कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १२ )
निरञ्जनबोध
ज्ञानी वचन
तब ज्ञानी बोले सुख बानी । सुनिये काल निरञ्जन आनी ॥ हंसा भक्ति जो करे हमारो । राखों सदा शब्द निज धारो ॥ काम कोध अहङ्कार बिकारा । इनको तजे है हंस हमारा ॥ शब्द हमार छोड़ै फन्द । पहुँचे लोक मिटै जमदन्दा ॥ बीरा नाम पुर्ष को सारा । निर्मल हंस होय उजियारा ॥ आवागवन बहुरि नहिं होई । काल फांस तज न्यारा होई ॥ पहुँचे हंस पुर्ष दबारा । अरे काल तोको तज डारा ॥
निरञ्जन वचन
निरंजन बोले गर्भ सों भाई । मोर फंद टारे को जाई ॥ कर्म जंजीर बँधा संसारा । जो पुन हम जगजाल पसारा ॥ तीन लोग जो इन औतारा । आवागमनमें फिर फिर पारा ॥ उपजै विनसे रहै भुलाई । देव ऋषी सुनि सकल जो खाई ॥ सिद्ध साधु अरु बडे जो ज्ञानी । बांध बांध कर तोपि समानी ॥ कर्म रेख ते कोई न न्यारा । तीन देव सुर असुर पसारा ॥
ज्ञानी वचन
कहे ज्ञानी सुन काल लबारा । करिहों टूक जखीर तुम्हारा ॥ हंसन लेहों तुर्त उबारी । पुर्ष शब्द दीन्हों मोहे भारी ॥ ताहि डुकम सों मारों तोही । सब संसार तू खाया द्रोही ॥ खण्ड खण्ड कर तोरों बाना । मारों काल करो पिसमाना ॥ हंसन की मैं करों मुक्ताई । बहुरन जन्महि भौजल आई ॥ पुर्ष हंस नोतम है अंशा । ते जग प्रकट कहावै वंशा ॥ तिनके सरन हंस जो आई । कोट कर्म सब देयैं बहाई ॥ हंस संधि लखि होवैं न्यारा । चलतै पावे नहिं बटपारा ॥