भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 885, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 885

बोधसागर

( १७ )

सोरठा

भवसागरको पार, विना नाम उत्तरे नहीं । गहिलेव नाम अपार, कई कबीर सब जीवसे ॥

चौपाई

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । आदि नाम मैं कहों सब पासा ॥ यहि जगसे मैं कहा चिताई । अज्ञानी नहि माने भाई ॥ जौन जीव को ज्ञान न होई । कहे वचन माने नहि सोई ॥ और कहे जुलहा मति हीना । ब्रह्मा विष्णु शिवराम न चीन्हा ॥ ऐसे भक्त न देखे भाई । ब्रह्मा विष्णु शिवहिं विसराई ॥ जिन्दा हर का मरम न पाई । जुलहा भक्ति न जाने भाई ॥ ब्रह्मा विष्णु शिव जग उपजाई । इन तीनोंकी यह दुनियाई ॥ रावन छली रामकी नारी । रामचन्द्र कीन्हा रण भारी ॥ हर सीताको रावण लाये । राम लंकपति चिह्न मिटाये ॥ कहाँलों वरणों वार न पारा । तीन देवका सकल पसारा ॥

सार्वी-रामचन्द्र वर्णन कहूं, त्रयलोकी हैं नाथ ।

जग जिव कई समझायके, सुनिये जुलहा बात ॥

चौपाई

ऐसे सब जग कई गुहराई । धर्मदास मैं तुम्हें सुनाई ॥ आदि नाम मैं भाख सुनाई । यह जग जीव न चेता भाई ॥ आदि नाम सबको दरसाया । जग जीवों को ज्ञान सुनाया ॥ यह जुलहाको भेद न पाये । अज्ञानी क्यों रार मचाये ॥ आदि नामकी सुधि विसराये । मायामें सब जग लपटाये ॥ सच्चा साहिवको नहिं पाये । रामकृष्ण जग ध्यान लगाये ॥ ऐसे भूल गये संसारा । कैसे उत्तरे भव जल पारा ॥ कहे कबीर गहो निज नामा । जब पहुँचे अमरापुर गामा ॥

नं. ७ कबीरसागर - २