कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 186, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६८ )
अनुरागसागर
छन इक जीवन कहँ सुख दयऊ । जीव प्रबोध पुरुष पहुँ गयऊ ॥ छन इक जीवन कहँ सुख दीन्हा । जीवन कह्यो ज्ञानको चीन्हा ॥ जब तुम देह धरो जग जाई । तब हम शब्द कहब गोहराई ॥ जौ गहि हो सत नामकी डोरी । तब आनब हम जमसे छोरी ॥ जीव परमोधि पुरुष पहुँ गयऊ । जीवनको दुख वरनि सुनयऊ ॥ पुरुष दयाला दयानिधि स्वामी । जिनके मूल अमान अकामी ॥ कह्यो मोहिँ बहुविधि समुझाई । जीवन आनों शब्द चेताई ॥
धर्मदासवचन
धर्मदास अस विनती लायी । ज्ञानी मोहिँ कहो समझायी ॥ जो कछु पुरुष शब्द सुख भाखो । सो साहिब मोहि गोयन राखो ॥ कौन शब्दते जीव उबारा । सो साहिब सब कहो बिचारा ॥
सदगुरुवचन
पुरुष मोहि जैसे फुरमायी । सो सब तुमसों संधिलखायी ॥ केहेउ मोहि बहुविधिसमझायी । जीवहि आनो शब्द चितायी ॥ गुप्त वस्तु प्रभु मोकहँ दीन्हा । नाम विदेह मुक्तिकर चीन्हऽ ॥ दीन्ह पात परवाना हाथा । संधिछाप मोहि सौंप्यो नाथा ॥ बिनु रसनाते सो धुनि होई । गुरुगमते लखि पावे कोई ॥ पंच अमीय मुक्तिका मूला । जाते मिटे गर्भ अस्थूला ॥ यहि विधि नाम गहे जो हँसा । तारौ तासु इकोतर बँसा ॥ नाम डोरि गहि लोकहि जायी । धर्मराय तिहि देखि डरायी ॥ ज्ञानी करो शिष्य जेहि जाई । तिनका तोरो जल अँचवाई ॥ जिहि विधि दीन्ह तुमहि मैं पाना । तेहि विधि देहु शिष्य सहिदाना ॥
गुरुमहिमा
गुरुमुख शब्द सदा उर राखे । निशिदिन नाम सुधारस चाखे ॥ पियानेह जिमि कामिनि लागे । तिमिर गुरुरूप शिष्य अनुरागे