कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 147, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनुरागसागर
( ११ )
कूर्म उदर सुत कूर्म उत्पानो । तापर शेष वराहको थानो । शेष सीस या पृथ्वी जानो । ताके हेठ कूर्म विरयानो ॥ किरतम कूर्म अण्डके मांही । कूर्म अंश सो भिन्न रहाही ॥ आदि कूर्म रह लोक मैझारा । तिनपुनिपुरुषध्यानअनुसारा॥
कूर्मवचन सत्पुरुषप्रति
निरंकार कीन्हो बरियाया । कालकलाधरि मो पहुँ आया॥ उदर विदार कीन्ह उन मोरा । आज्ञा जानीकीन्ह नहिं थोरा॥
पुरुष वचनकूर्मप्रति
पुरुषअवाज कीन्ह तेहिवारा । छोटे बंधु वह आहि तुम्हारा॥ आही यही बडनकी रीती । औगुन ठावैं करहिं वह प्रीती॥
कवीरवचन धर्मप्रति
पुरुषवचन मुनि कूर्म आनंदा । अमीसरूप सो आनंदकंदा ॥ पुरुषध्यानपुनि कीन्हनिरंजन । जुग अनेक किय सेवा संजन ॥ स्वार्थ जानि सेवा तिन लाई । करि रचना बैठे पछताई ॥ धर्मराय तब कीन्ह विचारा । कहवालो त्रयपुर विस्तारा ॥ स्वर्ग मृत्यु कीन्हो पाताला । विनाबीजकिमिकीजै रूयाला॥ कौन भांति कस करव उपाई । किहि विधि रचों शरीर बनाई॥ कर सेवा मांगों पुनि साई । तिहुँ पुर जीवित मेरो होई ॥ करि विचार असहठ तिनधारा । लाग्यो करने पुरुष विचारा ॥ एक पांव तब सेवा कियेऊ । चौंसठ युगलों ठाढे रहेऊ ॥
बहुरि पुरुषका सहजको निरंजनके निकट भेजना । छन्द
दयानिधि सतपुरुष साहिब, बस सुसेवाके भये ॥ बहुरि भाष्यो सहज सेती, कहा अब याचत नये ॥ जाहु सहज निरंजनापहैं, देउ जो कुछ मांगई ॥ करहि रचना पुरुष वचना, छल मता सब त्यागई ॥