भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 187

अनुरागसागर

( ६९ )

पल पल निरखे गुरुमुखकान्ती । शिष्यचकोरगुरुशशिशान्ती॥ पतिव्रता ज्यों पतिव्रत ठाने । द्वितीयपुरुष सपने नहिं जाने॥ पतिव्रता दोड कुलहिं उजागर । यह गुण गहे संतमति आगग॥ ज्यों पतिव्रता पिया मन लावे । गुरु आज्ञा असशिष्य जुगावे॥ गुरुते अधिक और कोइ नाही । धर्मदास परखहु हिय माहीं ॥ गुरुते अधिक कोइ नहिं दूजा । भर्म तजै करि सतगुरुपूजा ॥ तीर्थ धाम देवल अरु देवा । शीश अपि जो लावैं सेवा ॥ तो नहिं वचन कहैं हितकारी । भूले भरमें यह संसारी ॥

छन्द

गुरु भक्ति अटल अमानधर्मनि, यहि सरस दूजा नहीं ॥ जप योगतप व्रतदान पूजा, तृणसदृश यह जग कहीं॥ सतगुरुदया जिहिसन्तपरतिहि, हृदययहि विधि आवई॥ ममगिरापरखेहरषिकेहिय, तिमिरमोहनशावई॥४३॥ सोरठा-दीपकसतगुरुज्ञान, निरखेहु सन्तअंजोरतोहि पावे मुक्ति अमान, सतगुरु जेहि दाय़ा करे ॥५४॥

शुकदेवजीकी कथा

शुकदेव भये गरभ जोगेशर । उन समान नहिं थाप्यो दूसरा॥ तपके तेज गये हरि धामा । गुरु बिन नहीं लहे विथामा ॥ विष्णु कहे ऋषिकहैवा आये । गुरु विहीन तप तेज झुलाये ॥ गुरु विहीन नर मोहि न भावे । फिर २ जो इन संकट आवे ॥ जाहु पलटिगुरुकरहु सयाना । सब पैहौं यहवां अस्थाना ॥ सुनिमुनिशुकदेव वेगि सिधाये । गुरुविहीन तहैं रहन न पाये ॥ जनक विदेह कीन्ह गुरुजानी । हरषि मिले तब सारंगपानी ॥ नारद ब्रह्मा सुत बड़ ज्ञानी । यह सब कथा जगतमें जानी॥