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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

नूरीको मिलनेकी कथा

( ७२ )

ज्ञानसागर

ताकी नारि गई अस्नाना । रूप देखि ताकर मन माना ॥ ले गये बालक सो निज गेहा । बहुत भांति तिन कीन्ह सनेहा ॥ चंदन साडु देखि रिसियाना । चल गयो नारि तोर अब ज्ञाना ॥ बेग डार बालक को आजू । सुने लोग तो होय अकाजू ॥ जाति कुटुम्ब सुने जो कोई । यह तो भली बात नहिं होई ॥ चेरी हाथ तिन दीन्ह पठाई । उद्यान मास तिन दीन्ह अडाई ॥

नूरीको मिलनेकी कथा

काशीमें प्राकट्य

कछु दिन काया धर दुख पावा । यहि अंतर इक जुलहा आवा ॥ नूरि नाम जो वा संग नारी । देखत बालक भई सुखारी ॥ बालक देख नारि मन भूला । रविके उदय कमल जस फूला ॥

सारखी-अति सनेह जिन कीन्हा, नूरी देख रिसान ॥

बालक लीन्हो नारि अब, कहा भयो अज्ञान ॥

बालक वचन-चौपाई

बालक दीन्ह मही मई डारी । अस सुनि बालक दीन्ह हुँकारी ॥ बूझो काल फांस नर नारी । पूर्व जन्म तेहि लीन्ह उबारी ॥ पाछिलि प्रीति भयी अब मोही । तातैं दरश भयो अब तोही ॥

नूरी वचन

तुम जानो अब मैं नहिं जाना । सो अब मोहि सुनाओ काना ॥

नूरीके पूर्वजन्मकी कथा

कबीर वचन

पूर्व जन्म तैं ब्राह्मण दूखी । तोरे गृह कबहु नहिं सूखी ॥ श्वपच भक्त मम प्राणन प्यारा । ताको मान पिता अवतारा ॥ श्वपच भक्ति करै पुनि जबही । मात पिता पर लगै तबही ॥

ज्ञानसागर

( ७३ )

ताकी प्रीति भक्त मन धारा । तातैं भयो विप्र अवतारा ॥ प्रथम प्रीति मोरे मन भावा । तोरे गृह मैं यहि विधि आवा ॥ तोसों कहीं इक भक्ति हटाई । राखौ मर्म हमार छिपाई ॥ देव सुवर्ण नित्य मैं तोही । एक सुहर पुनि ताकी होई ॥

साखी-बोलो नहिं यहि कारणे, ताहि सुक्ति नहिं भाव ॥

माया देख सुलानो, यहि कारण तब पाव ॥

चोपाई

घर नहिं रहो पुरुष औ नारी । मैं शिवसों अस वचन उचारी ॥ आनि देव लक्ष्मी संसारा । आपन को निज भीख अहारा ॥ आन की बार बदत हौ योगू । आपन नार करत हौ भोगू ॥ काशी मरे जन्म नहिं होई । तुव महिमा वगैँ सब कोई ॥ औ पुन तुम सब जग ठग राखा । काशी मरे अजल तुम भाखा ॥ जब शंकर होवे तुव काला । कहाँ रहे तब भक्त विचारा ॥ जीवन करत जो होय अकाजा । या शंकर तब तुम कहैं लाजा ॥ सुनि शंकर तब चलयो लजाई । यहि अन्तर जुलहिनि चलिआई ॥ हे स्वामी मम भिक्षा लीजै । सब अपराध क्षमा प्रभु कीजै ॥ एक पुत्र जो विधि मोहि दीन्हा । कबहुँ बात कहै नहिं लीन्हा ॥

शंकर वचन

तोरें गृह पंडित अधिकारी । झूठ बोल कस बोलहु नारी ॥ हरि कमला सम देखो ज्ञाना । बुद्धिवंत तुम पुत्र सुजाना ॥ साखी-सुनकर महिमा पुत्रकी, नारि धरे तब पांव ॥ हे स्वामी मम इच्छा, श्रवणन वचन सुनाव ॥

चोपाई

कहा लजान कहा फिर आवा । बिहँसि कहा तुम सिद्ध कहावा ॥ सुनिकै वहै दर्प बहु कीन्हा । भिक्षा कनक जाति को दीन्हा ॥

( ७४ )

ज्ञानसागर

भिक्षा दै प्रसुदित चलि आई । हस्तामल को खोज न पाई ॥ वाचा बन्ध तहाँ पुनि आयो । काल कष्ट मैं तोर मिटायो ॥ सुन जुलहा मन भयो आनंदा । जिमि चकोर पायो निशि चंदा ॥ ले सुत चले हर्ष मन कीन्हा । तासों पुनि अस बोलेहि लीन्हा ॥ आगिल जन्म जब होइ तुम्हारा । तुम्हैं पठायब यम तैं न्यारा ॥

साखी-सुत काशी को लै चले, लोग देखन तहाँ आव ॥ अन्न पानी भक्ष नहीं, जुलहा शोक जनाव ॥

चौपाई

तब जुलहा मन कीन्ह तिवाना । रामानन्द सौँ कहि उत्पाना ॥ मैं सुत पायो बड़ गुणवंता । कारण कौन भखै नहीं संता ॥ रामानन्द ध्यान तब धारा । जुलहा सो तब वचन उचारा ॥ पूर्व जन्म तैं ब्राह्मण जाती । हरि सेवा कीन्हेसि भलि भांती ॥ कछु तुव सेवा हरिकी चूका । तातैं भायो जुलहा को रूपा ॥ प्रीति प्रभू गहि तोरी लीन्हा । तातैं उद्यानमें सुत तोहि दीन्हा ॥

नूरी वचन

हे प्रभु जस कीन्हो तस पायो । आरत हो तुव दर्शन आयो ॥ सो कहिये उपाय गुसाई । बालक श्रुधावंत कछु खाई ॥ रामानंद अस युक्ति विचारा । तुम सुत कोई ज्ञानी अवतारा ॥ बछिया जाही बैल नहीं लागा । सो ले ठाढै करै तेहि आगा ॥ साखी-दूध चले तेहि थन तैं, दूधहि धरौ छिपाइ ॥ श्रुधावंत जब होवै, ता कहैं देउ खवाइ ॥

चौपाई

जुलहा इक बछिया ले आवा । चल्यो दूत कोउ मर्म न पावा ॥ चल्यो दूत जुलहा हरषाना । राख छिपाइ काहूँ नहीं जाना ॥ सुन भामिनि आगे चल आवा । सो ले जाइ कोई भेद न पावा ॥

बाललीला और रामानन्दको गुरु करनेका वर्णन

ज्ञानसागर

( ७५ )

दूध न पीवत नाम कबीरा । खेलेत संत संग मत धीरा ॥ तिनसौँ कहैं जागौ रे भाई । बिना नाम नहिँ काल पराई ॥ कोई न बूझौ भेद हमारा । रामानंद पर तब पगु धारा ॥ तब अपने मन कीन्ह उपाई । तिनहि दरश कैसहु नहि पाई ॥

रामानन्दको गुरु करना

जाहि रामानंद गंग स्नाना । तेहि मारग में जा पौढाना ॥ तबहि पांव गुरु लाग कबीरू । रामानंद बोल्यो मत धीरू ॥ उठ कबीर तब वचन उचारा । रामानंद है गुरु हमारा ॥

साखी-करहिगोष्ठी शिष्य सब, कोई ज्ञान जीत नहिं जाय ॥ सत ऋषि सुधि पाई, गुरु सों बोले आय ॥

बोपाई

विद्या कहे मलेच्छ को दीन्हा । रामानंद कोध तब कीन्हा ॥ चले शिष्य तब आज्ञा पाई । कबीर संतको आन बुलाई ॥ सुनतहिं शिष्य चहुँ दिशि धाये । हेर खोज कबीरै लाये ॥ आये कबीर लागि नहि बारा । गुरु मंडलमें आन पगु धारा ॥ अन्तर कपाट शिष्य तब लाया । पूजत रामानंद हरि राया ॥ सुन कबीर आगे चलि आये । गुरुहि आनकर मस्तक नाये ॥ लक्ष्मीनारायण मुकुट सिरनाये । पहिरै वस्त्र माल नहीं समाये ॥ तबहि कबीर वचन अस भाखा । वस्त्र पहिरि माला तुम राखा ॥ अंतर कपाट खोल तब दीन्हा । रामानंद सुन अचरज कीन्हा ॥ दिव्यज्ञान तुम कहैं केहि दीन्हा । जोर कर गुरुहि विनोदित कीन्हा ॥ कब हम तुम को दिशा दीन्हा । नाम हमारा काहे तुम लीन्हा ॥ गुरु हमैं तुम दिशा दीन्हा । झूठ बोलका क्या फल चीन्हा ॥

नं. १ कबीर सागर -

( ७६ )

ज्ञानसागर

साखी-गुरु जब चलैं नहाने, तब हम दिक्षा पाव ॥ तातैं गुरु कहि थाप्यो, फिर पीछे पछताव

चौपाई

पूज्यो पाहन पंडित धर्मा । पहिल न जानो तुम्हरो मर्मा ॥ मैं तो चाहत मुक्ति पदार्थ । तुम पाहिन जापूजे निश्चारथ ॥ तब गुरु सुनकै अचरज भयऊ । योग समाधि वैकुंठहि गयऊ ॥ सत्त समाधि विष्णु जब देखा । तापर देश कबीरहि लेखा ॥ जहैं देखा तहां सत्त कबीरा । झूठ ध्यान भूले मत धीरा ॥ हे कबीर तुम मर्म न जाना । जान मलेछ किया अपमाना ॥ जो कछु आहि मुक्ति सन्देशा । सो सब मोहि कहौ उपदेशा ॥

साहिब कबीर वचन

छोड़ी सबै मान अभिमाना । तो कह देव मुक्ति फल दाना ॥ शिष्य सरवा सौ बात जनाऊ । काल तोर शरणगत आऊ ॥ कहैं कबीर काल है काला । है बड़ दारुण काल कराला ॥

साखी-मुक्तिदेव नहिं लेव तुम, रामानंद गुरु देव ॥ भोरहि जन्म गवांय हो, करि पाहन की सेव ॥

सिकन्दर शाहकी बारता-चौपाई

ता निशि को तब भयो प्रभाता । काशी आइ भयी एक बाता ॥ आये सिकन्दर शाह सुल्ताना । है व्याधा बहु भेद न जाना ॥ रामानंद की सुनी बड़ावा । तातैं शाह आप चलि आवा ॥ आये मंडप जहां सुल्ताना । रामानंद तब देख रिसाना ॥ आये शाह सन्मुख भये जबही । रामानंद मुख फेरा तबही ॥ वार अनेक तिहितें सुख फेरा । तांकी ओर क्रोध कर हेरा ॥ मारचो खंग परचो खसि धरनी । शाह के अङ्ग अनिल सम बरनी ॥ आये शाह जहां दुःख नसावन । अधिक भई जो देह सतावन ॥

सिकन्दरसाहूकी वार्ता और रामानन्दजीका कत्ल होना

ज्ञानसागर

( ७७ )

पय औ रुधिर चल्योगुरु अंगा । पावक उठी शाह के अंगा ॥ तवै शाह ने सुधि अस पाई । महिमा जान कबीर बुलाई ॥

सारखी-कबीर दर्शन दीन्हा जबै, तपन भई सब दूर ॥

शाह कहा तुम सांच हो, औ अल्लहका नूर ॥

सिक्कन्दरवन-चोपाई

पय औ रुधिर चल्यो गुरु अंगा । शाह कहै यह कौन प्रसंगा ॥

कबीरवन

जेहि तन मान्यो शब्द हमारा । तेहि तैं चले दूध की धारा ॥

कीन्हा कालउ केर विचारा । आधा अङ्ग रुधिर अनुसारा ॥

अगले जन्म मुक्ति जो होई । अंकूरी जीव कहावै सोई ॥

गोको बिलाना

यहै चरित्र तहां पुनि भयऊ । तब नूरी के मंदिर गयऊ ॥

काजी मुह्ता सबै रहाये । गाय आनि के गलो कटाये ॥

देखि दुखित भये सत्त कबीरू । महा व्याधि गाई की पीरू ॥

केहि कारण गाई जो मारा । सो सब मोहि कहो उपचारा ॥

काजी काया देख विचारी । एकहि ब्रह्म गाय क्यों मारी ॥

गाय ज़िवावहु मुर्गा सारू । नातर वेद अथर्वन हारू ॥

सत्त शब्द है जासु शरीरू । व्यापी महा गाय की पीरू ॥

सारखी-उठिके गाय ठाढ़ी भई, आज्ञा जबही कीन्ह ॥

काजी मुह्ता जानि कै, पाव पकर तब लीन्ह ॥

चोपाई

नगर के लोग अचंभो लागा । यह कबीर कर्ता हो जागा ॥

मगध गवन

तब तहैं से पुनि कीन पयाना । उत्तर देश मगध अस्थाना ॥

नूवा नूरी काल बस भयऊ । तिन पुनि जन्म मनुष्य हिलयऊ ॥

( ७८ )

ज्ञानसागर

राजा बीरसिंह देव बड़ राज । ताके गृह अब धारचो पाऊँ ॥ कमलावती तासु नृप नारी । तिन बड़ सेवा कीन्ह हमारी ॥ ताकौ दीन्ह पान परवाना । तिन कछु भेद हमारा जाना ॥ कह्यो तासों मुक्ति प्रभाऊ । सुनत भयो आनंदित चाऊ ॥ विजुलीखां पठान बड़ ज्ञानी । सन्त जान जिन सेवा ठानी ॥ तासों कही मुक्ति परभाऊ । ज्ञान गम्य तिन बहुत कराऊ ॥

साखी-अति आधीन जब देखा, ता कहैं दीन्हहा नाम ॥

प्रीति जानि कै ताकी, कछु दिन किय विश्राम ॥

चोपाई

विजुलीखां कहै पीर हमारे । नृप वीरसिंह शिष्य तुम्हारे ॥ साहिब आप तजो जब देहा । दोह दीन सो कीन्ह सनेहा ॥ सुनि विहंसि अस आज्ञा ठानी । दोह दीन से हम निरवानी ॥ हिन्दू तुरक नहीं हो भाई । सुन पठान संशय उपजाई ॥ जो तुम दोइसों न्यारी रीती । मेरे मन कैसे होय प्रतीती ॥ तुम तो हो अछह के बन्दा । यह तो अहै आदमी गंदा ॥ तुमहि शरीर तजौगे जबही । शरीर उपाय करों क्या तबही ॥ कै पृथिवी कै देहों जारा । करहु हुकम सो पीर हमारा ॥ जो कछु होई लोक व्यवहारा । सोई कहो मम पीर पियारा ॥ जो साहिब हुकम जस करिहौ । मजार तुम्हारा रचिके धरिहौ ॥

साखी-बिहंसि कह्यो तब तिनसैं, मजार करौ सम्हार ॥

हिन्दू तुरक नहीं हौं, ऐसा वचन हमार ॥

चोपाई

दिन कछु गये तासु संबादा । राजा बीरसिंह ने भेजे प्यादा ॥ बन्दीछोर आवैं मम गेहा । रानी विन्ती कीन्ह सनेहा ॥ ताकी प्रीति तहाँ पगुधारा । दुःखद्वन्द्व तिन सबै विसारा ॥

ज्ञानसागर

( ७१ )

तिन पुनि कही सुनौ गुरु ज्ञानी । दुतिया ब्याह लगन में ठानी ॥ ब्याह जो होय बिकट अस्थाना । क्या जाने होवे संग्रामा ॥ कोइ घायल कोइ जाई मारा । खाड़ो आही दुहु दिशि धारा ॥ ताकी आज्ञा करौ गुसाई । तिनहि देह क्या करो उपाई ॥ कै गाड़ौ कै जारौ धूरी । यह संशय मेटो प्रभु मोरी ॥ करौ सोई लोक कुल धर्मा । बिन लागै कोई जानै न मर्मा ॥ साखी-जो गाड़ौ तो माटी, जो जारौ तो छार ॥ करो लोककी जो कृति, बोलता ब्रह्म निनार ॥

चौपाई

हे स्वामी तुम मोहि बताओ । तुम तनतजोतो काहि कराओ ॥ जस प्रभु तस पुन सेवक करई । सेवा युक्ति सदा सो तरई ॥ जो तुम कितहू करहू प्याना । गाड़हि लागै तुमहिं पठाना ॥ हँसै सबै यह देखि परतच्छा । गुरु तुम्हारो आहि मलेच्छा ॥ तस कछु भेद बताओ स्वामी । करो कृपा सो अन्तर्यामी ॥ वास्तव तेहो कहाँ बुझाई । जारौ देह जो क्षार उड़ाई ॥ तातैं लोक मैं नहीं छुड़ाओ । यातैं दोह दीन फरमाओ ॥ गयो नृपति तहैं साज बराती । कौतुक रचो देह तब त्यागी ॥ सुनत साज दल चले पठाना । राना मुर्दा ले बिल खाना ॥ लेकर गाड़ै करै निमाजा । करन बिहानक दूरी काजा ॥ साखी-रानी भेजे प्यादहीं, तन जब तजो कबीर ॥ आयो बिजुली खान तब, सुनि वृत्तान्त गंभीर ॥

चौपाई

राजा पास पठाओ पाती । सुनतहि क्रोध जरी तब छाती ॥ छाड़्यो ब्याह चले दल साजी । हनें निशान सम्हर की बाजी ॥ बाजा गाजी तुरही आवहि । यह बिजुलीखां युक्ति बनावहि ॥ ऐसी भांति सो कीन्ह प्याना । रन के आगे बजै निशाना ॥

रतनाकी कथा

( ८० )

ज्ञानसागर

बांधी अस्त्र अस चले बहु बीरा । कुहुक बान औ बहु धन तीरा ॥ बरछी सेल औ छुरी कटारी । खड्ग रु तुरी चपल परचारी ॥ दोड़ दिशि देख अस्त्र चमकारा । मानो साज चलो जल धारा ॥ राजा कीन्ह मरन का ठाना । वयरख रोप जो रहो पठाना ॥ जब देखा मैं होत लराई । युद्ध जानि अस कन्यो उपाई ॥ रानी जान मोर कछु मर्मा । तिन पुनि कही तजो नृप भर्मा ॥

साखी-पहिले खोदो माटी, मुदां देखु निहार ॥

सुरदा नहिं वहि भीतरे, कहा करत ही रार ॥

चोपाई

सत् कबीर नहीं नर देही । जारै जरत ना गाई गड़ही ॥ पठयो दूत पुनि जहां पठाना । सुनिके खान अचंभी माना ॥ दोड़ दल आई सलाहा जबही । बने गुरु नहिं भेटे तबही ॥ दोनों देख तबै पछतावा । ऐसे गुरु चीन्ह नहिं पावा ॥ अपने मैं अचंभा ठाना । रंक माहिं धन गया छिपाना ॥ दोड़ दीन कीन्ह बड़ शोगा । चकित भये सबै पुनि लोगा ॥

रतनाकी कथा

तब अपने मन कीन्ह विचारा । रतना कँदोइन कै पगु धारा ॥ रतना समाधान बहु कीन्हा । राजहि पठय सँदेशा दीन्हा ॥ तुम नृप किमि करते पछताना । निश्चय आही शब्द प्रवाना ॥ रहौ सदा शब्दहि मन लाई । दर्शन मोक्ष होय नहिं भाई ॥ साखी-विजुलीखां सौं दुआ कहि, किमि कारण पछताव ॥ रहौ नाम लौ लाइके, जाते कर्म कटाव ॥

चोपाई

लोक वेद मैं ऐसे विचारा । किमि कारण मन दुखी तुम्हारा ॥ सुने दंडवत बहु विध कीन्हा । तत्त्व मता नामहि गहि लीन्हा ॥ रतना सौं कहि मता अपाना । तेहि सुनिके हरष बहु आना ॥

ज्ञानसागर

( ८१ )

हे स्वामी मोहिं कीजै चेरी । जातै कटै कर्म की बेरी ॥ धन्य शब्द धनिजो कह्यु चहिये । सो सब स्वामी मोसों कहिये ॥ सवा सेर मिष्ठान ले आवहु । और सवासौ पान मैगावहु ॥ इतना चहिये और न काजा । तातै भाग चले यमराजा ॥ सोई अंश पान निज लीन्हा । ताको जीव दान मैं दीन्हा ॥ अंकुरी जिव भेटे निज गेहा । नूवा नाम जो प्रथम सनेहा ॥ साखी-ताको पठयो निज भवन, तीन लोक तें न्यार ॥ नूरी के मन इच्छा, धर्मदास अवतार ॥

चौपाई

सुन धर्म दास यहै कुल धर्मा । मेटो तीरथ बरत कुल भर्मा ॥ कोटि जन्म कीन्हौ तप धर्मा । विनसत गुरु नहिं मिटिहै भर्मा ॥

धर्मदासवचन

हंस राज जो दर्शन दीन्हा । जन्म स्वारथ अधमको कीन्हा ॥ हे प्रभु मोरे बन्दी छोरा । हौं आधीन दास मैं तोरा ॥ आनहु पान और मिठाई । जितनौ रतना के मन भाई ॥ आनहु रतना कहौ तुम स्वामी । कृपा करो तुम अन्तर््यामी ॥

कबीरवचन

प्रथम हि जो पावै निज बीरा । पुरुष रच्यो सुख सागर तीरा ॥ जाके रहे पुरुष औ नारी । बीरा नाम जीव रखवारी ॥ सवा लक्ष जीव नित जो मारा । तातैं सवा सेर व्यवहारा ॥ साखी-सवा सेर मिष्ठान जो, और सवा सौ पान ॥ इतना ले जो शिष्य हो, यम तेहि देखि डरान ॥

चौपाई

सुहर देखि जैसे घट वारा । जिनहैं घाट ऊपर बैठारा ॥ जो कोइ झूठा रूप बनावै । बिना पान जान नहिं पावै ॥

( ८२ )

ज्ञानसागर

आने फेर परवाना सोई । जैसा अंक सुहर पर होई ॥ इतनी सुन हरषे धर्म दासा । शिरनी पान लाइ धरे पासा ॥ सेत सिंहासन सेतु ई साजा । सेत पान सिर क्षत्र बिराजा ॥ पाने दलतै सबहीं कीन्हहा । तामें अंक अग्र को दीन्हहा ॥ प्रथम हि तितुका वेग तुरायी । मारग भेद तबै समुझायी ॥ बाएं दाहिने है सहि दानी । इकदिशि धर्म द्वितीय दुर्गदानी ॥ पाछे चित्र गुपित्र को थाना । तेहि तजि हंसा देइ पयाना ॥ टूटै घाट अठासा कोरी । हंसा चढ़े नाम की डोरी ॥

साखी-यमसों तितुका तोरकै, तब दीजौ निजपान ॥

पाई प्रसादै हर्ष तब, शब्द देख मन मान ॥

चौपाई

जाई उबारौ हंस अंकुरा । मन की दिशा देख मन भुला ॥ हे प्रभु कौन शब्द है सारा । तौन शब्द तैं जीव उबारा ॥ एक शब्द पुनि दीन्हहा हेरी । यही शब्द तैं जीव उबेरी ॥ जस दरपर लै दीजे हाथा । दर्शन देखै मुख औ माथा ॥ धर्म दास सुनत मन माना । बिकसे कमल उदैं जनु भाना ॥ यही वस्तु से जीव उबारा । और ज्ञान है बहुत अपारा ॥ मूल नाम अक्षर धुनि साचा । जेहि तैं जीव काल सों बाचा ॥ आदि नाम पुरुष कर आही । भाग जीव पाव पुनि ताही ॥ धन्य भाग वस्तु जिन पाया । मोकहँ सत गुरु अलख लखाया ॥ अक्षर मूल और सब डाला । डारहि में फल फूल रसाला ॥ किंचित को फल पावै सोई । कहैं कबीर अमर सो होई ॥ अक्षर मूल अमी पैंच शाखा । साखी रमैनी ताकी पाता ॥ सुमिरन डार पुहुप है जोगा । तेहि सम आहिना दूसर भोगा ॥ साखी-अक्षर धुनि लौ लावई, अपराधै परिचय योग ॥ कहैं कबीर संशय गयी, भोगहि मध्ये भोग ॥

चौका आरतीकी विधि

ज्ञानसागर

( ८३ )

चौपाई

भव मैं अक्षर परचे पावे । सत्त गहै सतलोक सिधावे ॥ पुहुपहि से फल उपजे सारा । फल है मुक्ति भोगसे न्यारा ॥ हे प्रभु जो इतना नहि जाना । सो जिव कैसे लोग पयाना ॥ पंच अमीका सुमिरन दीजे । बंदी छोर ताहि किमि कीजे ॥ औ पुनि ताहि देव जप माला । आवहि लोकसो भौनहि डाला ॥ निश्चय कहौ पंथ कर भाऊ । दुविधा भाव लरो मत काऊ ॥ कहो पंथ जो पाँजी वाका । धरती शीश स्वर्ग का नाका ॥

साखी-यहि विधि राह चलावहु, सुनहु हो धर्मदास ॥ जीव छुड़ाओ काल सो, सत्त शब्द परकाश ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

हे प्रभु मैं कहत डराऊँ । कहों सो एक वस्तु जो पाऊँ ॥ जो नहि पावहि एती साजा । तासों किमि डरि है यमराजा ॥

कबीर वचन

साठ समय बारह चौपाई । एही तत्व हंस घर जाई ॥ पांच अमी महाँ एकौ पावे । है परमान सो लोग सिधावे ॥ अथवा जो एकौ नहि पावे । चार करी तत्त्व मन लावे ॥ चार करी बूझे मन लाई । यमराजा तेहि देख डराई ॥ अदेख देख तत्व मन धरयी । बोलता ब्रह्म सो परिचय करई ॥ इनकी देख नाम लौ लावे । डोर गहै सत्य लोक सिधावे ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु जो इतना नहि जानै । सो जिव कहा करै विश्रामै ॥ नामहि पाइ तत्व मन धरई । दुविधा भाव कबहुँ नहि करई ॥ निर्गुण नाम रहे लव लाई । ताके निकट काल नहि जाई ॥

( ८४ )

ज्ञानसागर

साखी-खोजकर सत शब्द का, गहै तत्त्व मत धीर ॥ निश्चय लोक सिधाइ है, अस कथ कहैं कबीर ॥

धर्मदासवचन-चोपाई

हे प्रभु जा पर दाय़ा होई । पावै वस्तु सार पुनि सोई ॥ अथवा जो ऐती नहि पावै । हे प्रभु तो कैसी बनि आवै ॥

साहब कबीर वचन

पावै सार जान निज बीरा । निश दिन सुमिरे धन्य कबीरा ॥ जहाँ सुने सतगुरु को नामा । सुने भक्ति छाड़ै सब कामा ॥ सुने जो भक्ति तत्त्व मन लावै । देह छोड़ि सत लोक सिधौवै ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु जो इतना नहि राता । तासौ कैसी कहिये वाता ॥ माया जीव अधिक लपटाना । तातैं प्रभु पूछौ इठ ग्याना ॥

साहब कबीर वचन

धर्मदास मोहि यदि भावै । करही जाप धनी जो पावै ॥ आवै मल्ल तब करै लड़ाई । जाने दाव घात चतुराई ॥ तबही बने कृपी को साजा । कोठी बीज खेत उप राजा ॥

साखी-शूरा बैर भल खोजिये, बीज धरहि को सार ॥ रयाया बीज न बोइये, ऐसा मता हमार ॥

चोपाई

बिना नाम बहु तन डहकाया । फिर फिर भौजल भटकाखाया ॥ जुग जुग जन्मबहुरि भवलीन्हा । होई हित नहि नाम विहूना ॥ नाम पाय जो तत्त्व न धरई । ते पुनि जन्मै गुरु क्या करई ॥ तत्त्व प्रमाण यही धरमदासा । तातैं मिटै कालकी फाँसा ॥

धर्मदास वचन

बालक कहा तत्त्व को जानैं । मुक्त होय तेहि कौन प्रमानै ॥

योग कर्मका वर्णन

ज्ञानसागर

( ८५ )

साहित्य कवीर वचन

बालक नाम कौ दीजै बीरा । पहुँचे लोक जब तजे शरीरा ॥ त्रिया कह सनेह है सारा । उपजै भाव होय जम न्यारा ॥ जातैं नर अचेत अज्ञाना । तातैं तत्त्व नाम परमाना ॥ तत्त्व है मूल और सब साखा । ताकौ नाम जोग मय भाखा ॥ जो नर तत्त्व न राखे ज्ञाना । ताकौ ज्ञान बालक सब जाना ॥ पावै आदि अंत निज बीरा । पुरुष रच्यो सुख सागर तीरा ॥ छठै मास बीरा निज पावै । है प्रमान सो लोक सिधवै ॥

साखी-तत्त्व मुक्ति है निश्चय, औ बीरा निज सार ॥

माया लीन्ह नर प्राणी, भूल परा संसार ॥

धर्मदास वचन-चोपाई

निसिदिन रह माया लपटाना । सो प्रभु कैसे होय निर्वाना ॥

साहित्य कवीर वचन

निस दिन रहे माया विस्तारा । पलकौ भज तो उतरै पारा ॥ पलकौ नाम चित्त ना धरई । ते पुनि जन्मैं गुरु क्या करई ॥ कर्म निवारन जेहिते होई । परिचय सहज तत्त्व है सोई ॥

धर्मदास वचन

सो मोहि स्वामी प्रगट बताऊ । केहि विधिजोगकर्मसमझाऊ ॥

साहित्य कवीर वचन

प्रथम सत्य आसन आराधै । निवरी कर्म जो या विधि साधै ॥ काम मारिये अरूप अहारा । जहाँ काम तेहि जोग बिकारा ॥ कोइ कछु कहै हृदय नहीं धरई । निन्दा विन्दा मब परिहरई ॥ तजै देह जिमि कांचरि सांपा । आलस निद्रा सहज निदापा ॥ दृष्टि न जावै भल औ मंदा । मनहि न आनै संसो नंदा ॥ धोती वस्ती नेती करई । जिमि कामिन सो ग्रहै बहरई ॥

अष्ट कमल वर्णन

( ८६ )

ज्ञानसागर

तिनका खेह मंदिर में होई । करई दूर भामिनी सोई ॥ या विधि काया संयम राधै । बांधै मूल अरु नाको साधै ॥

छंद-मूल बांधै नाम साधै काया संयम जानिकै ।

मन पवन दोई तुरी साजै युक्ति जीव बनायकै ॥

देह ताडना चित्त को तुबक सर छाड़ै आस हो ।

तेही आस चढ़टोरै ममासा जीव होय निकास हो ॥

सोरठा-ऐसी बाजी होई, मनके संग दौराइये ।

मन शूरा पुनि सो, कष्ट परै पुनि ना टरै ॥

चोपाई

परै कष्ट तब तोरिगे वासा । राखै खड़ नाम को पासा ॥

नाम अछ ते दूत डराई । भागे अरि शूरा जिमि पाई ॥

अरि के भाजैं होय हुलासा । दुविधा भिटै कमल परगासा ॥

अष्ट कमल देखै पुनि सोई । मानौ रंक महा धन होई ॥

देखै ब्रह्म जहाँ अस्थाना । भय भाजैं तब हो निर्वाना ॥

अष्टकमल वर्णन

अष्ट कमल तोहि भेद बताऊँ । अजपा सोहं प्रगट बुझाऊँ ॥

मूल कमल दल चार ठिकाना । देव गणेश तहाँ कीन्ह पयाना ॥

ऋद्धि सिद्धि बासा तहाँ होई । छै सौ जप अजपा तहाँ सोई ॥

द्वितीय कमल पटदल परमाना । तहाँ कमलन कर आहि ठिकाना ॥

सावित्री ब्रह्मा है जहवाँ । षट सहस्र जाप है तहवाँ ॥

छन्द-त्रय कमल दल अष्ट है हरि लक्ष्मी तिहि संग मौँ ।

षट सहस्र जहँ होई अजपा निरखि देखो अंग मौँ ॥

कमल चौथा द्वादश दल शिव को तहाँ निवासु हो ।

सुरति नरति करि लोक पहुँचै षट सहस्र जहाँ जासु हो ॥

ज्ञानसागर

( ८७ )

सोरठा-पञ्चयें कमल प्रकाश, तिहिं पोडश दल अहै ॥ आतम जीव निवास, कइ सहस्र अजपा कह्यो ॥

चौपाई

छठवां कमल अहै दल तीनी । सरस्वती तहैं वासा कीनी ॥ दोसौ एक अजपा जहैं होई । बूझे भेद सो बिरला कोई ॥ भौर गुफा दो जल परवाना । सातों कमलकोआहि ठिकाना ॥ एक सहस्र अजपा परकाशा । तहां बोलता ब्रह्म को वासा ॥ तहां जोग साधे बहु जोगी । इंगलापिंगला सुखमनि भोगी ॥ तहां देख असंख्य जो फूला । ब्रह्म थाप काया में भूला ॥ सात कमल जाने सब कोई । अष्टम कमल विनुमुक्ति न होई ॥ विनु सतगुरु को भेद बतावै । नाम प्रताप जोग हि आवै ॥ काया तें जो बाहिर होई । भाग जीव पावै पुनि सोई ॥ छन्द-बहु भांति मुनि ऋषिजोग ठान्यो भयोरहित नहिं लेस हो ॥ काया थापी सुरति सों सब काग भये नहिं हंस हो ॥ पक्षी होई तब होइ महाबल नाम विना तो काग हो ॥ पक्षी त्यागी जो नाम साधे हंस होय बड़ भाग हो ॥ सोरठा-जोग तो आहि अपार, पक्षी भया पर नयन नहीं ॥ जोग नाम उजियार, नाम तेहि जो पावही ॥

चौपाई

पक्षी भाग नयन जिन पावै । ताके जहां तहां उड़ जावै ॥ देखे लोक जो गुरु बतावै । पक्षी नयन को यहै स्वभावै ॥ अथवा नाम नेक जो पावै । साधे तत्त्व जो लोक सिधावै ॥ नाम नयन पक्षी जो होई । तेहि समान दूसर नहिं कोई ॥ बाहिर को मैं कहब ठिकाना । सुरतिकमलसतगुरु निरवाना ॥

( ८८ )

ज्ञानसागर

छः सौ एक एकसौ बीसा । अजपा ऊपर देखे ईसा ॥ सातदलकमल देवऋषि माना । अष्ट कमल उनहूँ नहिं जाना ॥

छन्द-यह भांति अजपा तत्त्वऽराधे बस करे पाँचों भूत हो । रुनक झुनक बाजेआदि अक्षर दिमँकर बाचे तार हो ॥ षट् चक्र बांधे देह में तब जोग मुद्रा सार हो । प्रेम को बाजे पखावज प्रति दिना ततकार हो ॥

सोरठा-आतम जीव जो जाय, मुक्ति मुक्ता संग में ॥ तिन सँग ब्रह्म समाय, जिमि जा सरिता सागरेँ ॥

चौपाई

सरिता परै सिन्धु महाँ जबहीं । दुबिधा भाव न उपजै कबहीं ॥ सरिता संग रहे यक नीरा । भिन्न भाव कथ कहैं कबीरा ॥ दक्षिण नयन जब नेह निहारी । ते समरै बहुतै अधिकारी ॥ चन्दन निकट वृक्ष जो होई । भेद सुवास प्रबल है सोई ॥ संगति का फल ऐसा होई । यह तो भेद जाने जन कोई ॥ चन्दन नाम सुमेर है जोगा । इतनी प्रगट करै जो भोगा ॥ आतम जीव भेद पुनि होई । चन्दन बेल कहै सब कोई ॥ चन्दन कष्ट सब कोई जाना । यहै भेद विरले पहिचाना ॥

छन्द-जोग सम कछु भोग नाहीं देखु हृदय विचारि कै । पांच को बस करो आपने बसै पांच सम्हारि कै ॥ तीन गुण औ नाम चौथा बहुरि इनहि सम्हारिये । तब जीतिये निष्कंटका हो प्रति योग यहि विधि साधिये ॥

सोरठा-मेटें जम को दंड, मुक्ति होय तेहि अटल पुन ॥ विष को करे निकन्द, जोग होय जो नाम फल ॥

ज्ञानसागर

( ८९ )

चोपाई

संशय मिटे जोग के धारे । मैं अपने मन कीन्ह विचारे ॥ संशय को खंडन है जोगा । ता सम आहि न दूसर भोगा ॥ जीव को काज जाहितें होई । सोई जतन करो सब कोई ॥ अथवा देह जोग कोई न साथे । तो अब सहज जोग अवराधे ॥ ता मैं मिल जो यह निस रहई । दुविधा भाव कबहुँ नहिं करई ॥

साखी-पांच तत्त्व गुण तीन हैं, और प्रकृति पञ्चीस ॥

चौतीस ऊपर डेरा करई, नाम तत्त्व इक्कीस ॥

चोपाई

चौतीस ऊपर डेरा करई । नाम तत्त्व पलक नहिं टरई ॥ ये सब एक नखा मैं राखै । गुरु प्रसाद अमीरस चाखै ॥ सत गुरु दया सम्पुट उघराई । शून्य शहर में बैठे जाई ॥ देखे बोलता ब्रह्म तेहि ठाई । करे हर्ष धर्ष सी जाई ॥ ब्रह्म देखि त्रिकुटी मैं मुक्ता । जीव सीव होय इक जुगता ॥ जीव सीव एकै लख जाना । देह जीव तब देख पयाना ॥ शब्द प्रतीत देख सत लोका । गुरु की दया मिटे सब धोखा ॥ अगम अलख सो गुरु समझावै । सुरती निरति से दर्शन पावै ॥ गुरु की दया गम्य जो होई । निश्चय दर्शन पावै सोई ॥ एक बार जो दर्शन पावै । देखै बहुरि विलम्ब न लावै ॥ एकै सुरति निरति जो धारे । सुरति सनेही दीप निहारे ॥ यह निस तत्त्व मता जो धारे । गुरु प्रताप सों लोक सिधारे ॥ जाते सहज योग नहिं होई । तातैं आरति साथे लोई ॥ जो मनसा मारे नहिं कोई । तो पुन दासी कर निज सोई ॥ जो कोई काछे सन्त का भेखा । तासों कहिये जोग का लेखा ॥

साखी-गेही लीन्हें आरती, संत सोई सो भोग ॥

इडा पिंगला साधिकै, सुषमनि राधे जोग ॥

गैबी रहनी

( ९० )

ज्ञानसागर

चौपाई

जैसे ग्रेही के मन नेहा । तैसे साथे जोग सनेहा ॥ आसन हठ पर नारि न जावै । ग्रेही रहै न भेष बनावै ॥ देखी देखा भेष बनावै । राध जोग तो शोभा पावै ॥ भेषै धरे सूरता चाही । कादर भेष की हांसी आही ॥ जाते मन सूरमा नहिं होई । तातैं ग्रेही थाप्यो सोई ॥ ग्रेही मैं छल मता अपारा । तातैं सत्य भक्ति चित धारा ॥ करे जो सेवा सन्त की सोई । आरत भक्त महा फल होई ॥ धन्य सन्त जो आरति साजा । काल जंजाल तेहि घरतैं भाजा ॥ आरति समान भक्ति नहीं दूजा । सब ते भली सन्त की पूजा ॥ चरणामृत तासु को लेई । सुरति निरति चरणन चित देई ॥

साखी-सन्त आरती जोग मन, करहि गगनमें बास ॥

ग्रेही जोग न जानहीं, कर आरति परकाश ॥

चौपाई

विना जोग मैं होय उबारा । कै नेवर कै दीपक बारा ॥ तातैं सहज जोग मैं भाखा । शिरनि पान महातम राखा ॥ आरति तो नानाविधि साजै । पान मिष्टान्न भक्त भय भाजै ॥ जो कछु आहि जोगकर भाऊ । सब भाखौ आरति पर भाऊ ॥ वह देही यह ग्रेही व्यवहारै । काया संजम दै अनुसारै ॥ निशिदिन सुरति निरति बिचारा । तातैं मंदिर सेत सद्धार ॥ पांचौ तत्त्व तीन गुण साथै । तातैं मन बिच आरति राधै ॥ इंगला पिंगला सुषमनि वासा । मन बिच कर्म आरत परकाशा ॥ बांधै मूल नाम को साथै । दुबिधा मिटै एक अवराधै ॥ एक घरै कर प्रकृति पचीसा । सोई पुरुष आरति मैं दीसा ॥

साखी-उलट पवन जब आवै, त्रिकुटी भेट जो होय ॥

गुरु की दायो प्रकट हो, संपुट उघरै सोय ॥

आरतीका योगरूपसे वर्णन

ज्ञानसागर

( ११ )

चौपाई

उघरै संपुट गुरु की दाय़ा । नरिअर को देखै परभाया ॥ तत्त मूल नरिअर मो जाना । ज्ञानवंत भजि हो निर्वाना ॥ अनहद बाजै त्रिकुटी ताला । तातैं भक्ति जो होय रिशाला ॥ बिन करताल पखावज बाजे । अनहद धुन निस दिन तहैं गाजै ॥ अष्ट दल कमल फूल जो फूला । तातैं सुमिरन किये समतूला ॥ सुन अति जोग छतीसौ रागा । तातैं भांति भांति पद जागा ॥ जोग करत मैं देह बिसारै । या संसार मैं काज सम्झारै ॥ जोग समाधि छूटत नहिं देखा । आरत से मिटै कर्म विशेषा ॥ प्रतिदिन जो समाधि मन लावै । तातैं सदा आरति गावै ॥ जोग हीन तत्त नहिं लहई । तातैं पान पढोता चहई ॥ देखो मन बहुरंग अपारा । तातैं पुहुप सेत विस्तारा ॥ देह समाधि गंध बहु होई । साथै अग्र प्रबल है सोई ॥ चौका सेत हंस भल छाजै । सेत सिंहासन छत्र विराजै ॥

साखी-परचै मैं मन बांधै, करे जोग मन बास ॥ संतन आरत जोग मन, दीपक करे प्रकाश ॥

चौपाई

मन औ पवन आहिं दो धारा । तातैं पवन अनिल घूत जारा ॥ जोग जुगत बिन संग न होई । पालै पवन पाहन है सोई ॥ गगन बाव गरजै जो जाई । दीप शिखर द्वारै ठहराई ॥ ह्यावै जोग अमीरस चाखा । तातैं महाप्रसाद जो भाखा ॥ धन्य अंकुर जीव है सोई । परिचय जोग करै तन जोई ॥ जोग न होय आरती करई । सोई जीव भवसागर तरई ॥ मूल नाम और सब शाखा । पुहुप जोग महातम राखा ॥ जोगी दृष्टि भाव बहु करई । घट घटमें सुमिरन अनुसरई ॥