकीन्हहितप्रीतिसों ताता ॥ गयी सुता जब स्वामी गेहा । रात्या तासु संग गुण नेहा ॥ माता पिता सबै बिसरावा । धर्मदास अस नारि स्वभावा ॥ ताते अद्या भई बिगानी । काल अंग है रही भवानी ॥ ताते पुरुष प्रगटने लायी । कालरूप विष्णुहि दिखलायी ॥
धर्मदासवचन कबीर प्रति
हे साहब यह जान्यो भेदा । अब आगेका करहु उछेदा ॥
कबीर वचन धर्मदास प्रति
पुनि माता कहि विष्णु दुलारा । मरद्यो मान जेठ निजबारा ॥ अहो विष्णु तुम लेहु अशीशा । सब देवनमें तुमहीं ईशा ॥ जो इच्छा तुम चितमें धरिहौं । सो तब तोर काज मैं करिहौं ॥
मायाका विष्णुको सर्वप्रधान बनाना
प्रथम पुत्रब्रह्म दुरि गयऊ । अकरमझूठिताहि प्रिय भयऊ ॥ देवन श्रेष्ठ तुमहि कहैं मातहि । तुम्हारी पूजा सब कोई ठानहि ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
कृपा वचन अस माते भाखा । सबते श्रेष्ठ विणुकह राखा ॥ माता गयी रुद्रके पास । देख रुद्र अति भये हुलासा ॥
अद्याका महेशको वरदान देना
अनुरागसागर
( ४३ )
अद्याका महेशकी बरदान देना
पुनि लहुरा कहैं पूछे माता । तुम शिव कहो हृदयकी वाता ॥ माँगहु जो तुम्हरे चित भावे । सो तोहि देख माता फुरमावे ॥ दोउ पुत्रन कहैं मात हदावा । माँग महेश जो मनभावा ॥
महेशवचन
जोरि पानि शिवकहबे लीन्हा । देहु जननि जो आज्ञा कीन्हा ॥ कबहिं न विनसे मेरी देही । हे माता मागों वर एही ॥ हे जननी यह कीजै दया । कबहु न विनशै मेरी काया ॥
अद्यावचन
कह अछंगी अस नहीं होई । दूसरा अमर भयो नहिंकोई ॥ करहु योग तप पवन सनेहा । रहै चार युग तुम्हरी देहा ॥ जौलौं पृथ्वी अकाश सनेही । कबहु न विनशै तुम्हरी देही ॥
धर्मदासवचन
धर्मदास विनती चित लाई । ज्ञानि मोहि कहो समुझाई ॥ यह तो सकल भेद हम पायी । अब ब्रह्माको कहो उथायी ॥ अद्या शाप ताहि कहैं दीन्हा । तेहि पीछे ब्रह्मा कस कीन्हा ॥
कबीर वचन
विष्णु महेश जबै वर पाये । भये आनन्द अतिहि हरषाये ॥ दोनो जने हरष मन कीन्हा । ब्रह्मा भयो मान मद हीना ॥ धर्मदास मैं सब कुछ जानों । भिन्न भिन्न कर प्रगट बखानों ॥
शाप पानेके कारण दुःखित हो ब्रह्मा विष्णुके पास जाकर
अपना दुःख कहना और विष्णुका उसे आश्वासन देना
ब्रह्मा मनमें भयो उदासा । तब चलि गयो विष्णुके पास ॥
ब्रह्मावचन विष्णुप्रति
जाय विष्णुसे बिन्ती ठाना । तुम हो बंधु देव परधाना ॥ तुम पर माता भई दयाला । शाप विवश तुम भये बिहाला ॥
( ४४ )
अनुरागसागर
निज करनी बल पायेहो भाई । किहि विधि दोष लगाऊँ माई ॥ अब अस जतन करोहो भ्राता । चले परिवारे वचन रहै माता ॥
विष्णुवचन
कहे विष्णु छोड़ो मन भंगा । मैं करिहौं सेवकाई संगा ॥ तुम जेठे हम लहुरे भाई । चित संशय सब देहु बहाई ॥ जो कोइ होवे भक्त हमारा । सो सेवै तुम्हारो परिवारा ॥
छन्द
जगमाहि एस दिढाई हौं फलपुन्य आशा जोयहो ॥ यज्ञ धर्म रु करे पूजा द्विज बिना नहिं होय हो ॥ जो करे सेवा द्विजनकी तेहि महापुण्य प्रभावहो ॥ सो जीवमोकहै अधिकप्यारेराखिहौं निज ठाँवहो ॥ ३१
कबीरवचन धर्मदासप्रति
सो ०-ब्रह्मा भये अनंद, जबहि विष्णु असमापेऊ ॥ मेटेउ चितकर दंड, सखा मोर सब सुखीभी ॥ ३२ ॥
कालप्रपंच
देखहु धर्मनि काल पसारा । इन ठग ठग्यो सकल संसारा ॥ आशा दै जीवन बिलपावै । जन्म जन्म पुनि ताहि सतावै ॥ बलि हरिचंद बेतु बइरोचन । कुंती सुत औरौ महिसोचन ॥ ये सब त्यागी दानि नरेशा । इन कहैं ले राखे केहि देशा ॥ जस गंजत इन सबकी कीन्ह। सो जग जानेकाल अधीना ॥ जानत है जग होय न शुद्धी । कालअमरबलसबकी हरबुद्धी ॥ मन तरंगमें जीव भुलाना । निजघर उलटिनचीन्ह अजाना ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कह सुनो गुसाई । तबकी कथा मोहि समुझाई ॥ तुम प्रसाद जमको छल चीन्हा । निश्चय तुम्हरे पदचित दीन्ह ॥
गायत्रीका अद्याको शाप देना
अनुरागसागर
( ४६ )
भव बूझत तुमसी गहि राखा । शब्द सुधारस मोसन भाखा ॥ अब वह कथा कहो समुझाई । शाप अंत किया कौन उपाई ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति गायत्रीके अक्षाको शाप देनेका वृत्तान्त
धर्मनि तुम सन कहो बखानी । भाषो ज्ञान अगमकी बानी ॥ मातु शाप गायत्री लीन्हा । उलटि शाप पुनिमातहिंदीन्हा हम जो पांच पुरुषकी जोई । पांचोंकी तुम माता होई ॥ बिना पुरुषकी तू जिनि है बारा । सो जानही सकल संसारा ॥ दुहुनु शाप फल पायो भाई । उगरह भयो देह धरि आई ॥
जगतकी रचनाका विशेष वृत्तान्त
यह सब द्रंद बाद है गयऊ । तब पुनि जगकी रचना भयऊ चौरासी लख योनिन भाऊ । चार खानि चारिहु निरमाऊ ॥
छन्द
प्रथम अंडजरच्यो जननी, चतुरमुखपिण्डजकियो ॥ विष्णु उष्मज रच्यो तबहीं, रुद्र स्थावर लियो ॥ लीन्ह रचि जेहि खानि चारों, जीव बंधनदीन्हहो ॥ होन लागी कृषीकारण, करण कर्ता चीन्हहो ॥ सो०—यहि विधि चारो खानि, चारहु दिशि विस्तार किया धर्मदास चित जान, वाणी चारि उचारको ॥३३॥
धर्मदास वचन कबीरप्रति
धर्मनि कहैं जोरि युग पानी । तुम सद्गुरु यह कहो बखानी ॥ चार खानिकी उत्पति भाऊ । भिन्न भिन्न मुहि वरणि सुनाऊ ॥ चौरासी लख योनिन धारा । कौन योनि केतिक विस्तारा ॥
चार खानकी गिनती । कबीरवचन धर्मदास प्रति
कह कबीर सुन धर्मनि बानी । योनि भावतोहि कही बखानी ॥ भिन्न भिन्न सब कहु समुझाऊं । तुमसे अन्त न कछु दुराऊं ॥ तुम जिन शंका मानहु भाई । वचन हमार गहो चितलाई ॥
चौरासी लाख योनिकी गिनती
( ४६ )
अनुरागसागर
चौरासी लाख योनिकी गिनती
नौ लख जलके जीव बखानी । चौदह लाख पक्षी परवानी ॥ किरम कोट सत्ताइस लाख । तीन लाख अस्थावर भाखा ॥ चतुर लक्ष मानुष परमाना । मानुष देह परम पद जाना ॥ और योनि परिचय नहीं पावे । कर्म बंध भव भटका खावे ॥
मनुष्य खानि सवते अधिक क्यों है ? धर्मदासवचन
धर्मदास नायो पद शीशा । यह समुझाय कहो जगदीशा ॥ सकल योनि जिव एकसमाना । किमिकारण नहीं इसमझाना ॥ सो चरित्र मुनि कहौ बुझाई । जाते चित संशय मिटिजाई ॥
सद्गुरुवचन
सुनु धर्मनि निज अंश अभूषण । तोहि बुझाय कहौ यह दूषण ॥ चार खानि जिव एकै आहीं । तत्त्व विशेष अहैं सुन ताहीं ॥ सो अब तुमसों कहों बखानी । तत्त्व विशेष अहैं सुन ताहीं ॥ ऊष्मज दोय तत्त्व परमाना । अंडज तीन तत्त्व गुण जाना ॥ पिण्डज चार तत्त्व गुण कहिये । पांच तत्त्व मानुष तन लहिये ॥ तासों होय ज्ञान अधिकारी । नरकी देह भक्ति अनुसारी ॥
किन २ खानिमें कौन २ तत्त्व है । धर्मदासवचन कबीरप्रति
हे साहिब मुहि कहु समुझाई । कौन कौन तत्त्व इन सब पाई ॥ अंडज अरु पिंडजके संग । ऊष्मज और अस्थावर अंगा ॥ सो साहिब मोहि वरणि सुनाओ । करो दया जनि मोहि दुराओ ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति छन्द
सतगुरु कहैं सुन दास, धर्मनि तत्त्व खानिनिवेरनो ॥ जाहि खानि जो तत्त्व दीन्हौ, कहौ तुमसो टेरनो ॥
१ इस पदको कई प्रतियोंमें लिखा है ।
सकल जिवन जिव एक समाना । नर सब औरनको नहीं जाना