कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
गुरु महिमा
( ६८ )
अनुरागसागर
छन इक जीवन कहँ सुख दयऊ । जीव प्रबोध पुरुष पहुँ गयऊ ॥ छन इक जीवन कहँ सुख दीन्हा । जीवन कह्यो ज्ञानको चीन्हा ॥ जब तुम देह धरो जग जाई । तब हम शब्द कहब गोहराई ॥ जौ गहि हो सत नामकी डोरी । तब आनब हम जमसे छोरी ॥ जीव परमोधि पुरुष पहुँ गयऊ । जीवनको दुख वरनि सुनयऊ ॥ पुरुष दयाला दयानिधि स्वामी । जिनके मूल अमान अकामी ॥ कह्यो मोहिँ बहुविधि समुझाई । जीवन आनों शब्द चेताई ॥
धर्मदासवचन
धर्मदास अस विनती लायी । ज्ञानी मोहिँ कहो समझायी ॥ जो कछु पुरुष शब्द सुख भाखो । सो साहिब मोहि गोयन राखो ॥ कौन शब्दते जीव उबारा । सो साहिब सब कहो बिचारा ॥
सदगुरुवचन
पुरुष मोहि जैसे फुरमायी । सो सब तुमसों संधिलखायी ॥ केहेउ मोहि बहुविधिसमझायी । जीवहि आनो शब्द चितायी ॥ गुप्त वस्तु प्रभु मोकहँ दीन्हा । नाम विदेह मुक्तिकर चीन्हऽ ॥ दीन्ह पात परवाना हाथा । संधिछाप मोहि सौंप्यो नाथा ॥ बिनु रसनाते सो धुनि होई । गुरुगमते लखि पावे कोई ॥ पंच अमीय मुक्तिका मूला । जाते मिटे गर्भ अस्थूला ॥ यहि विधि नाम गहे जो हँसा । तारौ तासु इकोतर बँसा ॥ नाम डोरि गहि लोकहि जायी । धर्मराय तिहि देखि डरायी ॥ ज्ञानी करो शिष्य जेहि जाई । तिनका तोरो जल अँचवाई ॥ जिहि विधि दीन्ह तुमहि मैं पाना । तेहि विधि देहु शिष्य सहिदाना ॥
गुरुमहिमा
गुरुमुख शब्द सदा उर राखे । निशिदिन नाम सुधारस चाखे ॥ पियानेह जिमि कामिनि लागे । तिमिर गुरुरूप शिष्य अनुरागे
शुकदेवकी कथा
अनुरागसागर
( ६९ )
पल पल निरखे गुरुमुखकान्ती । शिष्यचकोरगुरुशशिशान्ती॥ पतिव्रता ज्यों पतिव्रत ठाने । द्वितीयपुरुष सपने नहिं जाने॥ पतिव्रता दोड कुलहिं उजागर । यह गुण गहे संतमति आगग॥ ज्यों पतिव्रता पिया मन लावे । गुरु आज्ञा असशिष्य जुगावे॥ गुरुते अधिक और कोइ नाही । धर्मदास परखहु हिय माहीं ॥ गुरुते अधिक कोइ नहिं दूजा । भर्म तजै करि सतगुरुपूजा ॥ तीर्थ धाम देवल अरु देवा । शीश अपि जो लावैं सेवा ॥ तो नहिं वचन कहैं हितकारी । भूले भरमें यह संसारी ॥
छन्द
गुरु भक्ति अटल अमानधर्मनि, यहि सरस दूजा नहीं ॥ जप योगतप व्रतदान पूजा, तृणसदृश यह जग कहीं॥ सतगुरुदया जिहिसन्तपरतिहि, हृदययहि विधि आवई॥ ममगिरापरखेहरषिकेहिय, तिमिरमोहनशावई॥४३॥ सोरठा-दीपकसतगुरुज्ञान, निरखेहु सन्तअंजोरतोहि पावे मुक्ति अमान, सतगुरु जेहि दाय़ा करे ॥५४॥
शुकदेवजीकी कथा
शुकदेव भये गरभ जोगेशर । उन समान नहिं थाप्यो दूसरा॥ तपके तेज गये हरि धामा । गुरु बिन नहीं लहे विथामा ॥ विष्णु कहे ऋषिकहैवा आये । गुरु विहीन तप तेज झुलाये ॥ गुरु विहीन नर मोहि न भावे । फिर २ जो इन संकट आवे ॥ जाहु पलटिगुरुकरहु सयाना । सब पैहौं यहवां अस्थाना ॥ सुनिमुनिशुकदेव वेगि सिधाये । गुरुविहीन तहैं रहन न पाये ॥ जनक विदेह कीन्ह गुरुजानी । हरषि मिले तब सारंगपानी ॥ नारद ब्रह्मा सुत बड़ ज्ञानी । यह सब कथा जगतमें जानी॥
कबीर साहब का सत्यलोकसे चलकर निरंजनसे वार्तालाप करके पृथ्वीपर आनेका वृत्तांत
( ६० )
अनुरागसागर
और देव ऋषि मुनिवर जेते । जिन गुरुलीन्ह उत्तर सो तेते॥ जो गुरु मिले तो पंथ बतावे । सार असार परख दिखलावे॥ गुरु सोई जो सत्य बतावे । और गुरु कोइ काम न आवे॥ सत्य पुरुषके कहे सँदेशा । जन्म जन्मका मिटै अँदेशा॥ पाप पुन्यकी आशा नाहीं । बैठे अक्षय वृक्ष की छाँही ॥ भुङ्गी मत होवे जिहि पासा । सोइ गुरुसत्य सुनो धर्मदासा॥
छन्द
जो रहित घर बतलावई, सो गुरु सांचा मानिये ॥ तीन तजि मिलि जाय चौथ, तासुवचनपरमानिये ॥ पांच तीन अधीन काया, न्यार शब्द विदेह हैं ॥ देह माँहि विदेह दरशै, गुरुमत निज ए कहौं ॥४५॥ सोरठा-ध्यान विदेह समा, देह धरेका फल यहै ॥ नहि आवै नहि जाय, मिलइ देह विदेह होइ ॥४६॥ अस गुरु करे बनाय, बहुरि न जग देही धरे ॥ नहि आवे नहि जाय, जिहि सतगुरुदाया करे ॥४७॥
धर्मदासवचन
हे प्रभु मोहि कृतार्थ कीन्ह। पूर्ण भाग्य दरश सुहि दीन्ह॥ तव गुण मोसन वरणि न जाई। मो अचेत कहै लीन्ह जगाई ॥ सुधा वचन तुम मोहि प्रिय लागे। सुनतहि वचन मोह मद भागे ॥ अब वह कथा कहो समुझायी। जिहि विधि जगमें प्रथमें आयी॥
कबीरसाहबका सत्पुरुषकी आज्ञा पाकर जीवोंको चितानेके लिये चलना, निरंजनसे भेंट होना और उससे बात चीत करके आगे बढ़ना
कबीरवचन
धर्मदास जो पूछ्यो मोही । युग युग कथा कहौं मैं तोही॥ जबही पुरुष आज्ञा कीन्ह। जीवनकाज पृथ्वी पग दीन्ह॥
योगजीत और धर्मरायका युद्ध
अनुरागसागर
( ६१ )
करि प्रणाम तबहीं पगु धारा । पहुँचे आय धर्म दरबारा ॥ प्रथमैं चलेउ जीवके काजा । पुरुष प्रताप शीशपर छाजा ॥ तेहि युग नाज अचिन्त कहाये । आज्ञा पुरुष जीव पहुँ आये ॥ आवत मिल्यो धर्म अन्याई । तिन पुनि हमसों रार बढ़ाई ॥ मो कहैं देखि धर्म ढिग आवा । महा क्रोध बोले अतुरावा ॥ योगजीत इहवाँ कस आवो । सो तुम हमसो वचन सुनावो ॥ कै तुम हमको मारन आओ । पुरुष वचन सो मोहि सुनायो ॥
योगजीत वचन
तासो कह्यो सुनो धर्मराई । जीव काज संसार सिधार्ई ॥ बहुरि कह्यो सुन सो अन्याई । तुम बहु कीन्ह कपट चतुराई ॥ जीवन कह तुम बहुत भुलावा । बार बार जीवन संतावा ॥ पुरुष भेद तुम गोपित राखा । आपन महिमा परगट भाखा ॥ तस शिलापर जीव जरावहु । जारि बारि निजस्वाद करावहु ॥ तुम अस कष्ट जीव कह दीन्हा । तबहि पुरुष मोहि आज्ञा कीन्हा ॥ जीव चिताय लोक लै जाऊं । काल कष्टसे जीव बचाऊं ॥ ताते हम संसारहि जायब । दे परवाना लोक पठायब ॥
धर्मराय वचन
यह सुनि काल भयंकर भयऊ । हम कहैं त्रास दिखावन लयऊ ॥ सत्तर युग हम सेवा कीन्ही । राज बढ़ाइ पुरुष मुहि दीन्ही ॥ फिर चौंसठ युग सेवा ठयऊ । अष्ट खंड पुरुष मुहि दयऊ ॥ तब तुम मारि निकारे मोही । योगजीत नहि छांड़ी तोही ॥ अब हम जान भली विधि पावा । मारों तोहि लेउँ अब दावा ॥
योगजीत वचन
तब हम कहा सुनो धर्मराया । हम तुम्हरे डर नाहि डराया ॥ हम कहैं तेज पुरुष बल आही । अरे काल तुव डर मोहि नाही ॥
निरंजनका अपने जालका वर्णन करना
( ६२ )
अनुरागसागर
पुरुष प्रताप सुमिरितिहि बारा । शब्द अंगते कालहि सारा ॥ ततछण दृष्टि ताहि पर हेरा । श्यामललाट भयो तिहि केरा ॥ पंख घात जस होय पँखेरू । ऐसे काल मोहि पहाँ हेरू ॥ करे कोध कछु नाहिँ बसाई । तब पुनि परेउ चरण तर आई ॥
धर्मरायवचन छन्द
कह निरंजन सुनो ज्ञानी, करो विनती तोहिसों ॥ जान बन्धु विरोध कीन्हों, घाट भयी अब मोहिसों ॥ पुरुष सम अब तोहि जानों नहिँ दूजी भावना ॥ तुम बड़े सर्वज्ञ साहिब, क्षमा छत्र तनावना ॥ ४५ ॥ सो०—तुमहूँ करो बखशीश, पुरुष दीन्ह जसराजमुहिँ ॥ षोडशमहँ तुम ईश, ज्ञानी पुरुष एकसम ॥ ४८ ॥
ज्ञानो वचन
कह ज्ञानी सुनु राय निरंजन । तुम तो भये वंशमें अज्ञन ॥ जीवन कहँ मैं आनव जाई । सत्य शब्द सत नाम हदाई ॥ पुरुष आज्ञाते हम चलि आये । भौ सागरते जीव सुत्काये ॥ पुरुष अवाज टारु यहि बारा । छनमहँ तो कहँ देउँ निकारा ॥
धर्मराय वचन
धर्मराय अस विनती ठानी । मैं सेवक द्वितीया नहिँ जानी ॥ ज्ञानी विनती एक हमारा । सो नकरहु जिहि मोर विगारा ॥ पुरुष दीन्ह जस मोंकहँ राजू । तुमहूँ देहु तो होवे काजू ॥ अब हम वचन तुम्हारो मानी । लीजो हंसा हम सो ज्ञानी ॥ विनती एक करो तुहि ताता । हट कर मानो हमरी बाता ॥ कहा तुम्हारो जीव नहिँ मानहिँ । हमरी दिशिहै बादबखानिहिँ ॥ हट फन्द हैं रचा बनायी । जामें जीव रहे उरझायी ॥ वेदशास्त्र सुमिरिति गुणनाना । पुत्री तीन देवन परधाना ॥
निरंजनके जाल काटनेका हथियार
अनुरागसागर
( ६३ )
तिनहू बहु बाजी रचि राखा । हमरी डोरि ज्ञानमुखिभाखा॥ देवल देव पखान पुजार्ह । तीरथ व्रत जप तप मनलाई॥ पूजा विश्व बलिदेव अपराधी । यहि मति जीवनराख्यो बांधी॥ जग्य होम अहू नेम अचारा । और अनेक फन्द मैं डारा ॥ जो ज्ञानी जैहो संसारा । जीव न माने कहा तुम्हारा ॥
ज्ञानीवचन
ज्ञानी कहे सुनो अन्याई । काटों फन्द जीव ले जाई ॥ जैतिक फन्द तुम रचे विचारी । सत्य शब्दते सबै बिडारी ॥ जौन जीव हम शब्द दृढ़ावे । फंद तुम्हार सकल मुक्तावे ॥ जबजीव चिन्हा है शब्द हमारा । तजहि भरम सब तोर पसारा ॥ सत्य नाम जीवन समझायब । हंस उबार लोक ले जायब ॥
छन्द
देहैं सत्यशब्ददिदायहंसहि, दयाशील क्षमाघनी ॥ सहज सील सन्तोषसारा, आत्मपूजा गुन धनी ॥ पुरुष सुमिरन सार वीरा, नाम अविचल गाइहौं ॥ शीस तुम्हरे पाँव देके, हंसहि लोक पठाइहौं ॥४६॥ सो०-अमीनाम विस्तार, हंसहि देह चिताइहौं ॥ मरदहि मात्र तुम्हार, धर्मदास सुनु चित्तदे ॥४९॥ चौका करी परवाना पाई । पुरुषनाम तिहि सेउँ चिन्हाई ॥ ताके निकट काल नहि आवे । संधि देख ताकहैं शिर नावे ॥ इतना सुनत काल सकाना । हाथ जोरिके विनती ठाना ॥ दयावन्त तुम साहिब दाता । एतिक कृपा करो हो ताता ॥ पुरुष शाप मोकहैं अस दीन्हा।लच्छजीव नित आसन कीन्हा ॥
धर्मरायवचन
कबीरसाहबका निरंजनसे तीन युग हारकर चौथे युगमें पंथ चलानेकी प्रतिज्ञा करना और व्यालिसवेराकी बात कहना
( ६४ )
अनुरागसागर
जो जिव सकललोकतुव आवे। कैसे क्षुधा सो मोरि बतावे ॥ पुनि पुरुष मोपरदाया कीन्हा। भौसागर कहैं राजमुहि दीन्हा॥ तुमहूँ कृपा मोपर करहुँ। मांगो सो वर मुहि उच्चरहु॥ सतयुग त्रेता द्वापर माहीं। तीनहु युग जीव थोरे जाहीं ॥ चौथा युग जब कलियुग आवे। तब तुव शरण जीव बहु जावे॥ ऐसा वचन हार मुहि दीजे। तब संसार गवन तुम कीजे ॥
ज्ञानीवचन
अरे काल परंपंच पसारा। तीनों युग जीवन दुख डारा॥ विनती तोरि लीन्ह मैं जानी। मोकहैं ठगा काल अभिमानी॥ जस विनती तू मोसन कीन्ही। सो अबबसितोहि कहैं दीन्ही॥ चौथायुगजब कलियुग आये। तब हम आपन अंश पठाये॥
ॐन्द
सुरति आठों अशसुकृत, प्रगटि हैं जग जासके ॥ ता पीछे पुनि सुरतनौतन, जाय ग्रह धर्मदासके ॥ अंश ब्यालिस पुरुषके वे, जीवकारण आवई ॥ कलिपन्थ प्रगट पसारिके, वह जीव लोकपठावई ४७ सोरठा-शत्यशब्द दे साथ जिहि परवाना देइहैं ॥ सदा ताहि हम साथ, सोजिव यम नहि पाइ है ॥
धर्मराय वचन
हे साहिव तुम पन्थ चलाऊ। जीव उबार लोक ले जाऊ ॥ बंश छाप देखौं जेहि हाथा। ताहि हंस हम नाउब माथा ॥ पुरुष अवाज लीन्ह मैं मानी। विनती एक करो तुहिं ज्ञानी ॥
कालका अपना वाहर पन्थ चलनेकी बात कबीरसाहबसे कहना
पन्थ एक तुम आप चलाऊ। जीवन ले सत लोक पठाऊ॥ द्वादश पन्थ करों मैं साजा। नाम तुम्हार ले करों अवाजा॥
कालका जगन्नाथ स्थापना करनेका वरदान पाना
अनुरागसागर
( ६६ )
द्वादश यह यम संसार पठैहों। नाम तुम्हारे पंथ चलेहों ॥ मृतु अन्या इक दूत हमारा। सुकृत ग्रह लै है अवतारा ॥ प्रथम दूत मम प्रगटै जायी। पीछे अंश तुम्हारा आयी ॥ यहि विधि जीवनको भरमाऊँ। पुरुष नाम जीवन समझाऊँ ॥ द्वादश पंथ जीव जो ऐहैं सो। हमरे सुख आन समैं हैं ॥ एतिका विनती करो बनाई। कीजे कृपा देउ बगसाई ॥
कालका कवीरसाहबसे जगन्नाथ स्थापनाका
वरदान मांगना
कलियुगप्रथमचरणजबआयब। तब हम बौद्ध शरीर बनायब ॥ राजा इन्द्रदवन पहुँ जायब। जगन्नाथ हम नाम धरायब ॥ राजा मंडप मोर बनैहै। सागर नार खसावत जैहै ॥ पुत्र हमारा विष्णु तहँ आहीं। सागर ओइलसात तेहि पाहीं ॥ ताते मण्डप वचन न पाईं। उमँगे सागर लेइ डबाईं ॥ ज्ञानी एक मता निर्माऊं। प्रथमै सागर तीन सिधाऊं ॥ तुम कहैं सागर लांघि न जाईं। देखत उदधि रहे सुरझाईं ॥ यहि विधि मोकहँथापिहुजायी। पीछे आपन अंश पठायी ॥ भवसागर तुम पंथ चलाओ। पुरुष नामते जीव बचाओ ॥ सन्धि छाप मोहि देहु बतायी। पुरुष नाम मोहि देहु सुझायी ॥ विना सन्धि जो उतरै घाटा। सो हंसा नहिं पावे बाटा ॥
ज्ञानीवचन छन्द
धर्म जस तुम मांगहू सो, चरितहमभल चीन्हिया ॥ पंथद्वादश तुम कहेउ सो अमी घोर विष दीन्हिया ॥ जो मेटि डारों तोहिको अबपलटिकलादिसावऊँ ॥ लै जीवबन्द छुड़ाय यमसों अमरलोक सिधावऊँ ४८
धर्मरायका कबीर साहबको धोखा देकर उनसे गुप्त भेद पूछना
( ६६ )
अनुरागसागर
सो०—पुरुषवचनअसनाहिं,यहै साच चित कीन्हेऊ ॥ लै पहुँचावहुँ ताहि, सत्यशब्द जा टट गहे ॥ ५१ ॥ द्वादश पन्थ कहेउ अन्याई । सो हम तोहि दीन्ह बगसाई॥ पहिले प्रगटे दूत तुम्हारा । पीछे लेहि अंश औतारा ॥ उदधि तीर कहँ मैं चलि जायब । जगन्नाथको माड मडायब ॥ ता पाछे हम पन्थ चलायब । जीवन कहँ सतलोक पठायब॥
धर्मरायका कबीरसाहबको धोखा देकर उनके गुप्त भेदका पूछना
धर्मराय वचन
सन्धि छाप मोहि दीजे ज्ञानी । जस दैहौं हंसहि सहिदानी ॥ जो जिन मोकहँसन्धि बतावे । ताके निकट काल नहिं आवे ॥ नाम निसानी मो कहँ दीजे । हे साहिब यह दाया कीजे ॥
ज्ञानी वचन
जो तेहि देहु सन्धि लखाई । जीवन काज होइहो दुखदाई ॥ तुम परपंच जान हम पावा । काल चलै नहिं तुम्हरो दावा ॥ धर्मराय तेहि परगट भाखा । गुप्त अंक बीरा हम राखा ॥ जो कोई लेई नाम हमारा । ताहिछोड़ि तुम होहु नियारा ॥ जो तुम हंसहि रोको जायी । तो तुम काल रहन नहिं पायी ॥
धर्मराय वचन
कहे धर्म जाओ संसारा । आनहु जीव नाम आधार ॥ जो हंसा तुम्हरो गुण गाये । ताहिं निकट तो हम नहिंजाये ॥ जो कोई जैहै शरण तुम्हारा । हम शिर पग दै होवै पारा ॥ हम तो तुमसन कीन्ह ठिठाई । पिता जान कीन्हीं लरिकाई ॥ कोटिन औगुण बालक करई । पिता एकहिरदय नहिं धरई ॥ जो पितु बालक देह निकारी । तबको रक्षा करे हमारी ॥ धर्मराय उठ सीस नवायो । तब ज्ञानी संसार सिधायो ॥
कबीर साहबका ब्रह्मासे भेंट
अनुरागसागर
( ६७ )
कबीरबचन धर्मदासप्रति
जब हम देखा धर्म सकाना । तब तहवांते कीन्ह पयाना ॥ कह कबीर सुनु धर्मनि नागर । तब मैं चलि आयउँ भवसागर ॥
कबीरसाहेबकी ब्रह्मासे भेंट
आया चतुराननके पास । तासों कीन्ह शब्द परकाशा ॥ ब्रह्मा चित दै सुनवे लीन्हा । पूछयो बहुत पुरुषको चीन्हा ॥ तबहिं निरंजन कीन्ह उपाई । ज्येष्ठ पुत्र ब्रह्मा मोर जाई ॥ नीराजन मन घंट विराजै । ब्रह्मा बुद्धि फेरि उपराजै ॥
ब्रह्मावचन
निराकार निर्गुण अविनाशी । ज्योतिस्वरूप शून्यके वासी ॥ ताहि पुरुष कहैं वेद बखाने । आज्ञा वेद ताहि हम जाने ॥
कबीरसाहेबका विष्णुके पास पहुँचना
जब देखा तेहि कालहृदायो । तहैंते उठे विष्णु पहुँ आयो ॥ विष्णुहि कह्यो पुरुष उपदेशा । कालवशी नहिं गहे सँदेशा ॥
विष्णुवचन
कहे विष्णु मोसमको आही । चार पदार्थ हमरे पाही ॥ काम मोक्ष धर्मारथ साही । चाहे जैन देउँ मैं ताही ॥
ज्ञानी वचन
सुनहु सो विष्णु मोक्षकस तोही । मोक्ष अक्षर परले तर होही ॥ तुम नहिं थिर थिर कस करहु । मिथ्या साखि कवण गुण भरहु ॥
कबीरबचन धर्मदासप्रति
रहे सकुच सुन निर्भय बानी । निजहिय विष्णु आपडरमानी ॥ तब पुनि नागलोक चलि गयऊ । तासे कुछकुछ कहिबे लयऊ ॥ पुरुष भेद कोउ जानत नाहीं । लागे सभे कालकी छाहीं ॥ राखनहार कहैं चीन्हों भाई । यहसों को तुहि लेइ छुड़ाई ॥ ब्रह्मा विष्णु रुद्र जिहि ध्यावैं । वेदे जासु गुण निशिदिन गावैं ॥
कबीर साहबका नागलोकमें जाना और शेषनागसे वार्तालाप
( ६८ )
अनुरागसागर
सोह पुरुष तेहि राखनहारा । सोह तुमहि लै करिहै गारा ॥ राखनिहार और कोउ आही । करु विश्वास मिलाऊँ ताही ॥ शेष खानि विष तेज सुभाऊ । वचन प्रतीत हृदय नहीं आऊ ॥ सुनहु सुलक्षण धर्मनि नागर । उब मैं आयउँ या भवसागर ॥ आये जब मृत्युमण्डल माहीं । पुरुषजीव कोउ देख्यो नाहीं ॥ काकहँ कहिय पुरुष उपदेशा । सा तो अधिकै यमको भेषा ॥ जो घातक ताको विश्वासा । जो रक्षक तेहि बोल उदासा ॥ जाहि जपै सोई धरि खाई । तब ममशब्द चेत चित आई ॥ जीव मोहवश चीन्हे ताही । तब अस भाव उपज हियमाहीं ॥
छन्द
मेटि डारो काल शाखा, प्रगट काल दिखावउँ ॥ लेऊँ जीवन छोरि यमसो, अमरलोक पठावउँ ॥ जाहि कारण रटत डोलों, सो मोकहैं चीन्हई ॥ कालके वश परे जीव सब, तजि सुधाविषलीन्हई ॥ सो०-पुरुषवचन असनाहि, यही सोच चित कीन्हऊ ॥ ले पहुँचायो ताहि, शब्द परख दृढको गहे ॥ ५२ ॥ पुनि जस चरित भयो धर्मदासा । सो सब बरनि कहों तुवपासा ॥ ब्रह्मा विष्णु शंभु सनकादी । सब मिलि कीन्ही शून्य समाधी ॥ कवन नाम सुमिरो करतारा । कवनहि नाम ध्यान अनुसारा ॥ सबहि शून्यमहँ ध्यान लगाये । स्वाति सनेह सीप ज्यों लाये ॥ तबहि निरंजन जतन विचारा । शून्य गुफाते शब्द उचारा ॥ ररां सु शब्द उठा बहुबारा । मा अक्षर माया संचारा ॥ दोउ अक्षर कहैं समके राखा । रामनाम सबहिनि अभिलाषा ॥ रामनाम लै जगहि दृढायो । काल फन्द कोइ चीन्हन पायो ॥ यह विधि रामनाम उत्पानी । धर्मनि परख लेहु यह बानी ॥
सत्यगुप्त सत्पुरुष (कबीर साहब) के पृथ्वीपर आनेकी कथा
अनुरागसागर
( ६९ )
धर्मदास वचन
धर्मदास कहे सतगुरु पूरा । छूटेउ तिमिर ज्ञान तुव सुरा॥ माया मोह घोर अँधियारा । तामहँ जीव परे बिकारा ॥ जब तुव ज्ञान प्रगट है माना । छूटे मोह शब्द परखाना ॥ धन्य भाग हम तुम कहँ पायी । मोहि अधम कहँ लीन्ह जगायी॥ अब वह कथा कहों समुझायी । सतयुग कौन जीव सुकताई ॥
सत्ययुगमें सतसुकृत ( कबीरसाहब ) के पृथ्वीपर
आनेकी कथा । सद्गुरुवचन
धर्मदास सुनु सतयुग भाऊ । जिन जीवनको नाम सुनाऊ ॥ सतयुग सत्सुकृत मम नाऊँ । आज्ञा पुरुष जीव चैताऊँ ॥
धोंधल राजाका वृत्तान्त
नृप धोंधल पहुँ मैं चलिजाई । सत्य शब्द सो ताहि सुनाई॥ सत्य शब्द तिन हमरो माना । तिन कह दीन्ह पान परमाना॥
छन्द
राय धोंधल सन्त सज्जन, शब्द मम दृढके गह्यो ॥ सारसीत प्रसाद लीन्हौ, चरण परमत जल लह्यो ॥ प्रेमसे गदगद सब भयो, तजेउ भर्म विभाय हो ॥ सारशब्दहि चीन्ह लीनो, चरण ध्यान लगायहो५०
खेमसरीका वृत्तान्त
सो०-धोंधल शब्द चिताय,तब आयउ मथुरा नगर खेमसरि आयो धाय,नारि दृद्ध गो बालिसौँ ॥५३॥ कहे खेमसरी पुरुष पुराना । कहवाँते तुम कीन्ह पयाना ॥ तासों कहेउ शब्द उपदेशा । पुरुष भाव अरु यमको भेषा॥ सुना खेमसरि उपजा भाऊ । जब चीन्हासब यमका दाऊ॥
नें २ कबीर सागर ४
खमसरीको लोकका दर्शन कराना
( ७० )
अनुरागसागर
खेमसरीको लोकका दर्शन करना
पै धोखा इक ताहि रहाई । देखे लोक तब मन पतियाई ॥ राखेउ देह हंस लै धावा । पलइक माहिँ लोक पहुँचावा ॥ लोंक दिखाय हंस लै आयो । देह पाय खेमसरी पछतायो ॥ हे साहेब लै चलु वहि देशा । यहाँ बहुत है काल कलेशा ॥ तासो कहेउ सुनो यह बानी । जो मैं कहूँ लेहु सो मानी ॥
टीका पूरनेपर ही लोककी प्राप्ति होती है
जबलों टीका पूर न भाई । तब लग रहो नाम लौ लाई ॥ तुम तो देखा लोक हमारा । जीवनको उपदेशहु सारा ॥
जीवोंका उपदेश करनेका फल
एकहु जीव शरणागत आवे । सो जीव सत्य पुरुषको भावे ॥ जैसे गऊ बाघ मुख जायाँ । सो कपिलहि कोइ आय छुड़ायाँ ॥ ता नरको सब सुयश बखाने । गऊ छुड़ाय बाघते आने ॥ जस कपिला कहैं केहरि त्रासा । ऐसे काल जीव कहैं त्रासा ॥ एक जीव जो भक्ति हटावे । कोटिक गऊ पुण्य सो पावे ॥
खेमसरी वचन
खेमसरि परै चरणपर आयी । हे साहिब मोह लेहु बचायी ॥ मोपर दया करहु प्रकाशा । अब नहिं परीं कालके फाँसा ॥
मुक्त वचन
सुन खेमसरि यह यमको देशा । बिना नाम नहिं मिटै अँदेशा ॥ पान प्रवान पुरुषकी डोरी । लेहि जीव यम तिनका तोरी ॥ पुरुष नाम बीरा जो पावे । फिरके भवसागर नहिं आवे ॥
खेमसरी वचन
कहे खेमसरि परवाना दीजै । यमसों छोरि अपन करि लीजै ॥ और जीव हमरे गृह आही । नाम पान प्रभु दीजै ताही ॥ मोरे गृह अब धारिय पाऊ । मुक्तिसन्देश जीवन समझाऊ ॥
अनुरागसागर
( ७१ )
कबीरवचन धर्मदासप्रति
भयेउँ तासु ग्रह भाव समागम । परेउ चरणतर नारि सुधासम॥ खेमसरी सब कहि समझायी । जन्म सुफलकरे सब भायी॥
खेमसरीवचन परिवारप्रति
जीवन मुक्ति चाहु जो भाई । सतगुरु शब्द कहो सो आई॥ यमसो येहि छुड़ावन हारे । निश्चय मानो कहा हमारे ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
सब जीवन परतीत दृढ़ावा । खेमसरी संग सबजिव आवा॥
सब मिलकर विनय करते हैं
आय गये सब चरण हमारा । साहिब मोर करो निस्तारा ॥ जाते यम नहिं मोहि सताये । जन्म जन्म दुख दुसह नसाये॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति
अति अधीन देखेउ नर नारी । तासों हम अस वचन उचारी॥ जो कोई मनहिं शब्द हमारा । ताकहैं कोई न रोकनहारा ॥ जो जिय माने मम उपदेशा । मेटो ताकर काल कलेशा ॥ पुरुष नाम परवाना पावे । यमराजा तिहि निकट न जावे॥
सुकृतवचन खेमसरी प्रति
आनहु साज आरती केरा । काल कष्ट मेटों जिय केरा ॥
खेमसरी वचन
कह खेमसरी प्रभु कहो विलोई । कवन वस्तु लै आरति होई ॥
सुकृतवचन खेमसरी प्रतिच्छन्द
भाव आरती खेमसरि सुनु, तोहि कहैं समुझायके॥ मिष्ठान पान कर्पूर केरा, अष्ट मेवा लायके ॥ पांच बसन श्वेत वस्तर, कदलिपत्र अच्छन्दना ॥ नारियल अरु पुष्टि श्वेतहि, श्वेत चौका चंदना ॥ ५१ ॥
( ७२ )
अनुरागसागर
सो०—यह आरति अनुमानि, आनुस्वेमसरिसाजसब॥
पुंगीफल परमान, शब्द अंग चौका करे ॥५॥
और वस्तु आनहु सुठिपावन । गो घृत उत्तम श्वेत सुहावन ॥
कबीरवचन धर्मप्रति
स्वेमसरिसुनि सिखावन माना । ततक्षण सब विस्तार सो आना ॥
सेत चंदोवा दीन्हों तानी । आरति करनयुक्तिविधि ठानी ॥
पंच साधु इच्छा उपराजा । भक्ति भजन गुरुज्ञानविराजा ॥
हम चौकापर बैठक लयऊ । भजन अखंड शब्दधुन भयऊ ॥
भजन अखंड शब्दध्वनि होई । दुनियां चांप सके नहिं कोई ॥
सत्य समय लै चौका साजा । ज्योतिप्रकाश अखंडविराजा ॥
शब्द अंग चौका अनुमाना । मोरत नरियल काल पराना ॥
जब भयोनरियर शिलासंयोगा । काल शीश पुनि चम्पै रोगा ॥
नरियल मोरत बास उड़ायी । सत्य पुरुष कह जानि जनायी ॥
पांच शब्द कहितब दल फेरा । पुरुष नाम लीन्हो तिहि बेरा ॥
छन एक बैठे पुरुष तहैं भाई । सकलसभा उठिआरति लाई ॥
तब पुनि आरति दीन्ह मैडाई । तिनका तोरे जल अँचवाई ॥
प्रथम स्वेमसरि लीन्हों पाना । पाछे और जीव संमाना ॥
दीन्हेट ध्यान अग समुझाई । ध्यान नामते हंस बचाई ॥
रहनि गहनि सब दीन्ह टढ़ाई । सुमिरत नाम हंस घर जाई ॥
छन्द
हंस द्वादश बोधि सतगुरु, गयउ सुखसागर करी ॥ सतपुरुष चरणसरोज परसेउ, विहसिके अंकमभरी ॥
१ किसी किसी प्रतिमें द्वादशके स्थानमें त्रयोदश लिखा है । और किसी किसीमें द्वादश त्रयोदश कुछभी न लिखकर “ दिनदश बांधि ” लिखा है
त्रेतायुगमें मुनीन्द्र (कबीरसाहब) के पृथ्वीपर आनेकी कथा
अनुरागसागर
( ७३ )
बृक्षिकुशल प्रसन्न बहुविधि मूल जीवनके धनी ॥ बंधुहर्षितसकलशोभा, मिली अति सुन्दर बनी ॥५२॥ सो०-शोभावरणि न जाय, धर्मनिहंसनकान्तिकर ॥ रविषोडश शशिकाय, एक हंस उजियारजौ ॥५५॥ कछु दिन कीन्हो लोक निवासा । देखेउ आय बहुरि निजदासा ॥ निशिदिन रहौं गुप्त जगमाहीं । मोकहँ कोइ जिव चीन्हत नाहीं ॥ जो जीवन परबोध्यो जायी । तिनकहँ दीन्हो लोक पठायी ॥ सत्य लोक हंसन सुखबासा । सदा बसंत पुरुषके पास ॥ सो देखे जो पहुँचे जाई । जिन यहिरचा सोकहा चिताई ॥
त्रेता युगमें मुनींद्र (कबीरसाहब) के पृथ्वीपर आनेकी कथा
सतयुग गयो त्रेतायुग आवा । नाम मुनींद्र जीव समुझावा ॥ जब आयेउ जीवन उपदेशा । धर्मराय हितभये अँदेशा ॥ इन भवसागर मोर उजारा । जिव लै जाहि पुरुष दरबारा ॥ कैतो छल बल करे उपाई । ज्ञानिडर तिहि नाहि ठराई ॥ पुरुष प्रताप ज्ञानिके पास । ताते मोड़ न लागे फाँसा ॥ इनते काल कछु पावै नाहीं । नाम प्रताप हंस घरजाहीं ॥
छन्द
सत्यनाम प्रताप धर्मनि, हंसाघर निज कै चलै ॥ जीमिदेख केहरिन्वास गज, हिय कंपकरधरनीरलै ॥ पुरुष नाम प्रताप केहरि, काल गज सम जानिये ॥ नाम गाहे सतलोक पहुँचे, गिराममफुरमानिये ॥५३॥ सो०-सतगुरुशब्द समाय, गुरु आज्ञा निरखन चले ॥ रहै नाम लौलाय कर्म भर्म मन मति तजै ॥५६॥
कबीरसाहबका जीवोंको उपदेश करना
( ७४ )
अनुरागसागर
त्रेता युग जबही पगु धारा । मृत्युलोक कीन्हों पैसारा ॥ जीव अनेकन पूछा जाई । यमसे को तुहिं लेहिं छुड़ाई ॥ कहे भर्म वश जीव अयाना । हमरा करता पुरुष पुराना ॥ विष्णु सदा हमरे रखवारा । यमते मोहिं छुड़ावन हारा ॥ कोइ महेशकी आश लगावैं । कोइ चण्डी देवी गावैं ॥ कहा कहों जिव भयो विगाना । तजेउ खसमकहैंजारबिकाना ॥ कर्म कोठरी सब दिन डारा । फंदा दे सत जीवन मारा ॥ सत्य पुरुषकी आयसु पाऊँ । कालहि मेटि छोर जिवलाऊँ ॥ जोर करों तो वचन नसाई । सहजहिं जीवन लेउँ चित्ताई ॥ जो आसे जिव सेवैं ताहीं । अनचीन्है यमके सुख जाहीं ॥
विचित्र भाटकी कथा लंकामें
चहुँ दिश फिरि अयेउँ गढ़लंका । भाट विचित्र मिल्योनिःशंका ॥ तिनि पुनि पूछेउ मुक्ति संदेशा । तासों कह्यो ज्ञान उपदेशा ॥ सुनि विचित्र तबहिं भ्रम भागा । अति अधीनहैं चरणन लागा ॥ कहे शरण मुहिं दर्जै स्वामी । तुम सब पुरुषसमुखधामी ॥ कीजै मोहि कृतारथ आजू । मोरे जिवकर कीजै काजू ॥ कह्यो ताहि आरति को लेखा । खेमसरिहि जस भाषेउ रेखा ॥ आनेहु भाव सहित सब साजा । आरति कीन्हशब्दधुनिगाजा ॥ तृण तोरा वीरा तिहि दीन्हा । ताके ग्रहमें काहु न चीन्हा ॥ सुमिरण ध्यान ताहि सो भाखा । पूरण डोरि गोय नहिं राखा ॥
छन्द
विचित्र वनिता गयी नृप दिग, जाय रानी सो कही ॥ इकयोगी सुन्दर है महामुनि, तासुमहिमा काकही ॥ इवैतकला अपार उत्तम, और नहिं अस देखेउँ ॥ पतिहमारे शरण गहितिहि, जन्मशुभ करिलेखेऊँ ५४
अनुरागसागर
( ७६ )
मन्दोदरीका वृत्तान्त
सो०-सुनत मैंदोदरि चाव, दरशलेन अकुलानेऊ ॥ वृषली संगले आव, कनक रतनले पगु धरचो ॥५७॥ चरण टेकिके नायो शीशा। तब मुनीन्द्र पुनि दीन्ह अशीशा ॥
मन्दोदरी वचन
कहे मैंदोदरि शुभ दिन मोरी । विनती करों दोउ कर जोरी ॥ ऐसा तपसी कबहु न देखा । श्वेन अंग सब श्वेतहि भेखा ॥ जिवकारज मम हो जिहि भांती। सो मोहि कहो तजो कुलजाती ॥ हे समरथ मोहि करहु सनाथा । भव बूझत गहि राखो हाथा ॥ अब प्रतिप्रिय मोहि तुम लागे । तुम दयाल सकल भ्रम भागे ॥
मुनीन्द्रवचन मन्दोदरीप्रति
सुनहु वधू प्रिय रावण केरी । नाम प्रताप कटे यम बेरी ॥ ज्ञान दृष्टिओं परखहु भाई । खरा खोट तोहि देऊँ चिन्हाई ॥ पुरुष अमान अजरमनिसारा । सो तो तीन लोकते न्यारा ॥ तेहि साहिब कहैं सुमिरे कोई । आवागमन रहित सो होई ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
सुनतहि शब्द तासु भ्रम भागा । गह्यो शब्द शुचिमन अनुरागा ॥ हे साहिब मोहि लॉजे शरणा । मेटहु मोर जन्म अरु मरणा ॥ दीन्हों ताहि पान परवाना । पुरुष डोर सौप्यों सहिदाना ॥ गदगद भई पाय घर डोरी । मिलिंरं कहि जिमि द्रव्य करोरी ॥ रानी टेकेउ चरण हमारा । ता पाछे महलन पगु धारा ॥
विचित्र वधूका वृत्तान्त
विचित्र वधूरानी समुझावा । गही शरण जीवन मुकतावा ॥ विचित्रनारिगहि रानिसिखापन। लीन्हे सिपानत जा भ्रम आपन ॥
मुनीन्द्रका रावणके पास जाना
तब मैं रावणपहँ चलि आयो । द्वारपालसों वचन सुनायो ॥
( ७६ )
अनुरागसागर
मुनीन्द्रवचन द्वारपालप्रति
तासों एक बात समुझाई । राजा कहैं तुम आव लिवाई॥
द्वारपाल वचन
तब पौरिया विनय यह लाई । महा प्रचंड है रावण राई ॥ शिवबल हृदय शंकर नहीं आने। काहूकेर वचन नहीं माने ॥ महागर्व अरु कोध अपारा । कहों जाय मोहि पलमें मारा ॥
मुनीन्द्रवचन द्वारपालप्रति
मानहु वचन जाव यहि बारा । रोम बंक नहीं होय तुम्हारा ॥ सत्य वचन तुम हमरो मानो । रावण जाय तुरत तुम आनो ॥
प्रतिहारवचन
ततक्षण गा प्रतिहार जनायी । द्वै कर जोरे ठाढ़ रहाई ॥ सिद्ध एक तो हम पहुँ आयी । ते कह राजहि लाव बलाई ॥
रावणका क्रोध प्रतिहारप्रति
सुनु नृप कोध कीन्ह तेहि बारा । तै मतिहीन आहि प्रतिहारा ॥ यह मति ज्ञान हरो किन तोरा । जो तैं मोहि बुलावन दौरा ॥ दर्श मोर शिवसुत नहीं पावत । मोकहैं भिक्षुक कहा बुलावत ॥ हे प्रतिहार सुनहु मम बानी । सिद्धरूप कहो मोहि बखानी ॥ वर्णन है कौन कौन तेहि भेषा । मो सन दृष्टि जस यहि देखा ॥
प्रतिहारवचन
अहो रावण तेहि श्वेतरूपा । श्वेतहि माला तिलक अनूपा ॥ शशि समान है रूप त्रिराजा । श्वेत वसन सब श्वेतहि साजा ॥
मन्दोदरीवचन
कहे मँदोदरी रावण राजा । ऐसो रूप पुरुषको छाजा ॥ वेगे जाय गहो तुम पाई । तो तुव राज अटल होय जाई ॥ छोड़हु राजा मान बढ़ाई । चरण टेकि जो शीश नवाई ॥
मुनीन्द्रका रावणके पास जाना
अनुरागसागर
( ७७ )
कबीरवचन धर्मदास प्रति
रावण सुनत कोध अतिकीन्ह। जरत हुताशन मनुघृत दीन्ह। ॥ रावण चला शस्त्र लै हाथा। तुरत जाय तिहि काटों माथा॥ मारों ताहि सीस खसि परई। देखों भिक्षुक मोर का करई॥ जहैं मुनींद्र तहैं रावण राई। सत्तर वार अस्त्र कर लाई ॥ लीन्ह मुनींद्र तृण कर ओटा। अति बल रावण मारै चोटा॥
छन्द
तृण ओट यहि कारणे, गर्व धरी राय हो ॥ तेहि कारणे यह युक्ति कीन्ही, लाज रावण आयहो ॥
मन्दोदरी वचन
कहे मन्दोदरि सुनहु राजा, गर्व छोड़ो लाज हो ॥ पांव टेकहु पुरुषके गहि, अटल होवै राज हो ॥५५॥
रावण वचन
सो०-सेवाकरों शिवजाय, जिन मोहि राज अटल दियो ताकर टेको पांय पल, दंडवत क्षणिताहिको ॥५८॥
मुनींद्रवचन
सुन अस वचन मुनींद्र पुकारी। तुम हो रावण गर्व अहारी ॥ भेद हमारा तुम नहि जाना। वचन एक तोहि कहों निशाना॥ रामचंद्र मारै तुहि आयी। मांस तुम्हार श्वान नहि खायी॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति
रावणको कीन्हो अपमाना। अवधनगर पुनि कीन्ह पयाना॥
मधुकरकी कथा छन्द
रावणको अपमान करी, तब अवधनगरहि आयऊ॥ विप्र मधुकर मिलेउ मारग, दरशतिनमन पायऊ ॥
१ इसके बदले पुराने ग्रन्थोंमें ऐसा लिखा है—
“तीन जीव परमोघि लंका, तब अवध नगरहि आयऊ”