कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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अनुरागसागर
पांच तत्त्व गुण तीनों दीन्हा । यहिबिधिजनकीरचना कीना॥ प्रथम बुन्दते ब्रह्म जो भयऊ । रजगुणपंचतत्त्व तेहि दयऊ ॥ द्वजो बुन्द विष्णु जो भयऊ । सतगुण पंच तत्त्वतिन पयऊ॥ तीजे बुन्द रुद्र उत्पाने । तमगुण पंच तत्त्व तेहि साने॥ पंच तत्त्व गुण तीन खमीरा । तीनों जनको रच्यो शरीरा ॥ ताते फिरि फिरि परलय होई । आदि भेद जाने नहिं कोई॥ कहै धर्म कामिनि सुनबानी । जो मैं कहूँ लेहु सोमानी ॥ जीव बीज आहे तुव पास। सो ले रचना करहु प्रकाशा॥ कर्ण निरञ्जन पुनि सुनु रानी । अब अस करहु आदि भवानी ॥ त्रय सुतसौप तोहि कहँ दीन्हा । अबहमपुरुषसेवचित लीन्हा॥ राज करहु तुम ले तिहुँ बारा । भेद न कहियो काहु हमारा ॥ मोर दरस त्रय सुत नहिं पैहैं । जो मुहि खोजत जन्म सिरै हैं॥ ऐसो मता दिढेहो जानी । पुरुष भेद नहिं पावै प्रानी ॥ त्रयसुत जबहिं होहि बुधिवाना । सिधुमथन दे पठहु निदाना॥
कवीरवचन धर्मदासप्रति
कहेउ बहुत बुझाय देविहि, गुप्त भये तब आहि हो॥ शून्य गुफहि निवास कीन्हों, भेद लहको ताहिहो॥ वह गुप्त भा पुनि सङ्ग सबके, मन निरंजन जानिये ॥ मन पुरुष भेद उच्छेद देवे, आप परगट आनिये ॥ सो०-जीवभयेमतिहीन, परिसि अगमसो कालको॥ जनम जनम भये खीन, मुरुचा कर्म अकर्मको १८ जीव सतावै काल, नाना कर्म लगायके ॥ आप चलावै चाल, कष्ट देय पुनि जीवको ॥ २० ॥