कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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अनुरागसागर
सहजका निरंजनके निकट पहुँचना
सो० सहज चलेसिरनाय, जबहिं पुरुष आज्ञा कियो॥
तहैंवा पहुँचे जाय, जहाँ निरंजन ठाढ़रह ॥१४॥
देखत सहज धर्म हरषाना । सेवा वस पुरुष तब जान् ॥
सहजवचन
कहै सहज सुनु धर्मराया । केहि कारण अब सेवा लाया॥
निरंजनवचन
धर्म कहै तब सीस नवायी । देहु ठौर जहैं बैठौं जायी ॥
सहजवचन
तब सहज अब भाषै लीन्हा । सुनहु धर्म तेही पुरुष सब दीन्हा॥
कूर्म उदर सो जो कछु आवा । सो तोहि देन पुरुष फरमावा॥
तीनों लोक राजा तोहि दीन्हा । रचना रचहु होहु जनि भीना॥
निरंजनवचन
तवैं निरंजन विनती लायी । कैसे रचना रचूं बनायी ॥
पुरुषहिं कहौं जोर युग पानी । मैं सेवक दुतिया नहिं जानी॥
पुरुष सो विनती करो हमारा । दीजै खेत बाज निज सारा ॥
मैं सेवक दुतिया नहीं जानूँ । ध्यान पुरुषको निशिदिन आनूँ॥
पुरुषहिं कहा जाय यह बानी । देहु बाज अम्मर सहिदानी॥
कबोरवचन धर्मदासप्रति
सहज कह्यो पुनि पुरुषहिं जाई । जस कछु कह्यो निरंजनराई॥
गयो सहज निजदीप सुखासन । जबहि पुरुष दीन्हे अनुशासन॥
सेवा वश सत्पुरुष दयाला । गुण औ गुण नहिं चित किरपाला॥
अबाकी उत्पति
इच्छा कीन पुरुष तेहि बारा । अछुंगी कन्या उपचारा ॥
अष्ट बाहु कन्या होय आई । बायें अंग सो ठाढ़ रहाई ॥
अबाकी उत्पति
माथ नाय पुरुष सो कहई । अहो पुरुष आज्ञा कस अहई॥