कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअनुरागसागर
( ३३ )
ऐसे बहु दिन गये बितायी । नहि पायो ब्रह्मा दरशपितायी॥ शून्य ध्यानयुग चार गमावा । पिता दरश अजहुँ नहि पावा॥
ब्रह्मा के लिये अथाकी चिन्ता
ब्रह्मा तात दरश नहि पाई । शून्य ध्यान महाँ जुग बहु जाई॥ माता चिन्ता करत मनमाहाँ । जेठ पुत्र ब्रह्मा रह काहाँ ॥ किहि विधिरचना रचहुँ बनाई । ब्रह्मा आवै कौन उपाई ॥
गायत्री उत्पत्ति
उबटि शरीर मैल (न) गहिकाढी । पुत्री रूप कीन्ह रचिठाढी ॥ शक्ति अंशनिज ताहि मिलावा । नाम गायत्री ताहि धरावा ॥ गायत्री मातहि सिर नावा । चरणचूमिनिज सीस चढ़ावा ॥
गायत्री वचन अध्यामति
गायत्री विनवै कर जोरी । सुनु जननी यक विनती मोरी ॥ कौन काज मोहँ निरमाई । कहो वचन लेऊँ सीस चढ़ाई ॥
अद्यावचन गायत्री प्रति
कहे अद्या पुत्री सुनु वाता । ब्रह्मा आहि जेठहि तुव भ्राता ॥ पिता दरश कहँ गयो अकाशा । आनौ ताहि वचन प्रकाशा ॥ दरश तातकर वह नहि पावे । खोजत खोजत जन्म गमावे ॥ जौने विधिते इहँवा आई । करो जाय तुम तीन उपाई ॥
गायत्रीका ब्रह्मा के खोजमें जाना । कबीर वचन धर्मदास प्रति
चलि गायत्री मारग आई । जननी वचन प्रीति चितलाई ॥ चलत भई मारग सुकुमारी । जननी वचन ध्यान उर धारी ॥
छन्द
जाय देखो चतुरमुख कहँ, नाहि पलक उधारई ॥ कछुक दिन सो रही तहवों, बहरि युक्ति विचारई ॥ कौन विधि यह जागि है, अब करौँ कौन उपायहो ॥ मन गुनित सो चबहुत विधि, ध्यान जननी लायहो र४॥