कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १२ )
निरञ्जनबोध
ज्ञानी वचन
तब ज्ञानी बोले सुख बानी । सुनिये काल निरञ्जन आनी ॥ हंसा भक्ति जो करे हमारो । राखों सदा शब्द निज धारो ॥ काम कोध अहङ्कार बिकारा । इनको तजे है हंस हमारा ॥ शब्द हमार छोड़ै फन्द । पहुँचे लोक मिटै जमदन्दा ॥ बीरा नाम पुर्ष को सारा । निर्मल हंस होय उजियारा ॥ आवागवन बहुरि नहिं होई । काल फांस तज न्यारा होई ॥ पहुँचे हंस पुर्ष दबारा । अरे काल तोको तज डारा ॥
निरञ्जन वचन
निरंजन बोले गर्भ सों भाई । मोर फंद टारे को जाई ॥ कर्म जंजीर बँधा संसारा । जो पुन हम जगजाल पसारा ॥ तीन लोग जो इन औतारा । आवागमनमें फिर फिर पारा ॥ उपजै विनसे रहै भुलाई । देव ऋषी सुनि सकल जो खाई ॥ सिद्ध साधु अरु बडे जो ज्ञानी । बांध बांध कर तोपि समानी ॥ कर्म रेख ते कोई न न्यारा । तीन देव सुर असुर पसारा ॥
ज्ञानी वचन
कहे ज्ञानी सुन काल लबारा । करिहों टूक जखीर तुम्हारा ॥ हंसन लेहों तुर्त उबारी । पुर्ष शब्द दीन्हों मोहे भारी ॥ ताहि डुकम सों मारों तोही । सब संसार तू खाया द्रोही ॥ खण्ड खण्ड कर तोरों बाना । मारों काल करो पिसमाना ॥ हंसन की मैं करों मुक्ताई । बहुरन जन्महि भौजल आई ॥ पुर्ष हंस नोतम है अंशा । ते जग प्रकट कहावै वंशा ॥ तिनके सरन हंस जो आई । कोट कर्म सब देयैं बहाई ॥ हंस संधि लखि होवैं न्यारा । चलतै पावे नहिं बटपारा ॥
बोधसागर
( १३ )
निरञ्जन वचन
मानों ज्ञानी वचन तुम्हारा । हंस ले जाव पुर्षे दर्बारा ॥ चौदह काल जगतमें म्हारे । घाट बाट बैठे रखवारे ॥ सुर नर सुनि आवैं वहि घाटा । दशहि और जो जोवे बाटा ॥ दुर्ग जगाती बड़ा सिरदारा । विना जगात कोइ उतरन पारा ॥ भोजन नदी घाट नहिं थाहू । उतरन काज कहै सब काहू ॥
ज्ञानी वचन
कहैं ज्ञानी सुन काल सुभाऊ । हमरे हंस की बात सुनाऊ ॥ बखतर ज्ञान शब्द हथियारा । मार दूत को चले अगारा ॥ कोट सिद्ध तेज है हंसा । जब परवाना आवैं बंसा ॥ बंस छाप जब पावहिं प्राणी । ताहि न रोके दुर्गा रानी ॥ कहा काल तुम करो विचारा । हंस हमार उतरि है पारा ॥ सार शब्द है हंस बहोरी । ता चढ़ि जायकाल मुखतोरी ॥ संधि न पावे ते बटपारा । हंसा पहुँचे लोक दुवारा ॥
निरंजन वचन
तुमको काल निरंजन राई । हे ज्ञानी का करो बड़ाई ॥ पांव पताल शीश अकाशा । सोरह योजन अग्निप्रकाशा ॥ गजें काल महा विकरारा । सत्रह लाख लो पांव पसारा ॥ लपके जीभ जिमि टूटे तारा । जस बिजली चमके अँधियारा ॥ सृद्ध बदाय दंत अति बाढ़ा । मध्य घेर ज्ञानी कह ठाढ़ा ॥ हमरे पौरुष हम बरियारा । तुम ज्ञानी का करो हमारा ॥
ज्ञानी वचन
ज्ञानी पुर्ष शब्द कियो जोरा । पकड़ सृद्ध दांत गहि मोरा ॥ मारेउ शब्द पांव कर पेली । तोर सृद्ध समुद्र गहि मेली ॥ पुर्षरूप तबही पुन धारा । जौन सरूप काल औतारा ॥
( १४ )
निरञ्जनबोध
निरञ्जन वचन
भया अधीन दोड़कर जोरी । तुम सतपुरुष सरन हम तोरी ॥ तुमसों बाल बुद्धि हम धारा । अब तुम करहु मोहि उद्धार ॥ बालक कोटि भांति गरियावत । मात पिता मन एक नहि आवत ॥ तुमहीं पुर्ष दीन मोहे राजू । औ पुनदीन्हसकलमोहिंसाजू ॥ तिहिं पर हमने गाउं बसावा । लीन्हे सुन्न ठिकान बनावा ॥ तहां हम साहब जाय रहाई । बिन आज्ञा कछु नाहिं कराई ॥ अबलग साहब मैं नहिं चीन्हा । सत्त पुर्ष तुम दर्शन दीन्हा ॥ दोड़कर जोरि चरणचितलावा । धन्य भाग हम दर्शन पावा ॥ अब मोहिं साहब भेद बताई । पाऊं चिह्न हंस पहुँचाई ॥
ज्ञानी वचन
सुन रे काल निरंजन राई । पुर्ष नाम है वीरा भाई ॥ जो हंसा चित भक्ति समोई । ताको खूट गहे मत कोई ॥
साखी
जो निज वीरा पाय है, आवै लोग हमार । ताको खूण्ट गहो मत, सुनो काल बटपार ॥
निरञ्जन वचन
चौपाई
सुनो गुसाईं विनती मोरी । वीरा पाय करै कछु औरी ॥ ज्ञान कथै अन्त चित वासा । आवागमनकी राखों आसा ॥
ज्ञानी वचन
सुनी निरंजन वचन हमारा । नहीं सत्त वह जीव तुम्हारा ॥
साखी
जा घरते जिव आइया, ताह सुध गई खोय । गोहराय कहों मैं जीवसों, जो शब्द पारखी होय ॥
बोधसागर
( १६ )
निरंजन वचन
चौपाई
कहै बाल तुम भली विचारी । संप देख हम कांथ उतारी ॥ उनके निकट दूत नहीं आई । साहब हंस देहों पहुँचाई ॥
साखी
साहिब सबको एक है, साहिबका कोइ एक ॥ लाखन मध्ये को गिने, कोटिन मध्ये देख ॥
ज्ञानी वचन साखी
जाहु काल घर आपने, शब्द कहौँ चितलाहु ॥ जो फिर सीस उठाय हो, बांध रसातल जाहु ॥
चौपाई
जो पुन गह्यो हंसकी बाँही । बांध रसातल पठाऊँ तोही ॥
निरंजन वचन
जब तुम रूप दिखावा मोहा । तब हम पुरुष चीन्हा तोही ॥ प्रथमै ज्ञानी हम नहीं जाना । बन्धु जानकान्हा अभिमाना ॥
ज्ञानी वचन
धर्मदास तब सों हम आये । गढ़ रैदास मो धारा पाये ॥ प्रथमहि सतयुग लागा भाई । नृप हरचन्द्र भये तहाँ राई ॥ तहाँ जाय शब्द गुहराई । जो चीन्हा सो लोक पठाई ॥ सतयुग सत्त नाम मोरो नाऊँ । देही धर हम मनुष्य कहाऊँ ॥
धर्मदाससों वचन
धर्मदास सुनि टेके पाई । तुव प्रनाप सकल सुधि आई ॥ काल चरित्र सकल हम जाना । पुर्ष लीला सबही पहुँचाना ॥ जब आपुन आये भौमाहीं । हंस काज जो भयो अब भाई ॥
इति श्री कबीर साहिब और निरंजनकी गोष्ठी समाप्त
ज्ञानबोध (त्रयोदश तरंग)
सत्यपुरुषाय नमः
अथ श्रीबोधसागरे
त्रयोदशस्तरंगः
ग्रन्थ ज्ञानबोध
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कबीर वचन
साखी-सत गुरु जीव प्रबोधके, नाम लखावै सार । सार शब्द जो कोई गहे, सोई उतरि है पार ॥
चौपाई
भौसागर है अगम अपारा । तामें बूड गया संसारा ॥ पार लगन को सब कोइ धावे । बिना नाम कोइ पार न पावे ॥ यह जग जीव थाह नहिं पावे । बिना सतगुरु सब गोता खावे ॥ जग जीवों से कहो गुहराई । सतगुरु केवट पार लगाई ॥ यह जग बूड गयो मैझधारा । सतगुरु भक्त भये भवपारा ॥ सत्तनाम जो करे पुकारा । जब भव जल उतरेंगे पारा ॥ सत्तपुरुष है अगम अपारा । ताको सब मैं कहीं विचारा ॥ आदि अनाम ब्रह्म है न्यारा । निराधार मई कियो पसारा ॥ ताहि पुरुष सुमरो रे भाई । तन छोड़ जिवलोक सिधार्ह ॥ कहे कबीर नाम गह सोई । भरम छोड़ भव पारहिं होई ॥
साखी
आदिब्रह्म हिय परखिय, छोड़ो मरन अजान । कहे कबीर जग जीवसे, गहिले पद निरवान ॥
बोधसागर
( १७ )
सोरठा
भवसागरको पार, विना नाम उत्तरे नहीं । गहिलेव नाम अपार, कई कबीर सब जीवसे ॥
चौपाई
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । आदि नाम मैं कहों सब पासा ॥ यहि जगसे मैं कहा चिताई । अज्ञानी नहि माने भाई ॥ जौन जीव को ज्ञान न होई । कहे वचन माने नहि सोई ॥ और कहे जुलहा मति हीना । ब्रह्मा विष्णु शिवराम न चीन्हा ॥ ऐसे भक्त न देखे भाई । ब्रह्मा विष्णु शिवहिं विसराई ॥ जिन्दा हर का मरम न पाई । जुलहा भक्ति न जाने भाई ॥ ब्रह्मा विष्णु शिव जग उपजाई । इन तीनोंकी यह दुनियाई ॥ रावन छली रामकी नारी । रामचन्द्र कीन्हा रण भारी ॥ हर सीताको रावण लाये । राम लंकपति चिह्न मिटाये ॥ कहाँलों वरणों वार न पारा । तीन देवका सकल पसारा ॥
सार्वी-रामचन्द्र वर्णन कहूं, त्रयलोकी हैं नाथ ।
जग जिव कई समझायके, सुनिये जुलहा बात ॥
चौपाई
ऐसे सब जग कई गुहराई । धर्मदास मैं तुम्हें सुनाई ॥ आदि नाम मैं भाख सुनाई । यह जग जीव न चेता भाई ॥ आदि नाम सबको दरसाया । जग जीवों को ज्ञान सुनाया ॥ यह जुलहाको भेद न पाये । अज्ञानी क्यों रार मचाये ॥ आदि नामकी सुधि विसराये । मायामें सब जग लपटाये ॥ सच्चा साहिवको नहिं पाये । रामकृष्ण जग ध्यान लगाये ॥ ऐसे भूल गये संसारा । कैसे उत्तरे भव जल पारा ॥ कहे कबीर गहो निज नामा । जब पहुँचे अमरापुर गामा ॥
नं. ७ कबीरसागर - २
( १८ )
ज्ञानबोध
साहब पै जग धरे न ध्याना । तिहुँपुर काल ठगो हम जाना ॥ सब कोइ नाम गहो रे भाई । छोड़ो दुर्गति और चतुराई ॥ भरम जाल मनही ना लाओ । सत्तपुरुषमें ध्यान लगावो ॥ दुनियामें भरमो मति हीना । जम घरजायँगे नाम विहीना ॥ यही मता हम जगहि लखाये । धर्मदास विरले जिव पाये ॥
सारखी—कहैं कबीर जनगायके, सुनो जगत यह ज्ञान ॥
नीचे त्रयलोकी रहत, ऊपर सत्तगुरु नाम ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । जग जीवोंकी कथा प्रकाशा ॥ आदि नाम हम भास्व सुनाया । मूरख जीव भरम नहि पाया ॥ राम वरन जग कीन्हहा भाई । तुम सुनियो मैं देखै बताई ॥ जगत कहै जुलहा अज्ञानी । हरिहरका कछु भेद न जानी ॥ नीच जात और भक्त कहाई । हरि के दरस कबहुँ ना पाई ॥ वेद पुराण गीता हम जाना । हमसे नाहक करे बखाना ॥ हमरो वेद कहे निज बाता । रामचंद्र समरथ है दाता ॥ चार वेद ब्रह्मने ठाना । जुलहा भूल गया अभिमाना ॥ ब्रह्म विष्णु शिवसे और न देवा । ऋषि मुनि करें सबै मिल सेवा ॥ ले अवतार जीव जग आये । शालग्राममें सुर्त लगाये ॥ ब्रह्म विष्णु शिवहि जग धाये । जुलहा उलटा ज्ञान चलाये ॥ वेद शास्त्र में हमने जाना । ब्रह्म विष्णु महेश्वर माना ॥ सार वेदमें देखा भाई । रजगुण तमगुण सत्तगुण साई ॥ गीता भागवत पुस्तक नाना । निशिदिन जाप करें भगवाना ॥ आदि भवानी तीनों देवा । इनकी सब मिल साथे सेवा ॥ ऐसा ज्ञान हमारा होई । जुलहा कहा न मानो कोई ॥
सारखी—तीन देव निजके गहे, राखे देवी आस । सोइ जीव सुख भोग हैं, हंसा करे विलास ॥
बोधसागर
( १९ )
चौपाई
ऐसे जग जिव ज्ञान चलाई । धर्मदास तोहि कथा सुनाई ॥ यही जगत की उलटी रीती । नाम न जाने कालसों प्रीती ॥ वेद रीति सुनियो धर्मदासा । मैं सब भाख कहों तुम पासा ॥ वेद पुरान में नामहि भाषा । वेद लिखा जानों तुम साखा ॥ छऊ शास्त्र मिलिझगराकीन्हा । ब्रह्मरूप काहू नहि चीन्हा ॥ चीन्हो है जो दूसर होई । भर्म विवाद करे सब कोई ॥ मूल नाम ना काहू पाये । साखा पत्र गह जग लपटाये ॥ डार पत्रको जो कोई धरही । निश्चय जाय नरकमें परही ॥ भूले लोग कहैं हम पावा । मूल वस्तु विन जन्म गमावा ॥ जीव अभागि मूल नहि जाने । डार पत्र में पुरुष बखाने ॥ पढ़े पुराण औ वेद बखाने । सत् पुरुष जगभेद न जाने ॥ वेद पढ़े औ भेद न जाने । नाहक यह जग झगड़ा ठाने ॥ वेद पुराण यह करे पुकारा । सबहीसे इक पुरुष नियारा ॥ ताहि न यह जग जाने भाई । तीन देवमें ध्यान लगाई ॥ तीन देव की करहीं भक्ती । जिनकी कभी न होवे सुक्ती ॥ तीन देवका अजब खयाला । देवी देव प्रपंची काला ॥ इनमें मत भटको अज्ञानी । काल झपट पकड़ेगा प्राणी ॥ तीन देव पुरुष गम्य ना पाई । जगके जीव सब फिरे भुलाई ॥ जो कोइ सत् पुरुष गये भाई । जा कहैं देख डरे जमराई ॥ ऐसा सबसे कहियो भाई । जग जीवोंका भरम नशाई ॥ साखी-रूप देख भरमो नहीं, कहैं कबीर विचार । अलख पुरुष हृदये लखे, सोइ उतारि है पार ॥ चौपाई-जो जो वस्तु दृष्टिमें आई । सोई सबहि काल धर खाई ॥ मूरति पूजै सुक्त न होई । नाहक जन्म अकारथ खोई ॥
( २० )
ज्ञानबोध
यह जग करै मूर्तिकी पूजा । करै गर्व हमसे नहिं दूजा ॥ पण्डित भक्त भये जग माहीं । पाथर पूजत जन्म गमाही ॥ ऐसे भक्त भये अधिकार्ई । पीतरकी निज मूर्ति बनाई ॥ इनसै भक्त और नहिं कोई । जिन अपनी दुरमति नहिं खोई ॥ आदि ब्रह्मको भेद न पाये । पद पद पंडित जग भरमाये ॥ अन्तकाल जम घेरे आई । तब विद्या कछुकाम न आई ॥ पाथर पूजें पढ़े पुराना । पद गुण अर्थ विवेकहि ज्ञाना ॥ ज्ञान कथे है वार न पारा । सतगुरु भक्त न जान लबारा ॥ ऐसा मत ब्राह्मणने धारा । जले जात हैं यमके द्वारा ॥ आदि नाम भूलो मत भाई । असुर अंश दुरमतहि लखाई ॥ धर्मदास देखो जग रीती । सांचा छोड़ झूठसों प्रीती ॥
साखी
सार शब्द ना जान है, कहैं कबीर बखान । यह जग भूले बावरे, गहे न सतगुर मान ॥ ब्राह्मण भूले बावरे, सरगुण मतके जोर । लख चौरासी भोगिहैं, पारब्रह्मके चोर ॥
सरगुण माहिं सार नहिं कोई । निरगुण नाम नियारा होई ॥ निर्गुणसे सरगुण है भाई । सरगुणमें यह जग लपटाई ॥ रजगुण सतगुणतमगुणकहिये । सब मिटजाय ज्ञान जोलहिये ॥ तीनों गुण से सरगुण होई । चौथा पद निरगुण है सोई ॥ निर्गुण नाथ निरंजन राई । निज उत्पत्ति बनाके खाई ॥ ताके परे इक नाम नियारा । सो साहब है मूल अपारा ॥
बोधसागर
( २१ )
उन्हें जगत नहीं जाने भाई । काल अंश राखे भगमाई ॥ ब्रह्मा विष्णु शिवहि जग झाँके । सत्य कबीर नाम रस छोँके ॥ नाम अमल रस चाखे कोई । ताको जरा मरन ना होई ॥ सतगुरु भक्ति करे जो कोई । जाति वर्ण डुरमति सब खोई ॥ आदि नामको नित गुणगावे । भवसागर में बहुरि न आवे ॥ आदि नामको गहे जो आसा । सतगुरु काटे काल कि फाँसा ॥ आदिनाम है गुप्त अमोला । धर्मदास मैं तुमसे खोला ॥ गुप्त मता पावे जो कोई । गेही तज बैगगी होई ॥ आदि नाम गुप्त संसारा । जो पावै जग से हो न्यारा ॥ धर्मदास यह जग बौराना । कोई न जाने पद निरवाना ॥ यहि कारन मैं कथा पसारा । जगसे कहियो नाम नियारा ॥ यही ज्ञान जग जीव सुनाओ । सब जीवोंका भरम नशाओ ॥ अब मैं तुमसे कहों चिताई । त्रयदेवनकी उतपत्ति भाई ॥ साहब कीन्ह इक अजबतमाशा । सो सब कहँ मैं तुम्हरे पास ॥ कछु संक्षेप कहों गुहराई । सब संशय तुम्हरे मिट जाई ॥ भरम गये जग वेद पुराना । आदि नामका भेद न जाना ॥ राम राम सब जगत बखाने । आदि नाम कोई बिरला जाने ॥ राजाराम सबको यह जग जाने । तुम से ताको भेद बखाने ॥ ज्ञानी सुन सो हिरदै लगाई । मूरख सुने सो गम्य न पाई ॥ मा अछंगी पिता निरंजन । वे जम दारुण वंशन अंजन ॥ पहिले कीन्ह निरंजन राई । पीछेसे माया उपजाई ॥ मायारूप देख अति शोभा । देव निरंजन तन मन लोभा ॥ कामदेव धर्मराय सताये । देवी को तुरतइ धर खाये ॥ पट से देवी करी पुकारी । साहब मोहे करो उबारी ॥ टेर सुनो सतगुरु तहँ आये । अछंगी को बंद छुड़ाये ॥
( २२ )
ज्ञानबोध
धर्मराय को हिकमत दीन्ह। नख रेखासे भगकर लीन्ह ॥ धर्मराय करें भोग विलासा । मायाको सु रही तब आसा ॥ धर्मराय अरु माया साजे । तीन लोक तासे उपराजे ॥ तीन पुत्र अष्टंगी जाये । ब्रह्मा विष्णु शिव नाम धराये ॥ तीन देव विस्तार चलाये । इनमें यह जग धोखा खाये ॥ पुरुष गम्य कैसे के पावै । काल निरंजन जग भरमावै ॥ तीन लोक अपने सुत दीन्ह। सुन्न निरंजन बासा लीन्ह ॥ अलख निरंजन सुन्न ठिकाना । ब्रह्मा विष्णु शिव भेद न जाना ॥ तीन दव सो उनको धावै । निरञ्जनको वे पार न पावै ॥ अलख निरञ्जन बड़ वटपारा । तीन लोक जिव कीन्ह अहारा ॥ ब्रह्मा विष्णु शिव नहीं बचाये । सकल खाय पुन धूर उड़ाये ॥ तिनके सुत है तीनै देवा । आंधर जीव करत है सेवा ॥ रामहिं रूप धरी है माया । जिन लंकाको राय सताया ॥ दश औतार माया ने धरिया । काल अपर्बल सबको छलिया ॥ काल पुरुष काहू नहिं चीन्हीं । काल पाय सबही गह लीन्हीं ॥ एसा राम सकल जग जाने । आदि ब्रह्मको ना पहिचाने ॥ तीनों देव असुर औतारा । ताको भजे सकल संसारा ॥ तीनों गुणका यह विस्तारा । धर्मदास मैं कहीं पुकारा ॥
सारखी
गुण तीनों की भक्ति में भूल परो संसार । कई कबीर निज नाम विन, कैसे उतरे पार ॥
सोरठा
जगजिव है अज्ञान, आदि नाम नहिं जानहीं । मायामें लपटान, जीव जमपुरी जावहीं ॥
बोधसागर
( २३ )
चौपाई
ऐसा राम कबीर न जाना । धर्मदास सुनियो दै काना ॥ सुत्र के परे पुरुष को धामा । तहैं साहब है आदि अनामा ॥ ताहि धाम सब जीवका दाता । मैं सबसों कहता निज बाता ॥ कहत अगोचर सब के पारा । आदि अनादि पुरुष है न्यारा ॥ आदि ब्रह्म इक पुरुष अकेला । ताके संग नहीं कोइ चेला ॥ ताहि न जाने यह संसारा । बिना नाम है जमके चारा ॥ नाम बिना यह जग अरुझाना । नाम गहे सौ संतसुजाना ॥ सच्चा साहब भजु रे भाई । यहि जगसे तुम कहो चित्ताई ॥ धोखा में जिव जन्म गँवाई । झूठी लगन लगाये भाई ॥ ऐसा जग से कहु समझाई । धमदाम जिव बोधो जाई ॥ सज्जन जिव आवै तुम पासा । जिन्हें देव सतलोकहि बासा ॥ ज्ञानहीनके सुन षट करमा । धर्मदास उनके ये धरमा ॥ भरग गये वे भव जलमाहीं । आदि नाम को जानत नाही ॥ पीतर पाथर पूजन लागे । आदि नाम घटही से त्यागे ॥ तीरथ बर्त करे संसारे । नेम धरम असनान सकारे ॥ भेष वनाय विभूति रमाये । घर घर भिक्षा माँगन आये ॥ जग जीवनको दीक्षा देहीं । सत्तनाम विन पुरषहि द्रोही ॥ ज्ञान हीन जो गुरु कहावै । आपन भूला जगत भुलावै ॥ काम कोध मद लोभ विक्राग । इन्हें न त्यागे साध बिचारा ॥ ऐसा ज्ञान चलाया भाई । सत साहबकी सुध बिसराई ॥ यह दुनियां दो रंगी भाई । जिव गह शरण असुरकी जाई ॥ तीरथ व्रत तप पुन्य कमाई । यह जम जाल तहाँ ठहराई ॥ यहै जगत ऐसा अरुझाई । नाम बिना बूढ़ी दुनियाई ॥ जो कोइ भक्त हमारा होई । जात वरण को त्यागे सोई ॥
( २४ )
ज्ञानबोध
तीरथ व्रत सब देय बहाई । सतगुरु चरणसे ध्यान लगाई ॥ काम क्रोध मद लोभ न तेही । सोई पावै परम सनेही ॥ मनहीं बांध स्थिर जो करही । सो हंसा भवसागर तरही ॥ भक्त होय सतगुरुका पूरा । रहै पुरुष के नित्त हजुरा ॥ यही जो रीति साधकी भाई । सार युक्ति में कह गुहराई ॥ साखी-सत्तनाम निज मूल है, यह कबीर समझाय ॥ दोई दीन खोजत फिरें, परम पुरुष नहीं पाय ॥
सोरठा
सत्तनाम गुण गाव, गहै नाम सेवा करै । सहज परम पद पाव, सतगुरु पद विश्वास दृढ ॥
चौपाई
पाथर पूज हिंदु भुलाना । सुरदा पूज भूले तुरकाना ॥ कहैं कबीर ये दोह भुलाना । आदि पुरुष कोई नहीं जाना ॥ हिन्दू तुर्क दोई उपदेशा । नाम गहै मिटि काल कलेशा ॥ भवसागर कोइ पार न पावे । या जग में सब गोता खावे ॥ भव दरयाव है अगम अपारा । पुरुष भक्त उतरेंगे पारा ॥ धर्मदास जग कहो समझाई । आदि नाम बिन सुक्ति न पाई ॥ जो जन भजि हैं निर्भयनामा । सो हंसा पहुँचै निज धामा ॥ अजर नाम लै लोकहि जाई । दुष्ट काल तब रहे सुरझाई ॥ कर्मत्याग सब भजो यकनामा । कभी न हो भवसागर धामा ॥ ब्रह्मने जो राह चलाई । सो सब कहों मैं तुमसे गार्ई ॥ चार वरण अरु वेद बखाना । जगके जीव सबही उरझाना ॥ जात पांत ब्रह्म कर दीन्हा । सबमें ऊँच ब्राह्मणको दीन्हा ॥ ब्रह्म अपने मते चलाये । तीनों गुण जग नाम लखाये ॥ आदि नामकी सुध नहीं पाये । चारों जुग धोखाहि गुमाये ॥
बोधसागर
( २५ )
यह ब्रह्मा की है कगवृत्ती । जगहि लखाये झूठी रीती ॥ ब्रह्माने यह जग भरमाया । पत्त पुरुषका भेद न पाया ॥ तिहुँपुर कालके जाल पसारा । तामें अटके सब संसारा ॥ जात पांत कोई भेद न चीन्हा । मिथ्या राह जगहि गहलीन्हा ॥ ब्राह्मण प्रभुकी भक्ति न जाने । ब्रह्म रूप नाहीं पहचाने ॥ सार शब्द ब्राह्मण नहीं जाने । आदि नाम शूद्रही बखाने ॥ ब्राह्मण धरे शूद्र औतारा । करे मुक्ति तिहुँ पुरसे न्यारा ॥ धन्य शूद्र जो सेवा करई । आदि नामको हियमें धरई ॥ जाति वनरमें भेद बताऊँ । जो कोई समझे ताह लखाऊँ ॥ जाति बरण सब एकहि होई । दूसर जाति नहीं है कोई ॥ दूसर कर्म जाति है भाई । कर्म करे सो नाम धराई ॥ जैसो कर्म करे जो भाई । तैसी ताकी जात बनाई ॥ चार बरण सब एकहि जानो । दूसरे कर्म जो जात बखानो ॥ जाति बरणका चिह्न न कोई । कैसे जाति दूसरी होई ॥ दूसरि जाति कोई विधि माने । जग अज्ञात भेद न जाने ॥ जाति पांति होके नहिं आये । यह जगमें झगड़ा फैलाये ॥ जाति पांति नाहीं कोई न्यारी । एक जाति है सब संसारी ॥ भगके द्वार जीव सब आये । जन्म मरनमें बहुरि समाये ॥ राह एक आये संसारा । कौन ज्ञानसे भये नियोग ॥ एकइ घरसे सब जिव आये । एक बाप एक माता जाये ॥ ऊँच नीच सब सम कर जाना । ऊँच नीच सब झूँठ बखाना ॥ डार जनेऊ ब्राह्मण कहलायें । ब्राह्मणिको कहो का पहिराये ॥ सुनत करा मुसलमानहि कीन्हा । तुर्कानीको का कर दीन्हा ॥ ना हिन्दू ना तुर्क कहाये । ज्ञान हीन जिव धोखा खाये ॥ जात बरन मिथ्या कर जानो । सत्त कहे निश्चय कर मानो ॥
( २६ )
ज्ञानबोध
यह जग आंधर जानो भाई । नाम न जाने ऊँच कहाई ॥ ऊँच वही जो नामहि जानें । विना नाम सब नीच कहानें ॥ ना कोउ वर्ण नहीं कोउ भेषा । शब्द सरूपी जैहै देशा ॥ सब मिल भक्ति करो रे भाई । सतगुरु मुखसे यह फरमाई ॥ यह सतगुरुका ज्ञान है भाई । जो कोइलखे सो लोक सिधाई ॥ जात वर्ण हम भाख सुनाई । धर्मदास जगसे कहो जाई ॥ ऐसा तुम जग जान लख वो । सत्तलोकमें जिव पहुँचावो ॥
साखी-यह जग त्रयगुण भक्तमें, धूल परे धर्मदास ॥ नाम गहे विश्वास करि, जाय पुरुषके पास ॥ माना कहा कबारकी, सबको यहै पुकार । भरम जाल सब त्यागदे, गहले नाम अपार ॥
सारठा
जिन सब न म आधार विना नाम भव ना तरे । जाय काल दर्बार, सत्तपुरुष जो ना गहे ॥
चौपाई
कहै कबीर सुनो धर्मदासा । अब निज भेद कहों तुम पास ॥ अकह हतो पुनि कहा बखानी । उत्पति प्रलय हती मम वाणा ॥ आदि न अंत हती नहि माया । उत्पति प्रलय हती न काया ॥ सोहं ब्रह्म न नहि ओङ्कारा । काल निरंजन नहि औतारा ॥ दश आतारन चौबीस रूपा । तब नहि होता ज्योति स्वरूपा ॥ जब नहि चंद्रलोक दीपविस्तारा । तब नहि सुकृत करचो संसारा ॥ जब नहि लाक चंद्रसूर्य अरुतारा । तब नहि तीनों गुण औतारा ॥ वहां नहीं है दिन अरु राती । ऊच न नीच जात ना पांती ॥ नाही मुख पवन नहि पानी । समरथ गति काहू नहि जानी ॥ आदि ब्रह्म नहि करे पसारा । आप अकह तब हता नियारा ॥
बोधसागर
( २७ )
है अनाम अक्षर के माहीं । निहअक्षर कोइ जानत नाहीं ॥ अमर लोक जहाँ अम्बर काया । अकाल पुरुष जहाँ आपरहाया ॥ धर्मदास जहाँ वाम हमारा । काल अकाल न पावे पारा ॥ निरभय घर बोही है भाई । रोग न व्यापे काल न खाई ॥ समरथ घर हैं पैले पारा । सबके ऊपर है निरधारा ॥ जिनकी गम्य काल नहीं पाई । तीन देवकी कौन चलाई ॥ मन माया काल गति नाहीं । जीव सहाय बसै तेहिं ठाही ॥ ऐसा है वह देश हमारा । जहाँसे हम आये संसारा ॥ ताकी भक्ति करे जो कोई । भवते छूटै जन्म न होई ॥ वहाँ जाय जीव करे विलासा । अमरलोक जिवका नहीं नासा ॥ कहै कबीर सुनो धर्मदासा । आदिनाम मैं कहा तुम पासा ॥ जो कोई माने कहा तु हारा । निरभय जाय पुरुषके द्वारा ॥ मूरख सतगुरु मरम न पावे । भवसागरमें भटका खावे ॥ सार युक्ति मैं तुम्हें लखया । गन मुनि काहू भेद न पाया ॥ भाषा ग्रंथ ज्ञान उपदेशा । तुम अपने घट करो प्रवेशा ॥
सारखी-अस मुख है हमरे घरे, कहैं कबीर समझाय ।
सत्त शब्द तो कोई गहे, अस्थिर बैठे जाय ॥
सोरठा
चौथे पद निरवान, पूरे गुरुसे पाइये ।
कहे कबीर बखान, सत्त मान सतगुरु सही ॥
चौपाई
और सुनो गुरुमु का लेखा । भक्त होय सो करै विवेका ॥
जो कोई पान पम्बाना पावै । ताके निकट काल नहीं जावै ॥
पान परवाना पावै भाई । नाम गहे अरु भरम नशाई ॥
तन मन से गुरु सेवा लाई । गुरुसे देव और नहीं भाई ॥
गुरु से कपट शिष्य जो राखे । जमराजाके सुदगर चाखे ॥
( २८ )
ज्ञानबोध
सोई हंस काल घर जावे । सत् लोकमें वास न पावे ॥ निरभय घर कबहुँ ना पावै । कोट जन्मतिहिकालसतावै ॥ भक्ति कर पूजत हैं जो देवा । निश्चय जाय कालकी सेवा ॥ मनुष्य तन वे कभी न पावै । लख चौरासी भटका खावै ॥ जैसे कर्म करे संसारा । तस भुगते चौरासी धारा ॥ ना गुरु ना निगुरा पंथी । कहा कयो बांचैसे ग्रंथी ॥
साखी-भक्ति करें भरमत फिरे, जग छोड़े नहिं सोय ।
कहैं कबीर धर्मदास से, जिनका तरन न होय ॥
सोरठा
करनी देय वहाय, आदि नाम कह जानके ।
ता महाँ रहै समय, भरम जाल सब छोड़ दे ॥
धर्मदास वचन
चौपाई
धर्मदास तब कहै करजोरी । स्वामी सुनिये विनती मोरी ॥
हो स्वामी मैं बूझो तोहीं । करके कृपा बताइये मोहीं ॥
हो अविनाशी ब्रह्म कहाये । यह जगमें तुम कैसे आये ॥
यह सब भेद बताइय स्वामी । तुम सब घटके अंतर्यामी ॥
सकल चरित तुम मोहि बतावो । मैं जाते जगजीव चितावो ॥
यह जग तब पतियावे साई । चारों जुग तुम कहाँ रहाई ॥
साखी-सो अब मोहि बतावहूँ, तुम गुरु अगम अपार ।
धर्मदास विनती करे, सुनियो हो करतार ॥
कबीर वचन चौपाई
कहै कबीर सुनो धर्मदासा । अब यह भेद कहों तुम पासा ॥
वेद पुराण शास्त्र जग ठाना । भूले जीव न पांय ठिकाना ॥
बोधसागर
( २९ )
तीन लोक जिव काल सतावै । ब्रह्मा विष्णू पार न पावै ॥ सत् पुरुष तब मोहिं पठावा । जीव उबारन मैं जग आवा ॥ यहि कारण आयो संसारा । जगके जीव मैं करों उबारा ॥ जग जीवनको नाम लखावै । पकड़ हंस सतलोक पठावै ॥ हम हैं सतलोकके बासी । दास कहाय प्रगट भये कासी ॥ ना कोइ वर्ण नहीं कोइ भेशा । सत् पुरुषके थे हम देशा ॥ तहैंकी रचना अद्भुत भाई । सो मैंने तोहि पहिले सुनाइ ॥ और तोहि मैं कहूँ समझाई । धर्मदास सुन चित्त लगाई ॥ धरी देह भवसागर आये । धर्मदास तोहि नाम सुनाये ॥ कलियुगमें काशी चल आये । जब हमरे तुम दर्शन पाये ॥ तब हम नाम कबीर धराये । काल देख तब रह सुरझाये ॥ जो कोइ हमको चीन्हा भाई । जिनका काल धोक मिट जाई ॥ देह नहीं अरु दरसै देही । जग ना चीन्हे पुरुष विदेही ॥ नहीं बाप ना माता जाये । अब गतिहीसे हम चल आये ॥ हते विदेह देह धर आये । जग जीवोंके बन्द छुड़ाये ॥ नाम गहे तेहि लोक पठाये । बिना नाम जिव कालहि खाये ॥ गुप्त रहे नाहीं लख पावा । सो मैं जगमें आन चितावा ॥ चारों जुग भवसागर आये । आदि नाम जग ढेर सुनाये ॥ नाम सुने शरणागत आवें । तिनहीकी हम बंद छुडावें ॥ जीव प्रबोध लोक पहुँचावें । काल निरंजन देख डरावें ॥ चारों जगके चारों नामा । माया रहित रहै तिहि ठामा ॥ सतजुग सत् सुकृत कहलाये । त्रेता नाम सुनींद धराये ॥ द्वापरमें करुनामय कहाये । कलियुग नाम कबीर रखाये ॥ आदि नाम चारों जुग ढेरा । सज्जन जीव सुनतही दौरा ॥ जो जो जीव शरणमें आये । तिनको हमने नाम सुनाये ॥
( ३० )
ज्ञानबोध
आदि नाम जो नित गुन गावैं । कर विश्वास अमर पद पावैं ॥ जो कोइ सतगुरु नामको धावैं । तिनको साहब पार लगावैं ॥ पार हाय जो माया त्यागे । जन्म मरनको संशय भागे ॥ माया त्याग वैरागी होई । अजर अमरको पावैं सोई ॥
धर्मदास वचन
कह धर्मदाम सुनो प्रभु राई । भक्त भाव मोहि देव बताई ॥
कबीर वचन
भक्तोंकी यह कथा पसारा । धर्मदास सुनियो चित्त धारा ॥ जगमें भक्त भये अधिकारी । जोगी सन्यासी लट धारी ॥ शीव गोरख अरु बहु ब्रह्मचारी । मायाने सबको ठग डारी ॥ इनको ठग जब हमपर धाई । गुप्त नाम हम टेरे सुनाई ॥ लोट गइ माया बहुवारी । रहे जीत माया गइ हारी ॥ माया जल है कठिण अपारा । तासे गन सुनि बैठे हारा ॥ माया जाल परो मत भाई । धर्मदास जग कहो गुहराई ॥ भवसागर है भक्त बहुतेरा । जिनको तुमसे कहो निबेरा ॥ मौनी भये मुखहु नहिं बोलें । भेष बनाये घर घर डोलें ॥ अंगहि भस्म गले बिच माला । मठिया बैठ सुने मतवाला ॥ धून रमाय गुरिया सरकावे । गगन चढ़ाय के जग भरमावैं ॥ कान फाड़ शिर जटा बढ़ाये । माथे चन्दन तिलक लगाये ॥ वस्त्र रँगा जोगी बन आये । सतगुरु मिले न भेष बनाये ॥ बहुत करें जप तप रे भाई । आदि नाम कोई नहिं पाई ॥ पाहन सेवैं भक्त कहावैं । चन्दन तेल सिंदूर चढ़ावैं ॥ मानुष जन्म बड़े तप होई । नाम बिना झूठे तन खोई ॥ साधु युक्ति अस चाल बताऊँ । धर्मदास मैं तुम्हैं लखाऊँ ॥ काम क्रोध लोभ अहँकारा । सोई साधु जिन इतने मारा ॥ सूखा फीका करे अहारा । निशिदिन सुमरे नाम हमारा ॥
बोधसागर
( ३१ )
तत्त्व प्रकृति और बल माया । इन्हिं जीत तब साधु कहाया ॥ अन्त कपट सब देय बहाई । क्षमा गङ्गमें बैठ नहाई ॥ हार जीत और अभिमाना । इनसों रहित साधुको ज्ञाना ॥ बिहँसत बदन भजनको आगर । शीतल दया प्रेम सुखसागर ॥ सब षट् कर्म छोड़ अज्ञाना । धर ले केवल निर्गुन ध्याना ॥ धन्य धन्य जग साधु है सोई । जिन अपनी दुरमति सब खोई ॥ ऐसी रहन साधुकी भाई । जब हँसा निरभय पद पाई ॥ यह भक्तोंकी कथा सुनाई । निरभय पद कोइ बिरले पाई ॥ साधू लक्षण तुम्हें सुनाया । गन सुनि काहू भेद न पाया ॥ आदि नामको नित गुनगावो । सोवत जागत ना बिसरावो ॥ सत साहिब है सबसे न्यारा । ताहि जपे होवे भव पारा ॥ भक्त अनेक भये जग माहीं । जोग करै पै युक्ति न पाहीं ॥ जोगहि युक्तिनाम बिन नाहीं । झूठी माया आन लगाहीं ॥ नामहि गहै तेहि निहसंसा । नाम बिना बूझे सब हँसा ॥ नाम निरक्षर सुधि जब पावा । काल अपर्बल निकट न आवा ॥ माया त्याग भजो निज नामा । तब जिव जाय पुरुषके धामा ॥ सबसे कहो पुकार पुकारी । कोइ न माने नर अरु नारी ॥ सत्य पुरुषकी युक्ति न पाई । ऊदय धरे नहिं सत्य को भाई ॥ शिव गोरख सोइ पार न पावे । और जीवकी कौन चलावे ॥ कहें कबीर सुनो मम बानी । जोग युक्ति मैं कहों बखानी ॥ अब गेहीका सुनो विचारा । धर्मदास मैं कहों पुकारा ॥ गेही भक्त करे जो कोई । अब मैं तुमसे भाखों सोई ॥ गेही भक्ति सत्त गुरुकी करई । आदि नाम निज हृदसे धरई ॥ गुरु चरनसे ध्यान लगावै । अन्त कपट गुरुसे ना लागै ॥