भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २० )

अनुरागसागर

सहजका निरंजनके निकट पहुँचना

सो० सहज चलेसिरनाय, जबहिं पुरुष आज्ञा कियो॥

तहैंवा पहुँचे जाय, जहाँ निरंजन ठाढ़रह ॥१४॥

देखत सहज धर्म हरषाना । सेवा वस पुरुष तब जान् ॥

सहजवचन

कहै सहज सुनु धर्मराया । केहि कारण अब सेवा लाया॥

निरंजनवचन

धर्म कहै तब सीस नवायी । देहु ठौर जहैं बैठौं जायी ॥

सहजवचन

तब सहज अब भाषै लीन्हा । सुनहु धर्म तेही पुरुष सब दीन्हा॥

कूर्म उदर सो जो कछु आवा । सो तोहि देन पुरुष फरमावा॥

तीनों लोक राजा तोहि दीन्हा । रचना रचहु होहु जनि भीना॥

निरंजनवचन

तवैं निरंजन विनती लायी । कैसे रचना रचूं बनायी ॥

पुरुषहिं कहौं जोर युग पानी । मैं सेवक दुतिया नहिं जानी॥

पुरुष सो विनती करो हमारा । दीजै खेत बाज निज सारा ॥

मैं सेवक दुतिया नहीं जानूँ । ध्यान पुरुषको निशिदिन आनूँ॥

पुरुषहिं कहा जाय यह बानी । देहु बाज अम्मर सहिदानी॥

कबोरवचन धर्मदासप्रति

सहज कह्यो पुनि पुरुषहिं जाई । जस कछु कह्यो निरंजनराई॥

गयो सहज निजदीप सुखासन । जबहि पुरुष दीन्हे अनुशासन॥

सेवा वश सत्पुरुष दयाला । गुण औ गुण नहिं चित किरपाला॥

अबाकी उत्पति

इच्छा कीन पुरुष तेहि बारा । अछुंगी कन्या उपचारा ॥

अष्ट बाहु कन्या होय आई । बायें अंग सो ठाढ़ रहाई ॥

अबाकी उत्पति

माथ नाय पुरुष सो कहई । अहो पुरुष आज्ञा कस अहई॥