कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 200, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ७२ )
अनुरागसागर
सो०—यह आरति अनुमानि, आनुस्वेमसरिसाजसब॥
पुंगीफल परमान, शब्द अंग चौका करे ॥५॥
और वस्तु आनहु सुठिपावन । गो घृत उत्तम श्वेत सुहावन ॥
कबीरवचन धर्मप्रति
स्वेमसरिसुनि सिखावन माना । ततक्षण सब विस्तार सो आना ॥
सेत चंदोवा दीन्हों तानी । आरति करनयुक्तिविधि ठानी ॥
पंच साधु इच्छा उपराजा । भक्ति भजन गुरुज्ञानविराजा ॥
हम चौकापर बैठक लयऊ । भजन अखंड शब्दधुन भयऊ ॥
भजन अखंड शब्दध्वनि होई । दुनियां चांप सके नहिं कोई ॥
सत्य समय लै चौका साजा । ज्योतिप्रकाश अखंडविराजा ॥
शब्द अंग चौका अनुमाना । मोरत नरियल काल पराना ॥
जब भयोनरियर शिलासंयोगा । काल शीश पुनि चम्पै रोगा ॥
नरियल मोरत बास उड़ायी । सत्य पुरुष कह जानि जनायी ॥
पांच शब्द कहितब दल फेरा । पुरुष नाम लीन्हो तिहि बेरा ॥
छन एक बैठे पुरुष तहैं भाई । सकलसभा उठिआरति लाई ॥
तब पुनि आरति दीन्ह मैडाई । तिनका तोरे जल अँचवाई ॥
प्रथम स्वेमसरि लीन्हों पाना । पाछे और जीव संमाना ॥
दीन्हेट ध्यान अग समुझाई । ध्यान नामते हंस बचाई ॥
रहनि गहनि सब दीन्ह टढ़ाई । सुमिरत नाम हंस घर जाई ॥
छन्द
हंस द्वादश बोधि सतगुरु, गयउ सुखसागर करी ॥ सतपुरुष चरणसरोज परसेउ, विहसिके अंकमभरी ॥
१ किसी किसी प्रतिमें द्वादशके स्थानमें त्रयोदश लिखा है । और किसी किसीमें द्वादश त्रयोदश कुछभी न लिखकर “ दिनदश बांधि ” लिखा है