भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 169

अवुरागसागर

( ४१ )

बाजासुनततबमगनभापुनिकीन्हमनकसख्यालहो ॥ शून्यस्वेतपीतसब्जलालदियायरंगजगालहो ॥३०॥ सो०-ताहपीछे धर्मदास, मनपनि आपदिखायल ॥ कीन्ह ज्योति परकास, देखि विष्णु हरित भये३०॥ मातहि नायो शीश, बहु अधीन पुनि विष्णुभा ॥ मैं देखा जगदीश, हे जननी परसाद तुव ॥ ३१ ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास गहि टेके पाया । हे साहिबइकसंशय आया ॥ कन्या मनको ध्यान बतावा । सो यह सकल जीव भरमावा॥

सदगुरु वचन

धर्मदास यह काल स्वभाऊ । पुरुष भेद विष्णु नहीं पाऊ ॥ कामिनिकी यह देखहु बाजी । अमृतगोय दियो विष साजी ॥ जात काल दूजा जनिजानहु । निरखि धर्म सत्यहिं पुरआनहु ॥ प्रगट सु तोहि कहो ससुझाई । धर्मदास परखहु चितलाई ॥ जब परगट तस गुप्त सुभाऊ । जोरह हृदय सो बाहर आऊ ॥ जब दीपक बारे नर लोई । देखहु ज्योति सुभाव विलोई ॥ देखत ज्योति पतंग हुलासा । प्रीति जान आवै तिहिपासा ॥ परसत होवे भसम पतंगा । अनजाने जरि परहि मतंगा ॥ ज्योतिस्वरूपकाल अस आही । कठिनकाल यह छांडत नाही ॥ कोटि विष्णु औतारहि खाया । ब्रह्मा रुद्रहि खाय नचाया ॥ कौन विपति जीवनकी कहऊँ । परखि वचन निज सहजहि रहऊँ ॥ लाख जीव वह नित्यहि खाई । असविकरालसोकालकसाई ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास कह सुनहुँ गुसाई । मोरे चित संशय असआई ॥ अष्टंगीहि पुरुष उत्पानी । जिहिविधि उपजी सो मैं जानी ॥