कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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अनुरागसागर
मुनीन्द्रवचन द्वारपालप्रति
तासों एक बात समुझाई । राजा कहैं तुम आव लिवाई॥
द्वारपाल वचन
तब पौरिया विनय यह लाई । महा प्रचंड है रावण राई ॥ शिवबल हृदय शंकर नहीं आने। काहूकेर वचन नहीं माने ॥ महागर्व अरु कोध अपारा । कहों जाय मोहि पलमें मारा ॥
मुनीन्द्रवचन द्वारपालप्रति
मानहु वचन जाव यहि बारा । रोम बंक नहीं होय तुम्हारा ॥ सत्य वचन तुम हमरो मानो । रावण जाय तुरत तुम आनो ॥
प्रतिहारवचन
ततक्षण गा प्रतिहार जनायी । द्वै कर जोरे ठाढ़ रहाई ॥ सिद्ध एक तो हम पहुँ आयी । ते कह राजहि लाव बलाई ॥
रावणका क्रोध प्रतिहारप्रति
सुनु नृप कोध कीन्ह तेहि बारा । तै मतिहीन आहि प्रतिहारा ॥ यह मति ज्ञान हरो किन तोरा । जो तैं मोहि बुलावन दौरा ॥ दर्श मोर शिवसुत नहीं पावत । मोकहैं भिक्षुक कहा बुलावत ॥ हे प्रतिहार सुनहु मम बानी । सिद्धरूप कहो मोहि बखानी ॥ वर्णन है कौन कौन तेहि भेषा । मो सन दृष्टि जस यहि देखा ॥
प्रतिहारवचन
अहो रावण तेहि श्वेतरूपा । श्वेतहि माला तिलक अनूपा ॥ शशि समान है रूप त्रिराजा । श्वेत वसन सब श्वेतहि साजा ॥
मन्दोदरीवचन
कहे मँदोदरी रावण राजा । ऐसो रूप पुरुषको छाजा ॥ वेगे जाय गहो तुम पाई । तो तुव राज अटल होय जाई ॥ छोड़हु राजा मान बढ़ाई । चरण टेकि जो शीश नवाई ॥