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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

निरञ्जनबोध (द्वादश तरंग)

सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन, धनी धर्मदास, चूरामणिनाम, मुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्रनाम, दया नाम की वंश व्यालीसकी दया.

अथ श्रीबोधसागरे

द्वादशस्तरंगः

श्रीग्रन्थ निरञ्जनबोध

ज्ञानी वचन चौपाई

काल निरंजन निर्गुणराई । तीन लोक जिह्वा फिरे दुहाई ॥ सात दीप पृथ्वी नौ खण्डा । सप्त पताल इक्कीस ब्रह्मांडा ॥ सहज सुन्नमें कीन्ह ठिकाना । काल निरंजन सबहीने माना ॥ ब्रह्मा विष्णु और शिव देवा । सब मिल करें कालकी सेवा ॥

( ६ )

निरंजनबोध

चित्रगुप्त धर्म वरियारा । लिखनी लिखे सकल संसारा ॥ चौरासी लाखअरुचारों खानी । लिखनी लिखे सकल सब जानी ॥ पशु पक्षी जल थल विस्तारा । बन पर्वत जल जीव विचारा ॥ काल निरंजन सब पर छाया । पुर्ष नामको चिह्न मिटाया ॥ सत्तरयुग ऐसेहि चलि गयेऊ । पुर्ष शब्द एक चित्तमें ठयेऊ ॥

पुर्ष वचन

तबहीं पुर्ष ज्ञानी सों कहऊ । धर्मराय अति प्रबल जो भयऊ ॥ यह तो अंश भयावरियारा । तीन लोक जीव कीन्ह अहारा ॥ नाहि मारकै देव उठाई । जग जीवनको लेहु छुडाई ॥

ज्ञानी वचन-साखी

दोहा—करि प्रणाम ज्ञानी चले, करन हंसके काज । जोपै काल न मानि है, तुम्हीं पुर्षको लाज ॥

चौपाई

मान सरोवर ज्ञानी आई । काल कठिन तब छेकी धाई ॥ काल कठिन गजें बहु वारा । मस्तिक साठ सूठ बरियारा ॥ सत्तर योजन गजें दंता । प्रलय जो कीन्हो काट अनंता ॥ कान एक आँखे चौरासी । औ मुख आठ हाथ लिये फाँसी ॥ छत्तिस नाम ताहि पुन जानी । बोले वचन बहुत इतरानी ॥ तीन दंत पाछेको फेरी । यहि विधि तीन लोक किये जेरी ॥ एक दंत पाताल चलावा । तहाँ जाय वासकको खावा ॥ दूजो दन्त पृथ्वी चलि आई । देव ऋषि जग दैत्यन खाई ॥ तीजो दंत गयो आकाशा । चन्द्र सूर्य खाये कैलासा ॥ ब्रह्मा वेद पढ़त तहाँ आये । शंकर ध्यान करत तब खाये ॥ लीन्हें खाय विष्णु को धाई । सकल खाय पुनि धूरि उडाई ॥ गजें दन्त अग्नि सम भाई । तीन लोक खाई दुनियाई ॥

बोधसागर

( ७ )

ज्ञानी वचन

ज्ञानी देखे दृष्टि पसारा । याते नाहिं बचे संसारा ॥ ज्ञानी बोले शब्द बरियाई । तूहा काल खाइ दुनियाई ॥ निरञ्जन वचन-साखी

दोहा

जाहु ज्ञानी घर आपने, मानों वचन हमार । तीन लोक पुर्षहि दिये, स्वर्ग पताल संसार ।

ज्ञानी वचन-साखी

चौपाई

बोले ज्ञानी शब्द अपारा । मोकहैं दीन्हा पुर्ष टकसारा ॥

साखी

मैं जो पठयो पुर्षको, करन हंसके काज । कालहि मार सिंगार हों, दीन्ह सकल मोहे साज ॥

चौपाई

मारा काल शब्दका झारा । टूटे दन्त न करे पसारा ॥

निरञ्जन वचन

तबै निरञ्जन बोले बानी । कैसे हंस छुड़ाई ज्ञानी ॥ जगके माह कीन्ह हम बासा । पशु पक्षी जल थलमें आसा ॥ तीन सौ साठ पैठ हम लाई । तामें सकल जीव उरझाई ॥ जे दिनते हमने पैठ लगाई । दिन दिन उरझे सुझात नाहीं ॥ तापर काम क्रोध हम डारी । तृष्णा सकल जीवकहैं मारी ॥ इनमें जीव बन्धे सब झारी । कैसे हंसहि लेव उबारी ॥ तापर कीन्हो एक हम काजा । पाप पुण्य थापे हम राजा ॥ शुभ अरु अशुभ दोहदल साजा । ऐसे अलख निरञ्जन राजा ॥

( ८ )

निरञ्जनबोध

ज्ञानी वचन

सत्त शब्द हम बोले बानी । वचन हमारे छूटे प्रानी ॥ गहे शब्द जब मन चित लाई । भाजे काल जीव लेव छुड़ाई ॥

काल वचन

तबै काल अस बोले बानी । सकल जीव वस हमरे ज्ञानी ॥ तीन सौ साठ पैठ उर्रेश । कैसे हंसन लेव उबेरा ॥ गङ्गा जमुना सरस्वती जानी । पुष्करगोदावरी कुछका मानी ॥ बद्री केदार हम का ठाऊं । जहाँ तहाँ हम तीर्थ लगाऊं ॥ मथुरा नगर उत्तम जो जानी । जगन्नाथ जस बैठे ध्यानी ॥ सेतुबन्ध पुन कीन्ह ठिकाना । पुष्कर क्षेत्र आय जम थाना ॥ हिंगलाज जिव जेहे सोई । कालका नगरकोठ महाँ होई ॥ गढ गिरना दत्तको थाना । ताहि घेर जम बैठ निदाना ॥ कमरू माह कमिशा देवी । नीमखार मिसरख जम लेवी ॥ नगर अजुध्या रामहिं राजा । खैहैं दइत बांध सब साजा ॥ याही पैठ जग जीव भुलाई । किहिं विधि हंस देव मुक्ताई ॥

ज्ञानी वचन

तब ज्ञानी अस बोले बानी । जमते जीव छुडावहुँ आनी ॥ पुर्ष नामको कहुँ समभाई । जमराजा तव छोड पराई ॥ घाट बाट बैठे उर्रेश । हम शब्दतें होय निवेरा ॥ सुना रे काल दुष्ट अनयाई । शब्द संग हंसा घर जाई ॥

निरञ्जन वचन

का ज्ञानी दहो अधिकारा । हमरी नहिं छूटे जम जारा ॥ पांच पचीस तीन गुण आही । यह ले सकल शरीर बनाई ॥ तामें पाप पुण्यका वासा । मन बैठे ले हमरी फांसा ॥

बोधसागर

( ९ )

जहां तहां सब जग भर्मावै । ज्ञान संच कछु रहन न पावै ॥ एक शब्दकी केतक आसा । हमरे हैं चौरासी फांसा ॥

ज्ञानी वचन

बोले ज्ञानी शब्द विचारी । छूटै चौरासी की धारी ॥ छूटै पांच पच्चीस गुन तीनों । ऐसो शब्द पुर्ष सुहि दीन्हो ॥

निरञ्जन वचन

हे ज्ञानी का करों बड़ाई । हमते नाह छूट जिव जाई ॥ इतने जुग भये का तुम देखा । ज्ञानी हंस न एकै पेखा ॥ का तुम करो का शब्द तुम्हारा । तीन लोक प्रलय तर डारा ॥ साधु सन्त हम देखी रीती । प्रलय परे सकल सब जीता ॥ कर्म रेख बाँधै सब साधा । सुरनरसुनि सकलो जग बांधा ॥

ज्ञानी वचन

ज्ञानी कहै काल अन्यायी । शब्द बिना तू खाय चबायी ॥ अब तुम कस खेहौ बटपारा । पुर्ष शब्द दीन्हौ टकसारा ॥ जनके जीवत लेउँ उबारा । कर्म रेख तोरो घर न्यारा ॥ पांच पच्चीस और गुन तीनों । इतने मोर हम लेउँ छीनो ॥ पांच जानेकी मेटी आसा । पुर्ष शब्द भाषौ विश्वासा ॥ शुभअरु अशुभ काकरे निबेरा । मेटी काल सकल उरझारा ॥

निरञ्जन वचन

तिगुन काल तब बोले बानी । उरझ जीव सकल जमखानी ॥ कै केसे तुम शब्द पसारो । कौनसी विधि तुम जीव उबारो ॥ ऐसे जीव सकल हैं करनी । कैसे पहुँचै पुर्षके सरनी ॥ जगमें जीव क्रोध विकरारा । कैसे पहुँचै पुर्षके द्वारा ॥ क्रोधी जीव प्रेत अभिमानी । धरी है जन्म नर्कको खानी ॥

( १० )

निरंजनबोध

लोभी होय सर्प विकारा । कैसे पावै मोक्ष को द्वारा ॥ लोभ जन्म सूकर अवतारा । कैसे पावै मोक्ष को द्वारा ॥ विषई विषै सब विषकी खानी । ए सब कहिये जम सहदानी ॥ ज्ञानी करै करहु वरियारा । हमते कीन सकल निर्वारा ॥ जोई ज्ञान होय हमारा । काम क्रोध तैं होय नियारा ॥ तृष्णा लोभहिं देय बहाई । विषै जन्म सब दूर पराई ॥ उनको ध्यान शब्द अधिकारी । काम क्रोध सब होय नियारी ॥ नाम ध्यान हंसा घर जाई । कहा दूत जस करो बड़ाई ॥ उनपै जम की परै न छाही । तासैं हंसा लोकहिं जाई ॥

निरंजन वचन

कहैं निरंजन सुन हो ज्ञानी । कथि हों ज्ञान तुम्हारी बानी ॥ जुगत महातम सबै बताऊँ । नाम तुम्हारे पन्थ चलाऊँ ॥ तुम तो एक पन्थ प्रकासा । हम दशपन्थ काल जुगफांसा ॥ जगके जीव सबै भर्माऊँ । ज्ञानवंत को कर्म हटाऊँ ॥ मार जीव को करे अहारा । काम क्रोध तैं होय नियारा ॥ करे कर्म विषै बस भाई । चर वर्ण ले एक मिलाई ॥ कुलको त्याग होय सों न्यारा । चार वर्णको एक विचारा ॥ ज्ञान हमारा रहै तन छाई । ते सब जीव काल ले खाई ॥ बेखबरन की करिहैं हांसी-ते जीवन पर हमारी फांसी ॥ फिर फिर आवै जमकी खानी । वे सब सरन हमारी ज्ञानी ॥ कैसे पहुँचै पुर्षके सरनी । ज्ञान संधि हमहू दे बरनी ॥

ज्ञानी वचन

कहे ज्ञानी सुन कैल विचारा । हंस हमार होय नहिं न्यारा ॥ निसवासर रहै लौ लीना । शब्द विचार होय नहिं भीना ॥ हंस हमार शब्द अधिका । पुर्ष प्रताप को करे सम्हारा ॥

बोधसागर

( ११ )

नाम जपै अरु सुर्त लगाई । मिले कर्म लागे नहिं घाई ॥ शब्द मान है शब्द सरूपा । निश्चै हंसा होय अनूपा ॥ उनको नाम भक्ति की आसा । ताते निरख चले विश्वासा ॥

निरञ्जन वचन

ज्ञानी मोर अपरबल ज्ञाना । वेद किताब भरम हम साना ॥ इनको माने सब संसारा । कलि मे गंगा मुक्ती द्वारा ॥ देहीं दान जो उतरे पारा । ऐसे सुमृत कहैं विचारा ॥ यहीं विधि जग जीव बुलाई । जग मरन सब बंध बँधाई ॥ सूतक पातक वेद विचारा । परछ वेदमे करहि सम्भारा ॥ एकादशी मुक्ति की भाई । जोग जग्य करवे अधिकाई ॥

ज्ञानी वचन

सुनहु काल ज्ञानका सन्धी । छोरों जीव सकलकी फंड़ी ॥ जब निज बीरा हंसा पावै । जोग बर्त तप सबै नसावै ॥ वेद किताबकी छोड़े आसा । हंसा करे शब्द विश्वासा ॥ ताके निकट काल नहिं आवे । निज बीरा जा सुर्त लगावे ॥ बीरा पाय भये वटपारा । शब्द सन्ध परखै बकसारा ॥ जोग बरत तपहुँ है छारा । अद्भुत नाम सदा रखवारा ॥ जेते हंस सरन हम आई । भक्ति करे तो मिटै धुआई ॥

निरञ्जन वचन

अब तुम ज्ञानी भली सुनाई । मेरो उरझौ सुरझौ नहिं जाई ॥ जो जीवनको भक्ति हटै हो । शब्द भेद तुम ताहि लखै हो ॥ पावै शब्द होय अभिमानी । कैसे लोकै जैहै सो प्रानी ॥ शब्द पाय नहिं करै विचारा । कैसे पहुँचै लोक तुम्हारा ॥ शब्द पाय कर कर्म जगावै । कैसे ज्ञाना निज घर पावै ॥ शब्द पाय कर चले न राहा । ज्ञानी कहाँ मुक्ति की थाहा ॥

( १२ )

निरञ्जनबोध

ज्ञानी वचन

तब ज्ञानी बोले सुख बानी । सुनिये काल निरञ्जन आनी ॥ हंसा भक्ति जो करे हमारो । राखों सदा शब्द निज धारो ॥ काम कोध अहङ्कार बिकारा । इनको तजे है हंस हमारा ॥ शब्द हमार छोड़ै फन्द । पहुँचे लोक मिटै जमदन्दा ॥ बीरा नाम पुर्ष को सारा । निर्मल हंस होय उजियारा ॥ आवागवन बहुरि नहिं होई । काल फांस तज न्यारा होई ॥ पहुँचे हंस पुर्ष दबारा । अरे काल तोको तज डारा ॥

निरञ्जन वचन

निरंजन बोले गर्भ सों भाई । मोर फंद टारे को जाई ॥ कर्म जंजीर बँधा संसारा । जो पुन हम जगजाल पसारा ॥ तीन लोग जो इन औतारा । आवागमनमें फिर फिर पारा ॥ उपजै विनसे रहै भुलाई । देव ऋषी सुनि सकल जो खाई ॥ सिद्ध साधु अरु बडे जो ज्ञानी । बांध बांध कर तोपि समानी ॥ कर्म रेख ते कोई न न्यारा । तीन देव सुर असुर पसारा ॥

ज्ञानी वचन

कहे ज्ञानी सुन काल लबारा । करिहों टूक जखीर तुम्हारा ॥ हंसन लेहों तुर्त उबारी । पुर्ष शब्द दीन्हों मोहे भारी ॥ ताहि डुकम सों मारों तोही । सब संसार तू खाया द्रोही ॥ खण्ड खण्ड कर तोरों बाना । मारों काल करो पिसमाना ॥ हंसन की मैं करों मुक्ताई । बहुरन जन्महि भौजल आई ॥ पुर्ष हंस नोतम है अंशा । ते जग प्रकट कहावै वंशा ॥ तिनके सरन हंस जो आई । कोट कर्म सब देयैं बहाई ॥ हंस संधि लखि होवैं न्यारा । चलतै पावे नहिं बटपारा ॥

बोधसागर

( १३ )

निरञ्जन वचन

मानों ज्ञानी वचन तुम्हारा । हंस ले जाव पुर्षे दर्बारा ॥ चौदह काल जगतमें म्हारे । घाट बाट बैठे रखवारे ॥ सुर नर सुनि आवैं वहि घाटा । दशहि और जो जोवे बाटा ॥ दुर्ग जगाती बड़ा सिरदारा । विना जगात कोइ उतरन पारा ॥ भोजन नदी घाट नहिं थाहू । उतरन काज कहै सब काहू ॥

ज्ञानी वचन

कहैं ज्ञानी सुन काल सुभाऊ । हमरे हंस की बात सुनाऊ ॥ बखतर ज्ञान शब्द हथियारा । मार दूत को चले अगारा ॥ कोट सिद्ध तेज है हंसा । जब परवाना आवैं बंसा ॥ बंस छाप जब पावहिं प्राणी । ताहि न रोके दुर्गा रानी ॥ कहा काल तुम करो विचारा । हंस हमार उतरि है पारा ॥ सार शब्द है हंस बहोरी । ता चढ़ि जायकाल मुखतोरी ॥ संधि न पावे ते बटपारा । हंसा पहुँचे लोक दुवारा ॥

निरंजन वचन

तुमको काल निरंजन राई । हे ज्ञानी का करो बड़ाई ॥ पांव पताल शीश अकाशा । सोरह योजन अग्निप्रकाशा ॥ गजें काल महा विकरारा । सत्रह लाख लो पांव पसारा ॥ लपके जीभ जिमि टूटे तारा । जस बिजली चमके अँधियारा ॥ सृद्ध बदाय दंत अति बाढ़ा । मध्य घेर ज्ञानी कह ठाढ़ा ॥ हमरे पौरुष हम बरियारा । तुम ज्ञानी का करो हमारा ॥

ज्ञानी वचन

ज्ञानी पुर्ष शब्द कियो जोरा । पकड़ सृद्ध दांत गहि मोरा ॥ मारेउ शब्द पांव कर पेली । तोर सृद्ध समुद्र गहि मेली ॥ पुर्षरूप तबही पुन धारा । जौन सरूप काल औतारा ॥

( १४ )

निरञ्जनबोध

निरञ्जन वचन

भया अधीन दोड़कर जोरी । तुम सतपुरुष सरन हम तोरी ॥ तुमसों बाल बुद्धि हम धारा । अब तुम करहु मोहि उद्धार ॥ बालक कोटि भांति गरियावत । मात पिता मन एक नहि आवत ॥ तुमहीं पुर्ष दीन मोहे राजू । औ पुनदीन्हसकलमोहिंसाजू ॥ तिहिं पर हमने गाउं बसावा । लीन्हे सुन्न ठिकान बनावा ॥ तहां हम साहब जाय रहाई । बिन आज्ञा कछु नाहिं कराई ॥ अबलग साहब मैं नहिं चीन्हा । सत्त पुर्ष तुम दर्शन दीन्हा ॥ दोड़कर जोरि चरणचितलावा । धन्य भाग हम दर्शन पावा ॥ अब मोहिं साहब भेद बताई । पाऊं चिह्न हंस पहुँचाई ॥

ज्ञानी वचन

सुन रे काल निरंजन राई । पुर्ष नाम है वीरा भाई ॥ जो हंसा चित भक्ति समोई । ताको खूट गहे मत कोई ॥

साखी

जो निज वीरा पाय है, आवै लोग हमार । ताको खूण्ट गहो मत, सुनो काल बटपार ॥

निरञ्जन वचन

चौपाई

सुनो गुसाईं विनती मोरी । वीरा पाय करै कछु औरी ॥ ज्ञान कथै अन्त चित वासा । आवागमनकी राखों आसा ॥

ज्ञानी वचन

सुनी निरंजन वचन हमारा । नहीं सत्त वह जीव तुम्हारा ॥

साखी

जा घरते जिव आइया, ताह सुध गई खोय । गोहराय कहों मैं जीवसों, जो शब्द पारखी होय ॥

बोधसागर

( १६ )

निरंजन वचन

चौपाई

कहै बाल तुम भली विचारी । संप देख हम कांथ उतारी ॥ उनके निकट दूत नहीं आई । साहब हंस देहों पहुँचाई ॥

साखी

साहिब सबको एक है, साहिबका कोइ एक ॥ लाखन मध्ये को गिने, कोटिन मध्ये देख ॥

ज्ञानी वचन साखी

जाहु काल घर आपने, शब्द कहौँ चितलाहु ॥ जो फिर सीस उठाय हो, बांध रसातल जाहु ॥

चौपाई

जो पुन गह्यो हंसकी बाँही । बांध रसातल पठाऊँ तोही ॥

निरंजन वचन

जब तुम रूप दिखावा मोहा । तब हम पुरुष चीन्हा तोही ॥ प्रथमै ज्ञानी हम नहीं जाना । बन्धु जानकान्हा अभिमाना ॥

ज्ञानी वचन

धर्मदास तब सों हम आये । गढ़ रैदास मो धारा पाये ॥ प्रथमहि सतयुग लागा भाई । नृप हरचन्द्र भये तहाँ राई ॥ तहाँ जाय शब्द गुहराई । जो चीन्हा सो लोक पठाई ॥ सतयुग सत्त नाम मोरो नाऊँ । देही धर हम मनुष्य कहाऊँ ॥

धर्मदाससों वचन

धर्मदास सुनि टेके पाई । तुव प्रनाप सकल सुधि आई ॥ काल चरित्र सकल हम जाना । पुर्ष लीला सबही पहुँचाना ॥ जब आपुन आये भौमाहीं । हंस काज जो भयो अब भाई ॥

इति श्री कबीर साहिब और निरंजनकी गोष्ठी समाप्त

ज्ञानबोध (त्रयोदश तरंग)

सत्यपुरुषाय नमः

अथ श्रीबोधसागरे

त्रयोदशस्तरंगः

ग्रन्थ ज्ञानबोध

कबीर वचन

साखी-सत गुरु जीव प्रबोधके, नाम लखावै सार । सार शब्द जो कोई गहे, सोई उतरि है पार ॥

चौपाई

भौसागर है अगम अपारा । तामें बूड गया संसारा ॥ पार लगन को सब कोइ धावे । बिना नाम कोइ पार न पावे ॥ यह जग जीव थाह नहिं पावे । बिना सतगुरु सब गोता खावे ॥ जग जीवों से कहो गुहराई । सतगुरु केवट पार लगाई ॥ यह जग बूड गयो मैझधारा । सतगुरु भक्त भये भवपारा ॥ सत्तनाम जो करे पुकारा । जब भव जल उतरेंगे पारा ॥ सत्तपुरुष है अगम अपारा । ताको सब मैं कहीं विचारा ॥ आदि अनाम ब्रह्म है न्यारा । निराधार मई कियो पसारा ॥ ताहि पुरुष सुमरो रे भाई । तन छोड़ जिवलोक सिधार्ह ॥ कहे कबीर नाम गह सोई । भरम छोड़ भव पारहिं होई ॥

साखी

आदिब्रह्म हिय परखिय, छोड़ो मरन अजान । कहे कबीर जग जीवसे, गहिले पद निरवान ॥

बोधसागर

( १७ )

सोरठा

भवसागरको पार, विना नाम उत्तरे नहीं । गहिलेव नाम अपार, कई कबीर सब जीवसे ॥

चौपाई

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । आदि नाम मैं कहों सब पासा ॥ यहि जगसे मैं कहा चिताई । अज्ञानी नहि माने भाई ॥ जौन जीव को ज्ञान न होई । कहे वचन माने नहि सोई ॥ और कहे जुलहा मति हीना । ब्रह्मा विष्णु शिवराम न चीन्हा ॥ ऐसे भक्त न देखे भाई । ब्रह्मा विष्णु शिवहिं विसराई ॥ जिन्दा हर का मरम न पाई । जुलहा भक्ति न जाने भाई ॥ ब्रह्मा विष्णु शिव जग उपजाई । इन तीनोंकी यह दुनियाई ॥ रावन छली रामकी नारी । रामचन्द्र कीन्हा रण भारी ॥ हर सीताको रावण लाये । राम लंकपति चिह्न मिटाये ॥ कहाँलों वरणों वार न पारा । तीन देवका सकल पसारा ॥

सार्वी-रामचन्द्र वर्णन कहूं, त्रयलोकी हैं नाथ ।

जग जिव कई समझायके, सुनिये जुलहा बात ॥

चौपाई

ऐसे सब जग कई गुहराई । धर्मदास मैं तुम्हें सुनाई ॥ आदि नाम मैं भाख सुनाई । यह जग जीव न चेता भाई ॥ आदि नाम सबको दरसाया । जग जीवों को ज्ञान सुनाया ॥ यह जुलहाको भेद न पाये । अज्ञानी क्यों रार मचाये ॥ आदि नामकी सुधि विसराये । मायामें सब जग लपटाये ॥ सच्चा साहिवको नहिं पाये । रामकृष्ण जग ध्यान लगाये ॥ ऐसे भूल गये संसारा । कैसे उत्तरे भव जल पारा ॥ कहे कबीर गहो निज नामा । जब पहुँचे अमरापुर गामा ॥

नं. ७ कबीरसागर - २

( १८ )

ज्ञानबोध

साहब पै जग धरे न ध्याना । तिहुँपुर काल ठगो हम जाना ॥ सब कोइ नाम गहो रे भाई । छोड़ो दुर्गति और चतुराई ॥ भरम जाल मनही ना लाओ । सत्तपुरुषमें ध्यान लगावो ॥ दुनियामें भरमो मति हीना । जम घरजायँगे नाम विहीना ॥ यही मता हम जगहि लखाये । धर्मदास विरले जिव पाये ॥

सारखी—कहैं कबीर जनगायके, सुनो जगत यह ज्ञान ॥

नीचे त्रयलोकी रहत, ऊपर सत्तगुरु नाम ॥

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । जग जीवोंकी कथा प्रकाशा ॥ आदि नाम हम भास्व सुनाया । मूरख जीव भरम नहि पाया ॥ राम वरन जग कीन्हहा भाई । तुम सुनियो मैं देखै बताई ॥ जगत कहै जुलहा अज्ञानी । हरिहरका कछु भेद न जानी ॥ नीच जात और भक्त कहाई । हरि के दरस कबहुँ ना पाई ॥ वेद पुराण गीता हम जाना । हमसे नाहक करे बखाना ॥ हमरो वेद कहे निज बाता । रामचंद्र समरथ है दाता ॥ चार वेद ब्रह्मने ठाना । जुलहा भूल गया अभिमाना ॥ ब्रह्म विष्णु शिवसे और न देवा । ऋषि मुनि करें सबै मिल सेवा ॥ ले अवतार जीव जग आये । शालग्राममें सुर्त लगाये ॥ ब्रह्म विष्णु शिवहि जग धाये । जुलहा उलटा ज्ञान चलाये ॥ वेद शास्त्र में हमने जाना । ब्रह्म विष्णु महेश्वर माना ॥ सार वेदमें देखा भाई । रजगुण तमगुण सत्तगुण साई ॥ गीता भागवत पुस्तक नाना । निशिदिन जाप करें भगवाना ॥ आदि भवानी तीनों देवा । इनकी सब मिल साथे सेवा ॥ ऐसा ज्ञान हमारा होई । जुलहा कहा न मानो कोई ॥

सारखी—तीन देव निजके गहे, राखे देवी आस । सोइ जीव सुख भोग हैं, हंसा करे विलास ॥

बोधसागर

( १९ )

चौपाई

ऐसे जग जिव ज्ञान चलाई । धर्मदास तोहि कथा सुनाई ॥ यही जगत की उलटी रीती । नाम न जाने कालसों प्रीती ॥ वेद रीति सुनियो धर्मदासा । मैं सब भाख कहों तुम पासा ॥ वेद पुरान में नामहि भाषा । वेद लिखा जानों तुम साखा ॥ छऊ शास्त्र मिलिझगराकीन्हा । ब्रह्मरूप काहू नहि चीन्हा ॥ चीन्हो है जो दूसर होई । भर्म विवाद करे सब कोई ॥ मूल नाम ना काहू पाये । साखा पत्र गह जग लपटाये ॥ डार पत्रको जो कोई धरही । निश्चय जाय नरकमें परही ॥ भूले लोग कहैं हम पावा । मूल वस्तु विन जन्म गमावा ॥ जीव अभागि मूल नहि जाने । डार पत्र में पुरुष बखाने ॥ पढ़े पुराण औ वेद बखाने । सत् पुरुष जगभेद न जाने ॥ वेद पढ़े औ भेद न जाने । नाहक यह जग झगड़ा ठाने ॥ वेद पुराण यह करे पुकारा । सबहीसे इक पुरुष नियारा ॥ ताहि न यह जग जाने भाई । तीन देवमें ध्यान लगाई ॥ तीन देव की करहीं भक्ती । जिनकी कभी न होवे सुक्ती ॥ तीन देवका अजब खयाला । देवी देव प्रपंची काला ॥ इनमें मत भटको अज्ञानी । काल झपट पकड़ेगा प्राणी ॥ तीन देव पुरुष गम्य ना पाई । जगके जीव सब फिरे भुलाई ॥ जो कोइ सत् पुरुष गये भाई । जा कहैं देख डरे जमराई ॥ ऐसा सबसे कहियो भाई । जग जीवोंका भरम नशाई ॥ साखी-रूप देख भरमो नहीं, कहैं कबीर विचार । अलख पुरुष हृदये लखे, सोइ उतारि है पार ॥ चौपाई-जो जो वस्तु दृष्टिमें आई । सोई सबहि काल धर खाई ॥ मूरति पूजै सुक्त न होई । नाहक जन्म अकारथ खोई ॥

( २० )

ज्ञानबोध

यह जग करै मूर्तिकी पूजा । करै गर्व हमसे नहिं दूजा ॥ पण्डित भक्त भये जग माहीं । पाथर पूजत जन्म गमाही ॥ ऐसे भक्त भये अधिकार्ई । पीतरकी निज मूर्ति बनाई ॥ इनसै भक्त और नहिं कोई । जिन अपनी दुरमति नहिं खोई ॥ आदि ब्रह्मको भेद न पाये । पद पद पंडित जग भरमाये ॥ अन्तकाल जम घेरे आई । तब विद्या कछुकाम न आई ॥ पाथर पूजें पढ़े पुराना । पद गुण अर्थ विवेकहि ज्ञाना ॥ ज्ञान कथे है वार न पारा । सतगुरु भक्त न जान लबारा ॥ ऐसा मत ब्राह्मणने धारा । जले जात हैं यमके द्वारा ॥ आदि नाम भूलो मत भाई । असुर अंश दुरमतहि लखाई ॥ धर्मदास देखो जग रीती । सांचा छोड़ झूठसों प्रीती ॥

साखी

सार शब्द ना जान है, कहैं कबीर बखान । यह जग भूले बावरे, गहे न सतगुर मान ॥ ब्राह्मण भूले बावरे, सरगुण मतके जोर । लख चौरासी भोगिहैं, पारब्रह्मके चोर ॥

सरगुण माहिं सार नहिं कोई । निरगुण नाम नियारा होई ॥ निर्गुणसे सरगुण है भाई । सरगुणमें यह जग लपटाई ॥ रजगुण सतगुणतमगुणकहिये । सब मिटजाय ज्ञान जोलहिये ॥ तीनों गुण से सरगुण होई । चौथा पद निरगुण है सोई ॥ निर्गुण नाथ निरंजन राई । निज उत्पत्ति बनाके खाई ॥ ताके परे इक नाम नियारा । सो साहब है मूल अपारा ॥

बोधसागर

( २१ )

उन्हें जगत नहीं जाने भाई । काल अंश राखे भगमाई ॥ ब्रह्मा विष्णु शिवहि जग झाँके । सत्य कबीर नाम रस छोँके ॥ नाम अमल रस चाखे कोई । ताको जरा मरन ना होई ॥ सतगुरु भक्ति करे जो कोई । जाति वर्ण डुरमति सब खोई ॥ आदि नामको नित गुणगावे । भवसागर में बहुरि न आवे ॥ आदि नामको गहे जो आसा । सतगुरु काटे काल कि फाँसा ॥ आदिनाम है गुप्त अमोला । धर्मदास मैं तुमसे खोला ॥ गुप्त मता पावे जो कोई । गेही तज बैगगी होई ॥ आदि नाम गुप्त संसारा । जो पावै जग से हो न्यारा ॥ धर्मदास यह जग बौराना । कोई न जाने पद निरवाना ॥ यहि कारन मैं कथा पसारा । जगसे कहियो नाम नियारा ॥ यही ज्ञान जग जीव सुनाओ । सब जीवोंका भरम नशाओ ॥ अब मैं तुमसे कहों चिताई । त्रयदेवनकी उतपत्ति भाई ॥ साहब कीन्ह इक अजबतमाशा । सो सब कहँ मैं तुम्हरे पास ॥ कछु संक्षेप कहों गुहराई । सब संशय तुम्हरे मिट जाई ॥ भरम गये जग वेद पुराना । आदि नामका भेद न जाना ॥ राम राम सब जगत बखाने । आदि नाम कोई बिरला जाने ॥ राजाराम सबको यह जग जाने । तुम से ताको भेद बखाने ॥ ज्ञानी सुन सो हिरदै लगाई । मूरख सुने सो गम्य न पाई ॥ मा अछंगी पिता निरंजन । वे जम दारुण वंशन अंजन ॥ पहिले कीन्ह निरंजन राई । पीछेसे माया उपजाई ॥ मायारूप देख अति शोभा । देव निरंजन तन मन लोभा ॥ कामदेव धर्मराय सताये । देवी को तुरतइ धर खाये ॥ पट से देवी करी पुकारी । साहब मोहे करो उबारी ॥ टेर सुनो सतगुरु तहँ आये । अछंगी को बंद छुड़ाये ॥

( २२ )

ज्ञानबोध

धर्मराय को हिकमत दीन्ह। नख रेखासे भगकर लीन्ह ॥ धर्मराय करें भोग विलासा । मायाको सु रही तब आसा ॥ धर्मराय अरु माया साजे । तीन लोक तासे उपराजे ॥ तीन पुत्र अष्टंगी जाये । ब्रह्मा विष्णु शिव नाम धराये ॥ तीन देव विस्तार चलाये । इनमें यह जग धोखा खाये ॥ पुरुष गम्य कैसे के पावै । काल निरंजन जग भरमावै ॥ तीन लोक अपने सुत दीन्ह। सुन्न निरंजन बासा लीन्ह ॥ अलख निरंजन सुन्न ठिकाना । ब्रह्मा विष्णु शिव भेद न जाना ॥ तीन दव सो उनको धावै । निरञ्जनको वे पार न पावै ॥ अलख निरञ्जन बड़ वटपारा । तीन लोक जिव कीन्ह अहारा ॥ ब्रह्मा विष्णु शिव नहीं बचाये । सकल खाय पुन धूर उड़ाये ॥ तिनके सुत है तीनै देवा । आंधर जीव करत है सेवा ॥ रामहिं रूप धरी है माया । जिन लंकाको राय सताया ॥ दश औतार माया ने धरिया । काल अपर्बल सबको छलिया ॥ काल पुरुष काहू नहिं चीन्हीं । काल पाय सबही गह लीन्हीं ॥ एसा राम सकल जग जाने । आदि ब्रह्मको ना पहिचाने ॥ तीनों देव असुर औतारा । ताको भजे सकल संसारा ॥ तीनों गुणका यह विस्तारा । धर्मदास मैं कहीं पुकारा ॥

सारखी

गुण तीनों की भक्ति में भूल परो संसार । कई कबीर निज नाम विन, कैसे उतरे पार ॥

सोरठा

जगजिव है अज्ञान, आदि नाम नहिं जानहीं । मायामें लपटान, जीव जमपुरी जावहीं ॥

बोधसागर

( २३ )

चौपाई

ऐसा राम कबीर न जाना । धर्मदास सुनियो दै काना ॥ सुत्र के परे पुरुष को धामा । तहैं साहब है आदि अनामा ॥ ताहि धाम सब जीवका दाता । मैं सबसों कहता निज बाता ॥ कहत अगोचर सब के पारा । आदि अनादि पुरुष है न्यारा ॥ आदि ब्रह्म इक पुरुष अकेला । ताके संग नहीं कोइ चेला ॥ ताहि न जाने यह संसारा । बिना नाम है जमके चारा ॥ नाम बिना यह जग अरुझाना । नाम गहे सौ संतसुजाना ॥ सच्चा साहब भजु रे भाई । यहि जगसे तुम कहो चित्ताई ॥ धोखा में जिव जन्म गँवाई । झूठी लगन लगाये भाई ॥ ऐसा जग से कहु समझाई । धमदाम जिव बोधो जाई ॥ सज्जन जिव आवै तुम पासा । जिन्हें देव सतलोकहि बासा ॥ ज्ञानहीनके सुन षट करमा । धर्मदास उनके ये धरमा ॥ भरग गये वे भव जलमाहीं । आदि नाम को जानत नाही ॥ पीतर पाथर पूजन लागे । आदि नाम घटही से त्यागे ॥ तीरथ बर्त करे संसारे । नेम धरम असनान सकारे ॥ भेष वनाय विभूति रमाये । घर घर भिक्षा माँगन आये ॥ जग जीवनको दीक्षा देहीं । सत्तनाम विन पुरषहि द्रोही ॥ ज्ञान हीन जो गुरु कहावै । आपन भूला जगत भुलावै ॥ काम कोध मद लोभ विक्राग । इन्हें न त्यागे साध बिचारा ॥ ऐसा ज्ञान चलाया भाई । सत साहबकी सुध बिसराई ॥ यह दुनियां दो रंगी भाई । जिव गह शरण असुरकी जाई ॥ तीरथ व्रत तप पुन्य कमाई । यह जम जाल तहाँ ठहराई ॥ यहै जगत ऐसा अरुझाई । नाम बिना बूढ़ी दुनियाई ॥ जो कोइ भक्त हमारा होई । जात वरण को त्यागे सोई ॥

( २४ )

ज्ञानबोध

तीरथ व्रत सब देय बहाई । सतगुरु चरणसे ध्यान लगाई ॥ काम क्रोध मद लोभ न तेही । सोई पावै परम सनेही ॥ मनहीं बांध स्थिर जो करही । सो हंसा भवसागर तरही ॥ भक्त होय सतगुरुका पूरा । रहै पुरुष के नित्त हजुरा ॥ यही जो रीति साधकी भाई । सार युक्ति में कह गुहराई ॥ साखी-सत्तनाम निज मूल है, यह कबीर समझाय ॥ दोई दीन खोजत फिरें, परम पुरुष नहीं पाय ॥

सोरठा

सत्तनाम गुण गाव, गहै नाम सेवा करै । सहज परम पद पाव, सतगुरु पद विश्वास दृढ ॥

चौपाई

पाथर पूज हिंदु भुलाना । सुरदा पूज भूले तुरकाना ॥ कहैं कबीर ये दोह भुलाना । आदि पुरुष कोई नहीं जाना ॥ हिन्दू तुर्क दोई उपदेशा । नाम गहै मिटि काल कलेशा ॥ भवसागर कोइ पार न पावे । या जग में सब गोता खावे ॥ भव दरयाव है अगम अपारा । पुरुष भक्त उतरेंगे पारा ॥ धर्मदास जग कहो समझाई । आदि नाम बिन सुक्ति न पाई ॥ जो जन भजि हैं निर्भयनामा । सो हंसा पहुँचै निज धामा ॥ अजर नाम लै लोकहि जाई । दुष्ट काल तब रहे सुरझाई ॥ कर्मत्याग सब भजो यकनामा । कभी न हो भवसागर धामा ॥ ब्रह्मने जो राह चलाई । सो सब कहों मैं तुमसे गार्ई ॥ चार वरण अरु वेद बखाना । जगके जीव सबही उरझाना ॥ जात पांत ब्रह्म कर दीन्हा । सबमें ऊँच ब्राह्मणको दीन्हा ॥ ब्रह्म अपने मते चलाये । तीनों गुण जग नाम लखाये ॥ आदि नामकी सुध नहीं पाये । चारों जुग धोखाहि गुमाये ॥