भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ३० )

अनुरागसागर

छन्द

ब्रह्मा कहे जननी सुनौ, कहहु कन्त तुम्हार है ॥ कीजै कृपा जनि मोहि दुरावो, कहाँ पिता हमार है ॥

अद्यावचन ब्रह्माप्रति

कहे जननी सुनहु ब्रह्मा, कोउ नहिं जनक तुम्हार हो ॥ हमहिते भई सब उत्पति, हमहि सब कीन सम्हार हो ॥ २१ ॥

ब्रह्मावचन अद्याप्रति

सोरठा-ब्रह्मा कहे पुकार, सुनु जननी तैं चित्त दे ॥ कहत वेद निस्वार, पुरुष एक सौगुप्त है ॥ २२ ॥

अद्यावचन ब्रह्माप्रति

कहे अद्या सुनु ब्रह्मकुमारा । मोसे नहिं कोउ क्षण न्यारा ॥ स्वर्ग मृत्यु पाताल बनाई । सात समुन्दर हम निरमाई ॥

ब्रह्मावचन अद्याप्रति

मानो वचन तुमहि सब कीन्हा । प्रथमगुप्त तुम कसरखलीन्हा ॥ जबै वेद मोहि कहै बुझाई । अलखनिरंजन पुरुष बताई ॥ अब तुम आप बनो करतारा । प्रथम कहेन किया विचारा ॥ जो तुम वेद आप कथि राखा । तोकसतुम अलखनिरंजन भाखा आपे आप आप निरमाई । काहे न कथन कीन तुम माई ॥ अब मोसन तुम छल जनिकरहु । सांचे सांच सब कहि उच्चरहु ॥ जब ब्रह्मा यहि विधि हठाना । तब अध्यामन कीन्हतिवाना ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

केहि विधि याहि कहैं समझाई । विधि नहिं मानत मोर बड़ाई ॥ जो यदि कहाँ निरंजन वाता । केहि विधि समझे यह विख्याता ॥ प्रथम कह्यो निरंजन राई । मोर दर्श काहु नहि पाई ॥ जबै जो यहीं अलख लखावों । केहि विधि कहिता को दिखलावों ॥