भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ज्ञानसागर

( ८९ )

चोपाई

संशय मिटे जोग के धारे । मैं अपने मन कीन्ह विचारे ॥ संशय को खंडन है जोगा । ता सम आहि न दूसर भोगा ॥ जीव को काज जाहितें होई । सोई जतन करो सब कोई ॥ अथवा देह जोग कोई न साथे । तो अब सहज जोग अवराधे ॥ ता मैं मिल जो यह निस रहई । दुविधा भाव कबहुँ नहिं करई ॥

साखी-पांच तत्त्व गुण तीन हैं, और प्रकृति पञ्चीस ॥

चौतीस ऊपर डेरा करई, नाम तत्त्व इक्कीस ॥

चोपाई

चौतीस ऊपर डेरा करई । नाम तत्त्व पलक नहिं टरई ॥ ये सब एक नखा मैं राखै । गुरु प्रसाद अमीरस चाखै ॥ सत गुरु दया सम्पुट उघराई । शून्य शहर में बैठे जाई ॥ देखे बोलता ब्रह्म तेहि ठाई । करे हर्ष धर्ष सी जाई ॥ ब्रह्म देखि त्रिकुटी मैं मुक्ता । जीव सीव होय इक जुगता ॥ जीव सीव एकै लख जाना । देह जीव तब देख पयाना ॥ शब्द प्रतीत देख सत लोका । गुरु की दया मिटे सब धोखा ॥ अगम अलख सो गुरु समझावै । सुरती निरति से दर्शन पावै ॥ गुरु की दया गम्य जो होई । निश्चय दर्शन पावै सोई ॥ एक बार जो दर्शन पावै । देखै बहुरि विलम्ब न लावै ॥ एकै सुरति निरति जो धारे । सुरति सनेही दीप निहारे ॥ यह निस तत्त्व मता जो धारे । गुरु प्रताप सों लोक सिधारे ॥ जाते सहज योग नहिं होई । तातैं आरति साथे लोई ॥ जो मनसा मारे नहिं कोई । तो पुन दासी कर निज सोई ॥ जो कोई काछे सन्त का भेखा । तासों कहिये जोग का लेखा ॥

साखी-गेही लीन्हें आरती, संत सोई सो भोग ॥

इडा पिंगला साधिकै, सुषमनि राधे जोग ॥