भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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अनुरागसागर

छन्द

गहि भुजा फटकार दीन्हों, परेउ लोकत न्यारहो॥ भयो त्रासित पुरुष डरते, बहुरि उठेउ सम्हार हो॥ निकसि कन्या उदरते पुनि, देख धर्महि अतिडरी॥ अब नाहिंदेखोदेश वह, कहौ कौनविधिकहवाँपरी १७ सोरठा-कामिनिरहीसकाय, त्रासितकालकडर अधिक रही सो सीस नवाय, आसपासचितवत खड़ी ॥१७॥

निरंजनवचन अध्याप्रति

कहै धर्म सुनि आदि कुमारी । अब जनि डरपो त्रास हमारी॥ पुरुषा रचा तोहि हमरे काजा । इकमति होय करहु उपराजा॥ हम हैं पुरुष तुमहि ही नारी । अब जनि डरपो त्रास हमारी॥

अध्यावचन निरंजनप्रति

कहै कन्या कस बोलहु बानी । आता जेठ प्रथम हम जानी॥ कन्या कहै सुनो हो ताता । ऐसी विधिजनिबोलहु बाता॥ अब मैं पुत्री भई तुम्हारी । ताते उदरमांझलियो डारी॥ जेष्ठ बन्धु प्रथमहिके नाता । अब तो अहो हमारे ताता॥ निरमलदृष्टिजब चितवहु मोहीं । नहिं तो पाप होय अब तोहीं॥ मन्द दृष्टिजनिचितवहु मोही । ना तो पाप होय अब तोही॥

निरंजनवचन अध्याप्रति

कहै निरंजन सुनो भवानी । यह मैं तोहि कहों सहिदानी॥ पाप पुण्य डर हम नहिं डरता । पाप पुण्यके हमहीं करता ॥ पाप पुन्य हमहींसे होई । लेखा मोर न लेहै कोई ॥ पाप पुन्य हम करब पसारा । जो बाझे सो होय हमारा ॥ ताते तोहि कहौ समुझाई । सिख हमार लो सीस चढ़ाई॥ पुरुष दीनतोहि हमकहैं जानी । मानहु कहा हमार भवानी ॥

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