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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished2,136 pages

निरंजनको सृष्टि रचनाका साज

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अनुरागसागर

( १७ )

लोक तीनों ताहि दीन्हो, शून्य देश वसावहू ॥ करहु रचना जाय तहैंवा, सहज वचन सुनावहू ॥१३॥ सो०-जाहु सहज तुम वेग, अस कहि आवो धर्मसो॥ दियो शून्यकर थोग, रचना रचहु बनाइके ॥ १३ ॥

निरंजनको छुटि रचनाका साज मिलानेका वृत्तान्त

सहज वचन निरंजन प्रति

आये सहज वचन सुनावा । सत्यपुरुषजसकहिसमुझावा॥

कबीर वचन धर्मराज प्रति

सुनतहि वचन धर्म हरषाना । कछुकर्हकछुविस्मय आना॥

निरंजनवचन सहज प्रति

कहे धर्म सुनु सहज पियारा । कैसे रचौं करौं विस्तारा ॥

पुरुष दयाल दीन्ह मोहिं राजू । जानु न भेद करौं किमि काजू॥

गम्य अगम मोहे नहिं आयी । करौं दया सो युक्ति बतायी॥

विन्ती करौं पुरुषसों मोरी । अहो आत बलिहारी तेरी ॥

किहि विधिरचैनवखण्ड बनाई । हे आत सो आज्ञा पाई ॥

मो कहैं देहु साज प्रभु सोई । जातैं रचना जगत्की होई ॥

सहजका लोकको जाना

तबही सहज लोक पग धारा । कीन्ह दंडवत बारम्बारा ॥

पुरुषवचन सहज प्रति

अहो सहज कस इहैंवा आई । सो हमसो तुम शब्द सुनाई॥

कबीर वचन धर्म दास प्रति

कहो सहज तब धर्मकी बाता । जो कछु धर्म कही विरुयाता॥

धर्मराज जस विन्ती लायी । तैसे सहज सुनायउ जायी ॥

पुरुषकी आज्ञा सहजसे

आज्ञा पुरुष दीन्ह तेहि वारा । सुनौ सहज तुम वचन हमारा॥

सहजका धर्मरायके निकट आकर पुरुषकी आज्ञा सुनाना

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( १८ )

अनुरागसागर

कूर्मके उदर आदि सब साजा । सो ले धर्म करे निजकाजा ॥ विनती करे कूर्म सौ जाई । मांगि लेति तेहि माथ नवाई ॥

सहज धर्मरायके निकट जाकर पुरुषकी आज्ञा सुनाना

गये सहज पुनि धर्मके पास । आज्ञापुरुष दीन्ह परकासा ॥ विनती करो कूर्मसो जाई । मांगि लेहु सीस नवाई ॥ जाय कूर्म ढिग सीस नवावहु । करिहैं कृपा बहुत तव पावहु ॥

निर्जनको कूर्मके पास साज लेनेको जाना

कबीरवचन धर्मदास प्रति

जलिभोधरम हरष तब बाढो । मनहिकीन जुमान अतिगाढो ॥ जाय कूर्मके सम्मुख भयऊ । दंडपरनाम एक नहिं कियऊ ॥ अमी स्वरूप कर्म सुखदाई । तपननतनिको अतिशितलाई ॥ करि गुमान देख्यो जब काला । कूर्म धीर अति है बलवाना ॥ बारह पल्लंग कूर्म शरीरा । छै पल्लंग धरम बलवीरा ॥ धायै चहुँ दिशि रहै रिसाई । किहि विधिली जैउत्पति भाई ॥ कीन्हो कालसीस नख घाता । उदरते निकसे पवन अघाता ॥ तीन सीसके तीनहु अंशा । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर वंशा ॥ पांच तत्व धरती आकाशा । चन्द्र सूर्य उडगन रहिवासा ॥ विसरचो नीर अग्नि शशि सूर। निसरचो नभठाकन महिथूरा ॥ मीन शेष बराह महिथम्भन । पुनि पृथ्वीको भयो अरम्भन ॥ छीना सीस कूर्मको जबही । चले प्रसेव ठाँव पुनि तबही ॥ जबही प्रसेव बुंद जल दीन्हा । उंचासकोट पृथ्वीको चीन्हा ॥ क्षीर तोय जस परत मलाई । अस जलपर पृथ्वी ठहराई ॥ बारह दंत राहु महिकरमूला । पवन प्रचण्ड महीस्थूला ॥ अंडस्वरूप आकाशको जानौं । ताके बीच पृथ्वी अनुमानौं ॥

बहुरि पुरुषका सहजको निरंजनके निकट भेजना

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अनुरागसागर

( ११ )

कूर्म उदर सुत कूर्म उत्पानो । तापर शेष वराहको थानो । शेष सीस या पृथ्वी जानो । ताके हेठ कूर्म विरयानो ॥ किरतम कूर्म अण्डके मांही । कूर्म अंश सो भिन्न रहाही ॥ आदि कूर्म रह लोक मैझारा । तिनपुनिपुरुषध्यानअनुसारा॥

कूर्मवचन सत्पुरुषप्रति

निरंकार कीन्हो बरियाया । कालकलाधरि मो पहुँ आया॥ उदर विदार कीन्ह उन मोरा । आज्ञा जानीकीन्ह नहिं थोरा॥

पुरुष वचनकूर्मप्रति

पुरुषअवाज कीन्ह तेहिवारा । छोटे बंधु वह आहि तुम्हारा॥ आही यही बडनकी रीती । औगुन ठावैं करहिं वह प्रीती॥

कवीरवचन धर्मप्रति

पुरुषवचन मुनि कूर्म आनंदा । अमीसरूप सो आनंदकंदा ॥ पुरुषध्यानपुनि कीन्हनिरंजन । जुग अनेक किय सेवा संजन ॥ स्वार्थ जानि सेवा तिन लाई । करि रचना बैठे पछताई ॥ धर्मराय तब कीन्ह विचारा । कहवालो त्रयपुर विस्तारा ॥ स्वर्ग मृत्यु कीन्हो पाताला । विनाबीजकिमिकीजै रूयाला॥ कौन भांति कस करव उपाई । किहि विधि रचों शरीर बनाई॥ कर सेवा मांगों पुनि साई । तिहुँ पुर जीवित मेरो होई ॥ करि विचार असहठ तिनधारा । लाग्यो करने पुरुष विचारा ॥ एक पांव तब सेवा कियेऊ । चौंसठ युगलों ठाढे रहेऊ ॥

बहुरि पुरुषका सहजको निरंजनके निकट भेजना । छन्द

दयानिधि सतपुरुष साहिब, बस सुसेवाके भये ॥ बहुरि भाष्यो सहज सेती, कहा अब याचत नये ॥ जाहु सहज निरंजनापहैं, देउ जो कुछ मांगई ॥ करहि रचना पुरुष वचना, छल मता सब त्यागई ॥

सहजका निरंजनके निकट पहुँचना

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( २० )

अनुरागसागर

सहजका निरंजनके निकट पहुँचना

सो० सहज चलेसिरनाय, जबहिं पुरुष आज्ञा कियो॥

तहैंवा पहुँचे जाय, जहाँ निरंजन ठाढ़रह ॥१४॥

देखत सहज धर्म हरषाना । सेवा वस पुरुष तब जान् ॥

सहजवचन

कहै सहज सुनु धर्मराया । केहि कारण अब सेवा लाया॥

निरंजनवचन

धर्म कहै तब सीस नवायी । देहु ठौर जहैं बैठौं जायी ॥

सहजवचन

तब सहज अब भाषै लीन्हा । सुनहु धर्म तेही पुरुष सब दीन्हा॥

कूर्म उदर सो जो कछु आवा । सो तोहि देन पुरुष फरमावा॥

तीनों लोक राजा तोहि दीन्हा । रचना रचहु होहु जनि भीना॥

निरंजनवचन

तवैं निरंजन विनती लायी । कैसे रचना रचूं बनायी ॥

पुरुषहिं कहौं जोर युग पानी । मैं सेवक दुतिया नहिं जानी॥

पुरुष सो विनती करो हमारा । दीजै खेत बाज निज सारा ॥

मैं सेवक दुतिया नहीं जानूँ । ध्यान पुरुषको निशिदिन आनूँ॥

पुरुषहिं कहा जाय यह बानी । देहु बाज अम्मर सहिदानी॥

कबोरवचन धर्मदासप्रति

सहज कह्यो पुनि पुरुषहिं जाई । जस कछु कह्यो निरंजनराई॥

गयो सहज निजदीप सुखासन । जबहि पुरुष दीन्हे अनुशासन॥

सेवा वश सत्पुरुष दयाला । गुण औ गुण नहिं चित किरपाला॥

अबाकी उत्पति

इच्छा कीन पुरुष तेहि बारा । अछुंगी कन्या उपचारा ॥

अष्ट बाहु कन्या होय आई । बायें अंग सो ठाढ़ रहाई ॥

अबाकी उत्पति

माथ नाय पुरुष सो कहई । अहो पुरुष आज्ञा कस अहई॥

सत्यपुरुषका अद्याको मूलबीज देना

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अनुरागसागर

( २१ )

सत्य पुरुषका आधाको मूलबीज देना

पुरुष वचन अधाप्रति

तबहीं पुरुष वचन परगासा । पुत्री जाहु धरमके पास । ॥ देहुँ वस्तु सो लेहु सम्हारी । रचहु धर्म मिलि उत्तपतिवारी ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

दीन्हो बीज जीव पुनि सोई । नाम सुहंग जीव कर होई ॥ जीव सोहंगम दूसर नाहीं । जीवसों अंश पुरुष को आहीं ॥ शक्ति पुनि तीन पुरुष उत्पाना । चेतनि उलंघनि अभया जाना ॥

छन्द

पुरुष सेवावश भये तब, अष्ट अंगहि दीन्ह हो ॥ मानसरोवर जाहु कहिया, देह धर्महि चीन्ह हो ॥ अष्टङ्गी कन्या हती जेहि, रूप शोभा अति बनी ॥ जाहुकन्या मानसरवर, करहु रचना अति घनी ॥ सोरठा-चौरासी लखजीव, मूलबीज तेहिसंग दे ॥

रचना रचहु सजीव, कन्या चलि सिरनायके ॥ यह सब दीन्हो आदि कुमारी । मानसरोवर चलिभई नारी ॥ ततछिन पुरुष सहज देरावा । धावत सहजपुरुष यहि आवा ॥

पुरुषवचन सहजप्रति

जाही सहज धरम यह कहेहु । दीन्ह वस्तु जस तुम चहेहु ॥ मूल बीज तुमपहँ पठवावा । करहु सृष्टिजस्तुवमनभावा ॥ मानसरोवर जाहि रहाहु । ताते होइ है सृष्टि उराहु ॥

पुनि सहजका निरंजनके दिग जाना

चले सहज तहवाँ तब आये । धर्म धीर जहँ ठाढ़ रहाये ॥ कहेउ सुवचन पुरुषको जबहीं । धर्मराय सिर नायो तबहीं ॥

निरंजनका अद्याको निगल जाना और सत्यपुरुषका उसे शाप देना

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( २२ )

अनुरागसागर

निरंजनका मानसरोवरमें अद्याको पाकर मोहवश हो उसे निगल जाना और सत्यपुरुषका शाप पाना

पुरुष वचन सुन तबही गाजा । मानसरोवर आन विराजा ॥ आवत कामिनी देख्यो जबही । धर्मराय मन हरष्यो तबही॥ कहा देखि अष्टंगी केरी । धर्मराय इतरान्यो हेरी ॥ कहा अनन्त अंत कछु नाहीं । काल मगन है निरखत ताहीं॥ निरखत धर्मसु भयो अधीरा । अंग अंग सब निरख शरीरा॥ धर्मराय कन्या कहै ग्रासा । कालस्वभाव सुनो धर्मदासा॥ कीन्हों ग्रास काल अन्याई । तब कन्या चित विस्मय लाई॥ तत छण कन्या कीन्ह पुकारा । कालनिरंजन कीन्ह अहारा॥ तबही धर्म सहज लग आई । सहज शून्य तब लीन्ह छुड़ाई॥ पुरुष ध्यान कूर्म अनुसार । मोसनकाल कीन्ह अधिकारा॥ तानशीश मम भच्छण कीन्ह्यो । हो सत पुरुष दया भल चीन्ह्यो॥ यही चरित्र पुरुष भल जानी । दीन्ह शापसो कहों बखानी ॥

पुरुषका शाप निरंजनप्रति

लच्छ जीव नि ग्रासन करहू । सवालच्छ नितप्रति विस्तरहू॥

छन्द

पुनिकीन्हपुरुषतियानतिही, किमिमेटिडारोकालहो कठिन काल कराल जीवन, बहुत करइ बिहाल हो॥ यहि मेटत अबना बनै मुहि, नालाइक सुत षोडसा॥ एक मेटत सबै मिटिहै, वचन डोल अडोलसा॥१६॥ सोरठा-डोल वचन हमार, जो अब मेटा धरमका॥ वचन करो प्रतिपाल, देश मोर अब ना लहैं॥१६॥

सत्यपुरुषका जोगजीतजीको निरंजनके पास उसे मानसरोवरसे निकाल देनेकी आज्ञा देकर भेजना

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अनुरागसागर

( २३ )

सत्पुरुषका जोगजीतका निरंजनके पास उसे मानसरोवरसे निकाल देनेकी आज्ञा देकर भेजना

जोगजीत कह पुरुष बुलावा । धर्मचरित सब कहि समुझावा॥

सत्पुरुष वचन जोगजीत प्रति

जोगजीत तुम बेगि सिधारो । धर्मरायको मारि निकारो ॥

मानसरोवर रहन न पावै । अब यहि देशकाल नहिं आवै॥

धर्मके उदर माहिं है नारी । तासो कहो निजशब्द सम्हारी॥

जाकर रहो धर्म वहि देश । स्वर्ग मृत्यु पाताल नरेशा ॥

उदर फारिकै बाहर आवै । धर्मविदार उदार फल पावे॥

धर्मरायसों कहो विलोई । वहै नारि अब तुम्हारी होई ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

जोगजीत चल भे शिर नार्ई । मानसरोवर पहुँचे जाई ॥

जोगजीत कहै देखा जबहीं । अति भो काल भयंकर तबहीं ॥

निरंजनवचन जोगजीतप्रति

पूछा काल कौन तुम आई । कौन आज तुम यहां सिधार्ई॥

जोगजीतवचन निरंजन प्रति

जोगजीत अस कहै पुकारी । अहो धर्म तुम ग्रासेहु नारी॥

आज्ञा पुरुष दीन्ह यह मोही । इहिते बेगि निकारो तोही ॥

जोगजीतवचन अधा प्रति

जोगजीत कन्या सो कहिया । नारी कहे उदरमहैं रहिया ॥

उदरफारि अब आवहु बाहर । पुरुष तेज सुमिरो तेहि ठाहर॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

सुनिके धर्म कोध उर जरेऊ । जोगजीत सौ सन्मुखभिरेऊ॥

जोगजीत तब कीन्है ध्याना । पुरुष प्रताप तेज उर आना॥

पुरुष आज्ञा भई तेहि काला । मारहु माझ लिलार कराला॥

जोगजीत पुनि तैसो कीन्हा । जस आज्ञा पुरुष तेहि दीन्हा॥

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( २४ )

अनुरागसागर

छन्द

गहि भुजा फटकार दीन्हों, परेउ लोकत न्यारहो॥ भयो त्रासित पुरुष डरते, बहुरि उठेउ सम्हार हो॥ निकसि कन्या उदरते पुनि, देख धर्महि अतिडरी॥ अब नाहिंदेखोदेश वह, कहौ कौनविधिकहवाँपरी १७ सोरठा-कामिनिरहीसकाय, त्रासितकालकडर अधिक रही सो सीस नवाय, आसपासचितवत खड़ी ॥१७॥

निरंजनवचन अध्याप्रति

कहै धर्म सुनि आदि कुमारी । अब जनि डरपो त्रास हमारी॥ पुरुषा रचा तोहि हमरे काजा । इकमति होय करहु उपराजा॥ हम हैं पुरुष तुमहि ही नारी । अब जनि डरपो त्रास हमारी॥

अध्यावचन निरंजनप्रति

कहै कन्या कस बोलहु बानी । आता जेठ प्रथम हम जानी॥ कन्या कहै सुनो हो ताता । ऐसी विधिजनिबोलहु बाता॥ अब मैं पुत्री भई तुम्हारी । ताते उदरमांझलियो डारी॥ जेष्ठ बन्धु प्रथमहिके नाता । अब तो अहो हमारे ताता॥ निरमलदृष्टिजब चितवहु मोहीं । नहिं तो पाप होय अब तोहीं॥ मन्द दृष्टिजनिचितवहु मोही । ना तो पाप होय अब तोही॥

निरंजनवचन अध्याप्रति

कहै निरंजन सुनो भवानी । यह मैं तोहि कहों सहिदानी॥ पाप पुण्य डर हम नहिं डरता । पाप पुण्यके हमहीं करता ॥ पाप पुन्य हमहींसे होई । लेखा मोर न लेहै कोई ॥ पाप पुन्य हम करब पसारा । जो बाझे सो होय हमारा ॥ ताते तोहि कहौ समुझाई । सिख हमार लो सीस चढ़ाई॥ पुरुष दीनतोहि हमकहैं जानी । मानहु कहा हमार भवानी ॥

भवसागरकी रचना (प्रारम्भ)

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अनुरागसागर

( २६ )

कबीरवचन धर्मदास प्रति

विहैंसी कन्या सुन अस वाता । इक मति होय दोई रंगराता॥ रहस वचन बोली मृदु बानी । नारिनीचबुधिरतिविधिठानी॥ रहसवचन सुनि धरम हरषाना । भोग करनको मनमें आना॥

बुन्द

मन नहिं कन्या कहती असचरितकीन्ह निरंजना॥ नख घातकियेभगद्वारततछिण, घाटउत्पतिगंजना॥ नखं रेषशो नितचल्या, तिहुँको खब खासआरंभनी॥ आदिउत्पत्तिमुनहु धर्मनि, कोउ नहिं जानत जम मनी॥ त्रियावार कीन्ही रति तबै, भये ब्रह्मा विष्णु महेशहो॥ जेठे विधि विष्णु लघु तिहि, तीज शंभु शेष हो॥१८॥ सोरठा-उत्पति आदिप्रकाश, यहि विधि तेहि प्रसंगभो॥ कीन्हो भोगविलास, इकमनि कन्या काल है॥१८॥

भवसागरकी रचना

तेहि पीछे ऐसा भो लेखा । धर्मदास तुम करौ विवेका॥ निरंजनवचन अध्याप्रति

अग्निपवनजलमहि आकाशा । कूर्म उदरते भयो प्रकाशा॥ पाँचौ अंस ताहि सन लीन्हा । गुण तीनों सीसनसों कीन्हा॥ यहि विधि भयेतत्त्वगुण तीनों । धर्मराज तब रचना कीनों॥

कबीर वचन धर्मदास प्रति

गुणतसम कर देविहि दीन्हा । आपन अंश उत्पने कीन्हा॥ बुन्द तीन कन्या भग डारा । तासँग तीनों अंग सुधारा॥

? यह तो पुरानी प्रतियोंमें ऐसाही है किन्तु नवीन प्रतियोंमें उपर्युक्त दोनों पंक्ति नहीं हैं जो विचारपूर्वक प्रसंगोंके पढ़नेसे ठीक नहीं जान पड़ता ।

तीन सुतको उत्पन्न कर निरंजनका गुप्त हो जाना

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( २६ )

अनुरागसागर

पांच तत्त्व गुण तीनों दीन्हा । यहिबिधिजनकीरचना कीना॥ प्रथम बुन्दते ब्रह्म जो भयऊ । रजगुणपंचतत्त्व तेहि दयऊ ॥ द्वजो बुन्द विष्णु जो भयऊ । सतगुण पंच तत्त्वतिन पयऊ॥ तीजे बुन्द रुद्र उत्पाने । तमगुण पंच तत्त्व तेहि साने॥ पंच तत्त्व गुण तीन खमीरा । तीनों जनको रच्यो शरीरा ॥ ताते फिरि फिरि परलय होई । आदि भेद जाने नहिं कोई॥ कहै धर्म कामिनि सुनबानी । जो मैं कहूँ लेहु सोमानी ॥ जीव बीज आहे तुव पास। सो ले रचना करहु प्रकाशा॥ कर्ण निरञ्जन पुनि सुनु रानी । अब अस करहु आदि भवानी ॥ त्रय सुतसौप तोहि कहँ दीन्हा । अबहमपुरुषसेवचित लीन्हा॥ राज करहु तुम ले तिहुँ बारा । भेद न कहियो काहु हमारा ॥ मोर दरस त्रय सुत नहिं पैहैं । जो मुहि खोजत जन्म सिरै हैं॥ ऐसो मता दिढेहो जानी । पुरुष भेद नहिं पावै प्रानी ॥ त्रयसुत जबहिं होहि बुधिवाना । सिधुमथन दे पठहु निदाना॥

कवीरवचन धर्मदासप्रति

कहेउ बहुत बुझाय देविहि, गुप्त भये तब आहि हो॥ शून्य गुफहि निवास कीन्हों, भेद लहको ताहिहो॥ वह गुप्त भा पुनि सङ्ग सबके, मन निरंजन जानिये ॥ मन पुरुष भेद उच्छेद देवे, आप परगट आनिये ॥ सो०-जीवभयेमतिहीन, परिसि अगमसो कालको॥ जनम जनम भये खीन, मुरुचा कर्म अकर्मको १८ जीव सतावै काल, नाना कर्म लगायके ॥ आप चलावै चाल, कष्ट देय पुनि जीवको ॥ २० ॥

सिंधु मंथन और चौदहरत्न उत्पत्तिकी कथा (प्रारम्भ)

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अनुरागसागर

( २७ )

सिन्धुमथन और चौदह रत्न उपसिकी कथा

त्रय बालक जब भये सयाने । पठये जननी सिंधु मथाने ॥ बालक माते खेले खिलारी । सिंधुमथनहिं गयउ खरारी ॥ तेहि अंतर इक भयौ तमासा । सो चरित्र बूझो धर्मदासा ॥ धान्यो योग निरंजन राई । पवन आरंभ कीन्ह बहुताई ॥ त्यागो पवन रहित पुनि जबही । निकसेउ वेदस्वास सँग तवही ॥ स्वास सँग आयउ सो वेदा । बिरला जन कोई जानेभेदा ॥ अस्तुति कीन्ह वेद पुनि ताहां । आज्ञाका मोहि निर्गुनाहां ॥ कह्यौ जाव करू सिंधुनिवासा । जेहि भेटे जैहौ तिहिपासा ॥ उठी आवाज रूप नहिं देखा । जोति अगम दिखलावतभेखा ॥ जलेउ वेद पुनि तेज अपाने । तेज अन्न पुनि विष संधाने ॥ चले वेद तहैंवा कहैं जाई । जहैंवा सिंधु रचा धर्मराई ॥ पहुँचे वेद तब सिंधु मैझारा । धर्मराय तब युक्ति विचारा ॥ गुप्त ध्यान देविहि समुझावा । सिंधुमथनकहैंकसबिलमावा ॥ पठवहु बेगि सिंधुत्रय बारा । दृढ़कै शोचहु वचन हमारा ॥ बहुरिआपपुनि सिंधु समाना । देवी कीन्ह मथन अनुमाना ॥ तिहुँबालक कहैंकह समुझायी । आशिष दे पुनि तहां पठायी ॥ पैहौ वस्तु सिन्धुके पाहीं । जाहु वेगि तीनों सुत ताहीं ॥ चलिभौ ब्रह्मा मान सिखाई । दोउ लहुरा पुनि पाछे जाई ॥

छन्द

त्रय सुत बाल खेलेत चले, ज्योंसुभगबालमरालहो ॥ एकगहिछोड़तमहीपुनि, एककरगहिचलतलटपटचालहो ॥ क्षणहिधावतक्षणस्थिर खड़े, क्षणभुजहिगरलावही ॥ तेहि समयकी शोभा भली, नहि वेद ताकहैं गावही ॥

प्रथमवार सिंधु मंथन

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( २८ )

अनुरागसागर

सोरठा-गये सिंधुके पास, भये ठाढ़ तीनों जाने ॥ युक्तिमथनपरकास, एक एकको निरखही ॥२१॥

प्रथमवार सिन्धु मथन

तीनों कीन्ह मथन तब जाई । तीन वस्तु तीनों जन पाई ॥ ब्रह्मा वेद तेज तेहि छोटा । लहुरा तासुमिलेविष खोटा ॥ भेटि वस्तु त्रय तीनों भाई । चलिभये हर्षकहत जहँमाई ॥ मातापहँ आये त्रय वारा । निजनिजवस्तुप्रगट अनुसारा ॥ माता आज्ञा कीन्ह प्रकाशा । राखुवस्तुतुमनिजनिज पास।

द्वितीय बार सिन्धुमथन

पुनितुम मथहु सिन्धु कहे जाई । जो जेहि मिले लेख सो भाई ॥ कीन्ह चरित अस आदि भवानी । कन्या तीन कीन्ह उत्पानी ॥ कन्या तीन उत्पान्यो जबहीं । अंसवारि मँ नायो सबहीं ॥ सब माताको आगे कीन्हा । माता बाँटि तिन्हन कहँ दीन्हा ॥ पठयो सिंधु महि पुनि ताही । त्रय सुत मर्मसो जानत नाहीं ॥ पुनि तिन मथन सिंधुको कीन्हा । भेटयो कन्या हाँपित है लीन्हा ॥ कन्या तीनहु लीन्हे साथ। औ जननी कहँ नायहु माथा ॥ माता कहे सुनहु सुत मोरा । यह तो काज भये सब तोरा ॥ एक एक बाँटि तीनहुको दीन्हा । काहु भोग कस आज्ञा कीन्हा ॥ सावित्री ब्रह्मा तुम लेख । है लक्ष्मी विष्णु कहँ देख ॥ पारवती शंकर कहँ दीन्ही । ऐसी माता आज्ञा कीन्ही ॥ तीनउ जन लीन्हीं सिरनाई । दीन्ह अध्याजस भाग लगाई ॥ पाई कामिनि भये अनन्दा । जस चकोर पाये निशिचंदा ॥ काम बसी भए तीनों भाई । देव दैत दोनों उपजाई ॥ धर्मदास परखो यह बात। नारी भयी हती सो माता ॥ माता बहुरि कहँ समझाई । अब फिर सिंधु मथो तुम भाई ॥ जो जेहि मिलै लेहुसो जाई । अब जनिकरो विलंब तुम भाई ॥

तृतीयवार सिंधु मंथन

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अनुरागसागर

( २९ )

तृतीयवार सिंधुमथन

त्रयसुत चले तब माथ निवायो । जो कछु कहेउ करव हम जायो॥ मध्योसिंधुकछु विलंवन कीन्हा । मिला वेद सो ब्रह्म लीन्हा ॥ चौदह रतन की निकसी खानी । ले माता पहुँ पहुँचे आनी ॥ तीनहु बन्धु हरषि हौ लीन्हा । विष्णु सुधा पाय उहर विषदीन्हा ॥

अथाका तोनों पुत्रोंको सृष्टिरचनेकी आज्ञा देना और सब

मिलकर पांच खानकी उत्पत्ति करना

पुनि माता अस वचन उचारा । रचहु सृष्टि तुम तीनों वारा॥ अण्डज उत्पत्ति कीन्हा माता । पिंडज ब्रह्मा कर उत्पाता ॥ ऊष्मजरखानि विष्णु व्यवहारा । शिव अस्थावर कीन्ह पसारा॥ चौरासी लख योनिन कीन्हा । आधा जल आधा थल कीन्हा ॥ एक तत्त्व अस्थावर जाना । दोय तत्त्व ऊष्मज परवाना ॥ तीन तत्त्व अण्डज-निरमाई । चार तत्त्व पिंडज उपजायी ॥ पांच तत्त्व मानुष विस्तारा । तीनों गुण तेहि माहिँ सँवारा ॥

ब्रह्माका वेद पढ़कर निराकारका पता पाना

ब्रह्मा वेद पढ़न तब लागा । पढ़त वेद तब भा अनुरागा ॥ कहे वेद पुरुष इक आही । हैं निरंकार रूप नहिं ताही ॥ शून्य माहिँ वहि जांत दिखावे । चितवन देह दृष्टि नहिं आवे ॥ स्वर्ग सीस पग आहि पताला । तेहिमत ब्रह्मा भौ मतवाला ॥ चतुरानन कहैं विष्णु बुझावा । आदिपुरुष मोहिं वेद लखावा ॥ पुनि ब्रह्मा शिवसों अस कहई । वेद मथन पुरुष एक अहई ॥

ब्रह्मावचन विष्णुप्रति

अहै पुरुष इक वेद बतावा । वेद कहे हम भेद न पावा ॥ कबीरवचन अथाप्रति

तब ब्रह्मा माता पहुँ आवा । करि प्रणाम तब टेके पावा ॥

ब्रह्मावचन अथाप्रति

हे माता मोहि वेद लखावा । सिरजनहार और बतलावा ॥

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( ३० )

अनुरागसागर

छन्द

ब्रह्मा कहे जननी सुनौ, कहहु कन्त तुम्हार है ॥ कीजै कृपा जनि मोहि दुरावो, कहाँ पिता हमार है ॥

अद्यावचन ब्रह्माप्रति

कहे जननी सुनहु ब्रह्मा, कोउ नहिं जनक तुम्हार हो ॥ हमहिते भई सब उत्पति, हमहि सब कीन सम्हार हो ॥ २१ ॥

ब्रह्मावचन अद्याप्रति

सोरठा-ब्रह्मा कहे पुकार, सुनु जननी तैं चित्त दे ॥ कहत वेद निस्वार, पुरुष एक सौगुप्त है ॥ २२ ॥

अद्यावचन ब्रह्माप्रति

कहे अद्या सुनु ब्रह्मकुमारा । मोसे नहिं कोउ क्षण न्यारा ॥ स्वर्ग मृत्यु पाताल बनाई । सात समुन्दर हम निरमाई ॥

ब्रह्मावचन अद्याप्रति

मानो वचन तुमहि सब कीन्हा । प्रथमगुप्त तुम कसरखलीन्हा ॥ जबै वेद मोहि कहै बुझाई । अलखनिरंजन पुरुष बताई ॥ अब तुम आप बनो करतारा । प्रथम कहेन किया विचारा ॥ जो तुम वेद आप कथि राखा । तोकसतुम अलखनिरंजन भाखा आपे आप आप निरमाई । काहे न कथन कीन तुम माई ॥ अब मोसन तुम छल जनिकरहु । सांचे सांच सब कहि उच्चरहु ॥ जब ब्रह्मा यहि विधि हठाना । तब अध्यामन कीन्हतिवाना ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

केहि विधि याहि कहैं समझाई । विधि नहिं मानत मोर बड़ाई ॥ जो यदि कहाँ निरंजन वाता । केहि विधि समझे यह विख्याता ॥ प्रथम कह्यो निरंजन राई । मोर दर्श काहु नहि पाई ॥ जबै जो यहीं अलख लखावों । केहि विधि कहिता को दिखलावों ॥

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अनुरागसागर

( ३१ )

अद्यावचन ब्रह्माप्रति

असविचार पुत्रब्रह्मै समझावा । अलखनिरञ्जनहिंदरसदिखावा ॥

ब्रह्मावचन अद्याप्रति

ब्रह्मा कहे मोहि ठौर बतावो । आगा पीछा जनितुमलावो ॥ मैं नहिं मानौं तुम्हारी बाता । ऐसी बात न मोहि सुहाता ॥ प्रथम तुम मुहि दीनभुलावा । अब तुम कहो न दरसदिखावा ॥ तासु दरश न पैहो पूता । ऐसी बात कहो अजगूता ॥

छन्द

दरशदिखायतत्कालदीजै, मोहिनभरोसतुम्हारहो ॥ संशयनिवारयहिकालदीजै, कीजेनविलंबलगारहो ॥

अद्यावचन ब्रह्माप्रति

कह जननी सुनो ब्रह्मा, कहौं तोसों सत्तही ॥ सातस्वर्ग है माथ ताको, चरण पतालसमही ॥२२॥ सोरठा-लेहु पुष्प तुम हाथ, जो इच्छा तेहि दरशकी जाय नवाओ माथ, ब्रह्मा चले शिरनाइके ॥२३॥

जननी गुन्योवचन चितमाहीं । मोरि कहौ यह मानति नाही ॥ यह कहैं वेद दीन्ह उपदेशा । पै दरश ते नहिं पावै भेशा ॥ कह अष्टंगि सुनो रे वारा । अलखनिरञ्जन पिता तुम्हारा ॥ तासु दरश नहिं पैहै पूता । यह मैं वचन कहौं निजगूता ॥ ब्रह्मा सुनि व्याकुल है धावा । परसन सीस ध्यानहियलावा ॥ ब्रह्मा चले जननि सिर नाई । सीस परसि आवै तेही ठाई ॥ तुरतहि ब्रह्मा दीन्ह रिगारी । उत्तर दिशा बेगि चलि जाई ॥ आज्ञा मांगि विष्णु चलेबाला । पिता दरशको चले पताला ॥ इत उत चितयमहेशन डोला । सेवा करत कष्ट नहीं बोला ॥

विष्णुका पिताके खोजसे लौटकर पिताके घरतक न पहुँचनेका वृत्तांत मातासे कहना और माताका प्रसन्न होना

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( ३२ )

अनुरागसागर

तेहिशिवमनअर्चितअभावा । सेवा करनजननि चितलावा॥ यहिविधिबहुतदिवसचलियऊ। माता सोचपुत्रकह कियऊ॥

विष्णुका पिताके खोजसे लौटकर पिताके चरणतक

न पहुँचनेका वृत्तान्त कहना

प्रथमविष्णुजननी ढिग आये । अपनी कथा कहि समुझाये॥ भेटचो नहि मोहि पगु ताता । विषज्वालास्यामल भौगाता॥ व्याकुल भयउतबैफिर आवा । पिता पगुदरश मैं नहि पावा॥ सुनिहगषित भइआदिकुमारी । लीन्हविष्णुकहैनिकटदुलारी॥ चूमेउ बदन सीस दिये हाथा । सत्य सत्य बोलउ सुतबाता॥

धर्मदासवचन कबीरप्रति

कहे धरमनि यह संशय बीती । साहब कहहु ब्रह्मकी रीती ॥ पितासीस तना परसन कीन्हा । किहोयनिरासपीछेपग पीन्हा॥

छन्द

गयउ ब्रह्मा सीस परसन, कथा ता दिनकी कही॥ भयो दिष्ट मेराव कि,नहि तासु दरशन तिनलही॥ यह बरनि सब कहो सतगुरु, एकएक विलीयके ॥ निजहास जानि परगासकीजे, धरहुनिजजनिगायके२३॥ सो०-प्रभु हम हैं तुव दास, जन्मकृतारथमोरिकरि॥ करहु वचन परगास, तेहि पीछे जो चरित भा ॥२४॥

पिताके खोजमें गये हुए ब्रह्माकी कथा । कबीरवचन धर्मदासप्रति

धरमदास मुहि अतिप्रिय अहहू । कहो संदेश परखि हटगहहू ॥ चलत ब्रह्म तब वार न लावा । पिता दरश कहैअतिमनभावा॥ तेहि स्थान पहुँचि गे जाई । नहि तहैरविशशि शून्यरहाई॥ बहुविधि अस्तुति करे बनायी । ज्योति प्रभावध्यानतहैलाई॥

ब्रह्माके लिये अद्याकी चिन्ता

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अनुरागसागर

( ३३ )

ऐसे बहु दिन गये बितायी । नहि पायो ब्रह्मा दरशपितायी॥ शून्य ध्यानयुग चार गमावा । पिता दरश अजहुँ नहि पावा॥

ब्रह्मा के लिये अथाकी चिन्ता

ब्रह्मा तात दरश नहि पाई । शून्य ध्यान महाँ जुग बहु जाई॥ माता चिन्ता करत मनमाहाँ । जेठ पुत्र ब्रह्मा रह काहाँ ॥ किहि विधिरचना रचहुँ बनाई । ब्रह्मा आवै कौन उपाई ॥

गायत्री उत्पत्ति

उबटि शरीर मैल (न) गहिकाढी । पुत्री रूप कीन्ह रचिठाढी ॥ शक्ति अंशनिज ताहि मिलावा । नाम गायत्री ताहि धरावा ॥ गायत्री मातहि सिर नावा । चरणचूमिनिज सीस चढ़ावा ॥

गायत्री वचन अध्यामति

गायत्री विनवै कर जोरी । सुनु जननी यक विनती मोरी ॥ कौन काज मोहँ निरमाई । कहो वचन लेऊँ सीस चढ़ाई ॥

अद्यावचन गायत्री प्रति

कहे अद्या पुत्री सुनु वाता । ब्रह्मा आहि जेठहि तुव भ्राता ॥ पिता दरश कहँ गयो अकाशा । आनौ ताहि वचन प्रकाशा ॥ दरश तातकर वह नहि पावे । खोजत खोजत जन्म गमावे ॥ जौने विधिते इहँवा आई । करो जाय तुम तीन उपाई ॥

गायत्रीका ब्रह्मा के खोजमें जाना । कबीर वचन धर्मदास प्रति

चलि गायत्री मारग आई । जननी वचन प्रीति चितलाई ॥ चलत भई मारग सुकुमारी । जननी वचन ध्यान उर धारी ॥

छन्द

जाय देखो चतुरमुख कहँ, नाहि पलक उधारई ॥ कछुक दिन सो रही तहवों, बहरि युक्ति विचारई ॥ कौन विधि यह जागि है, अब करौँ कौन उपायहो ॥ मन गुनित सो चबहुत विधि, ध्यान जननी लायहो र४॥

ब्रह्माको जगानेके लिये अद्याका गायत्रीको युक्ति बताना

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( ३४ )

अनुरागसागर

ब्रह्माको जगानेके लिये अधाका गायत्रीको युक्ति बताना

सो०-अद्या आयसु पाइ, गायत्री तब ध्यान महँ ॥ निज कर परसेउ जाय,ब्रह्मा तबहीं जागिहै ॥२४॥ गायत्री पुनि कीन्ह तैसी । माता युक्ति बताई जैसी ॥ गायत्री तब चित्त लगाई । चरणकमल कहँ परसेउ जाई॥

ब्रह्माका जागकर गायत्रीपर क्रोध करना

ब्रह्मा जाग ध्यान मन डोला ॥ व्याकुल भयो वचन तब बोला ॥ कवन अहै पापिन अपराधी । कहा छुड़ायहु मोरि समाधी ॥ शाप देहुँ तोकहँ मैं जानी । पिताध्यानमोहिखण्डचोआनी

गायत्री वचन ब्रह्माप्रति

कहि गायत्री मोहिन पापा । बृक्षि लेहु तब देहहु शापा ॥ कहाँ तोहिसो सांची बाता । तोहि लेन पठयी तुव माता ॥ चलहु वेगि जननिलावहुबारे । तुम विन रचना को विस्तारे ॥

ब्रह्मावचन गायत्रीप्रति

ब्रह्मा कहे कौन विधि जाऊँ । पितादरश अजहुँ नहि पाऊँ ॥

गायत्रीवचन ब्रह्माप्रति

गायत्री कह दरशन पैहो । बेगि चलहु नहि तो पछते हो ॥

ब्रह्माका गायत्रीको साक्षी देनेको कहना और गायत्रीका

ब्रह्मासे रति करनेकी बात कहना

ब्रह्मा कहै देहु तुम साखी । परस्यो सीस देख मैं आंखी ॥ ऐसे कहो मातु समुझायी । तोतुम्हरे सङ्ग हम चलिजायी ॥

गायत्रीवचन ब्रह्माप्रति

कह गायत्री सुन श्रुति धारी । हम नहीं मिथ्या बचन उचारी ॥ जो मम स्वारथ पुरवहु भाई । तो हम मिथ्या कहब बनाई ॥

ब्रह्मावचन गायत्रीप्रति

कह ब्रह्मा नहि लखी कहानी । कहौँ बुँझाय प्रगटकी बानी ॥

सावित्री उत्पत्तिकी कथा

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अनुरागसागर

( ३५ )

गायत्री वचन

कह गायत्री देहु रति मोही । तो कह झूठ जित्ताऊं तोही ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

गायत्री कहै है यह स्वारथ । जानि कहौं मैं पुन परमारथ ॥ सुनि ब्रह्मा चित करे विचारा । अबका यत्न करहुँ इहिवारा ॥

छन्द

जो विमुख या कह करौं अब तो नहीं बन आवई ॥ साखि तो यह देय नहीं जननि मोहि लजावई ॥ यहाँ नाहि पिता पायो भयो न एको काज हो ॥ पाप सोचत नहि बने अब करौं रतिविधि साजहो २५ सो०-कियो भोगरतिरंग, विसरन्यो सो मनदर्शका दोउ कहैं बढयो उमंग, छलमति बुद्धिप्रकाशकिले २६ ॥

सावित्री उत्पत्तिकी कथा

कह ब्रह्मा चल जननी पास । तब गायत्री वचन प्रकाशा ॥ औरो करौ युक्ति इक ठानी । दूसरी साखि लेहु उत्पानी ॥ ब्रह्मा कहे भली है बाता । करहु सोई जेहि मानै माता ॥ तब गायत्री यतन विचारा । देहि मैल गहि कीन्ह नियारा ॥ कन्यारचि निज अंशमिलावा । नाम सावित्री तासु धरावा ॥ गायत्री तिहि कह समुझावा । कहियो दरशब्रह्म पितु पावा ॥ कह सावित्रीहम नहि जानी । झूठ साखि दे आपनि दानी ॥ यह सुनिदोउकहैंचिन्ता व्यापा । यह तौ भयो कठिन संतापा ॥ गायत्री बहु विधि समुझाई । सावित्री के मन नहि आयी ॥ पुनि गायत्री कहा बुझाई । तब सावित्री वचन सुनाई ॥ ब्रह्मा कर मोसों रति साजा । तो मैं झूठ कहौं यहि काजा ॥ गायत्री ब्रह्महि समुझावा । दै रति या कहैं काज बनावा ॥ ब्रह्मा रति सावित्रीहि दीन्हा । पापमोट आपन शिर लीन्हा ॥

ब्रह्माका गायत्री और सावित्रीके साथ माताके पास पहुँचना और सबका शाप पाना

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( ३६ )

अनुरागसागर

सावित्री कस दूसर नाऊं । कहि पुहुपावति वचन सुनाऊं॥ तीनों मिलिके चलि भे तहवां । कन्या आदिकुमारी जहवां ॥

ब्रह्माका गायत्री और सावित्री के साथ माताके पास पहुँचना

और सबका शाप पाना

करि प्रणाम सन्मुख रहे जाईं । माता सब पूछी कुशलार्ह ॥

अद्यावचन ब्रह्माप्रति

कह ब्रह्मा पितु दर्शन पाये । दूसरि नारि कहाँसे लाये ॥

ब्रह्मावचन

कह ब्रह्मा दोऊ हैं साखी । परस्यो सीस देव इन आंखी॥

अद्यावचन गायत्रीप्रति

तब माता बूझे अनुसारी । कहु गायत्री वचन विचारी॥

तुम देखा इन दर्शन पावा । कहा सत्य दर्शन परभावा ॥

गायत्रीवचन

तब गायत्री वचन सुनावा । ब्रह्मा दर्श सीस पितु पावा ॥

मैं देखा इन परसेउ शीशा । ब्रह्महि मिले देव जगदीशा ॥

छन्द

लेह पुहुप परसेउ शीशपितु इन दृढमें देखत रही॥

जल दार पुहुप चढ़ाय दीन्ह हे जननि यह है सही ॥

पुहुपते पुहुपावती भयी प्रगट ताही ठामते ॥

इनहु दर्शन लह्यो पितुको पूछहु इहि वामते ॥२६॥

हे जननी यह है सही तुम पूछि लो पुहुपावती ॥

सबही सांच मैं तोसों कहूँ नहीं झूठहै एको रती ॥

अद्यावचन पुहुपावतीप्रति

माता कह पुहुपावतीसी कहो सत्य हि मो सना ॥

जो चढ़े सीसाहि पिताके तुम वचन बोलहु ततखना॥

१ यह छन्द पुरानी प्रतियोंमें नहीं है