भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १८ )

ज्ञानबोध

साहब पै जग धरे न ध्याना । तिहुँपुर काल ठगो हम जाना ॥ सब कोइ नाम गहो रे भाई । छोड़ो दुर्गति और चतुराई ॥ भरम जाल मनही ना लाओ । सत्तपुरुषमें ध्यान लगावो ॥ दुनियामें भरमो मति हीना । जम घरजायँगे नाम विहीना ॥ यही मता हम जगहि लखाये । धर्मदास विरले जिव पाये ॥

सारखी—कहैं कबीर जनगायके, सुनो जगत यह ज्ञान ॥

नीचे त्रयलोकी रहत, ऊपर सत्तगुरु नाम ॥

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । जग जीवोंकी कथा प्रकाशा ॥ आदि नाम हम भास्व सुनाया । मूरख जीव भरम नहि पाया ॥ राम वरन जग कीन्हहा भाई । तुम सुनियो मैं देखै बताई ॥ जगत कहै जुलहा अज्ञानी । हरिहरका कछु भेद न जानी ॥ नीच जात और भक्त कहाई । हरि के दरस कबहुँ ना पाई ॥ वेद पुराण गीता हम जाना । हमसे नाहक करे बखाना ॥ हमरो वेद कहे निज बाता । रामचंद्र समरथ है दाता ॥ चार वेद ब्रह्मने ठाना । जुलहा भूल गया अभिमाना ॥ ब्रह्म विष्णु शिवसे और न देवा । ऋषि मुनि करें सबै मिल सेवा ॥ ले अवतार जीव जग आये । शालग्राममें सुर्त लगाये ॥ ब्रह्म विष्णु शिवहि जग धाये । जुलहा उलटा ज्ञान चलाये ॥ वेद शास्त्र में हमने जाना । ब्रह्म विष्णु महेश्वर माना ॥ सार वेदमें देखा भाई । रजगुण तमगुण सत्तगुण साई ॥ गीता भागवत पुस्तक नाना । निशिदिन जाप करें भगवाना ॥ आदि भवानी तीनों देवा । इनकी सब मिल साथे सेवा ॥ ऐसा ज्ञान हमारा होई । जुलहा कहा न मानो कोई ॥

सारखी—तीन देव निजके गहे, राखे देवी आस । सोइ जीव सुख भोग हैं, हंसा करे विलास ॥