कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १८ )
ज्ञानबोध
साहब पै जग धरे न ध्याना । तिहुँपुर काल ठगो हम जाना ॥ सब कोइ नाम गहो रे भाई । छोड़ो दुर्गति और चतुराई ॥ भरम जाल मनही ना लाओ । सत्तपुरुषमें ध्यान लगावो ॥ दुनियामें भरमो मति हीना । जम घरजायँगे नाम विहीना ॥ यही मता हम जगहि लखाये । धर्मदास विरले जिव पाये ॥
सारखी—कहैं कबीर जनगायके, सुनो जगत यह ज्ञान ॥
नीचे त्रयलोकी रहत, ऊपर सत्तगुरु नाम ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । जग जीवोंकी कथा प्रकाशा ॥ आदि नाम हम भास्व सुनाया । मूरख जीव भरम नहि पाया ॥ राम वरन जग कीन्हहा भाई । तुम सुनियो मैं देखै बताई ॥ जगत कहै जुलहा अज्ञानी । हरिहरका कछु भेद न जानी ॥ नीच जात और भक्त कहाई । हरि के दरस कबहुँ ना पाई ॥ वेद पुराण गीता हम जाना । हमसे नाहक करे बखाना ॥ हमरो वेद कहे निज बाता । रामचंद्र समरथ है दाता ॥ चार वेद ब्रह्मने ठाना । जुलहा भूल गया अभिमाना ॥ ब्रह्म विष्णु शिवसे और न देवा । ऋषि मुनि करें सबै मिल सेवा ॥ ले अवतार जीव जग आये । शालग्राममें सुर्त लगाये ॥ ब्रह्म विष्णु शिवहि जग धाये । जुलहा उलटा ज्ञान चलाये ॥ वेद शास्त्र में हमने जाना । ब्रह्म विष्णु महेश्वर माना ॥ सार वेदमें देखा भाई । रजगुण तमगुण सत्तगुण साई ॥ गीता भागवत पुस्तक नाना । निशिदिन जाप करें भगवाना ॥ आदि भवानी तीनों देवा । इनकी सब मिल साथे सेवा ॥ ऐसा ज्ञान हमारा होई । जुलहा कहा न मानो कोई ॥
सारखी—तीन देव निजके गहे, राखे देवी आस । सोइ जीव सुख भोग हैं, हंसा करे विलास ॥
बोधसागर
( १९ )
चौपाई
ऐसे जग जिव ज्ञान चलाई । धर्मदास तोहि कथा सुनाई ॥ यही जगत की उलटी रीती । नाम न जाने कालसों प्रीती ॥ वेद रीति सुनियो धर्मदासा । मैं सब भाख कहों तुम पासा ॥ वेद पुरान में नामहि भाषा । वेद लिखा जानों तुम साखा ॥ छऊ शास्त्र मिलिझगराकीन्हा । ब्रह्मरूप काहू नहि चीन्हा ॥ चीन्हो है जो दूसर होई । भर्म विवाद करे सब कोई ॥ मूल नाम ना काहू पाये । साखा पत्र गह जग लपटाये ॥ डार पत्रको जो कोई धरही । निश्चय जाय नरकमें परही ॥ भूले लोग कहैं हम पावा । मूल वस्तु विन जन्म गमावा ॥ जीव अभागि मूल नहि जाने । डार पत्र में पुरुष बखाने ॥ पढ़े पुराण औ वेद बखाने । सत् पुरुष जगभेद न जाने ॥ वेद पढ़े औ भेद न जाने । नाहक यह जग झगड़ा ठाने ॥ वेद पुराण यह करे पुकारा । सबहीसे इक पुरुष नियारा ॥ ताहि न यह जग जाने भाई । तीन देवमें ध्यान लगाई ॥ तीन देव की करहीं भक्ती । जिनकी कभी न होवे सुक्ती ॥ तीन देवका अजब खयाला । देवी देव प्रपंची काला ॥ इनमें मत भटको अज्ञानी । काल झपट पकड़ेगा प्राणी ॥ तीन देव पुरुष गम्य ना पाई । जगके जीव सब फिरे भुलाई ॥ जो कोइ सत् पुरुष गये भाई । जा कहैं देख डरे जमराई ॥ ऐसा सबसे कहियो भाई । जग जीवोंका भरम नशाई ॥ साखी-रूप देख भरमो नहीं, कहैं कबीर विचार । अलख पुरुष हृदये लखे, सोइ उतारि है पार ॥ चौपाई-जो जो वस्तु दृष्टिमें आई । सोई सबहि काल धर खाई ॥ मूरति पूजै सुक्त न होई । नाहक जन्म अकारथ खोई ॥
( २० )
ज्ञानबोध
यह जग करै मूर्तिकी पूजा । करै गर्व हमसे नहिं दूजा ॥ पण्डित भक्त भये जग माहीं । पाथर पूजत जन्म गमाही ॥ ऐसे भक्त भये अधिकार्ई । पीतरकी निज मूर्ति बनाई ॥ इनसै भक्त और नहिं कोई । जिन अपनी दुरमति नहिं खोई ॥ आदि ब्रह्मको भेद न पाये । पद पद पंडित जग भरमाये ॥ अन्तकाल जम घेरे आई । तब विद्या कछुकाम न आई ॥ पाथर पूजें पढ़े पुराना । पद गुण अर्थ विवेकहि ज्ञाना ॥ ज्ञान कथे है वार न पारा । सतगुरु भक्त न जान लबारा ॥ ऐसा मत ब्राह्मणने धारा । जले जात हैं यमके द्वारा ॥ आदि नाम भूलो मत भाई । असुर अंश दुरमतहि लखाई ॥ धर्मदास देखो जग रीती । सांचा छोड़ झूठसों प्रीती ॥
साखी
सार शब्द ना जान है, कहैं कबीर बखान । यह जग भूले बावरे, गहे न सतगुर मान ॥ ब्राह्मण भूले बावरे, सरगुण मतके जोर । लख चौरासी भोगिहैं, पारब्रह्मके चोर ॥
सरगुण माहिं सार नहिं कोई । निरगुण नाम नियारा होई ॥ निर्गुणसे सरगुण है भाई । सरगुणमें यह जग लपटाई ॥ रजगुण सतगुणतमगुणकहिये । सब मिटजाय ज्ञान जोलहिये ॥ तीनों गुण से सरगुण होई । चौथा पद निरगुण है सोई ॥ निर्गुण नाथ निरंजन राई । निज उत्पत्ति बनाके खाई ॥ ताके परे इक नाम नियारा । सो साहब है मूल अपारा ॥
बोधसागर
( २१ )
उन्हें जगत नहीं जाने भाई । काल अंश राखे भगमाई ॥ ब्रह्मा विष्णु शिवहि जग झाँके । सत्य कबीर नाम रस छोँके ॥ नाम अमल रस चाखे कोई । ताको जरा मरन ना होई ॥ सतगुरु भक्ति करे जो कोई । जाति वर्ण डुरमति सब खोई ॥ आदि नामको नित गुणगावे । भवसागर में बहुरि न आवे ॥ आदि नामको गहे जो आसा । सतगुरु काटे काल कि फाँसा ॥ आदिनाम है गुप्त अमोला । धर्मदास मैं तुमसे खोला ॥ गुप्त मता पावे जो कोई । गेही तज बैगगी होई ॥ आदि नाम गुप्त संसारा । जो पावै जग से हो न्यारा ॥ धर्मदास यह जग बौराना । कोई न जाने पद निरवाना ॥ यहि कारन मैं कथा पसारा । जगसे कहियो नाम नियारा ॥ यही ज्ञान जग जीव सुनाओ । सब जीवोंका भरम नशाओ ॥ अब मैं तुमसे कहों चिताई । त्रयदेवनकी उतपत्ति भाई ॥ साहब कीन्ह इक अजबतमाशा । सो सब कहँ मैं तुम्हरे पास ॥ कछु संक्षेप कहों गुहराई । सब संशय तुम्हरे मिट जाई ॥ भरम गये जग वेद पुराना । आदि नामका भेद न जाना ॥ राम राम सब जगत बखाने । आदि नाम कोई बिरला जाने ॥ राजाराम सबको यह जग जाने । तुम से ताको भेद बखाने ॥ ज्ञानी सुन सो हिरदै लगाई । मूरख सुने सो गम्य न पाई ॥ मा अछंगी पिता निरंजन । वे जम दारुण वंशन अंजन ॥ पहिले कीन्ह निरंजन राई । पीछेसे माया उपजाई ॥ मायारूप देख अति शोभा । देव निरंजन तन मन लोभा ॥ कामदेव धर्मराय सताये । देवी को तुरतइ धर खाये ॥ पट से देवी करी पुकारी । साहब मोहे करो उबारी ॥ टेर सुनो सतगुरु तहँ आये । अछंगी को बंद छुड़ाये ॥
( २२ )
ज्ञानबोध
धर्मराय को हिकमत दीन्ह। नख रेखासे भगकर लीन्ह ॥ धर्मराय करें भोग विलासा । मायाको सु रही तब आसा ॥ धर्मराय अरु माया साजे । तीन लोक तासे उपराजे ॥ तीन पुत्र अष्टंगी जाये । ब्रह्मा विष्णु शिव नाम धराये ॥ तीन देव विस्तार चलाये । इनमें यह जग धोखा खाये ॥ पुरुष गम्य कैसे के पावै । काल निरंजन जग भरमावै ॥ तीन लोक अपने सुत दीन्ह। सुन्न निरंजन बासा लीन्ह ॥ अलख निरंजन सुन्न ठिकाना । ब्रह्मा विष्णु शिव भेद न जाना ॥ तीन दव सो उनको धावै । निरञ्जनको वे पार न पावै ॥ अलख निरञ्जन बड़ वटपारा । तीन लोक जिव कीन्ह अहारा ॥ ब्रह्मा विष्णु शिव नहीं बचाये । सकल खाय पुन धूर उड़ाये ॥ तिनके सुत है तीनै देवा । आंधर जीव करत है सेवा ॥ रामहिं रूप धरी है माया । जिन लंकाको राय सताया ॥ दश औतार माया ने धरिया । काल अपर्बल सबको छलिया ॥ काल पुरुष काहू नहिं चीन्हीं । काल पाय सबही गह लीन्हीं ॥ एसा राम सकल जग जाने । आदि ब्रह्मको ना पहिचाने ॥ तीनों देव असुर औतारा । ताको भजे सकल संसारा ॥ तीनों गुणका यह विस्तारा । धर्मदास मैं कहीं पुकारा ॥
सारखी
गुण तीनों की भक्ति में भूल परो संसार । कई कबीर निज नाम विन, कैसे उतरे पार ॥
सोरठा
जगजिव है अज्ञान, आदि नाम नहिं जानहीं । मायामें लपटान, जीव जमपुरी जावहीं ॥
बोधसागर
( २३ )
चौपाई
ऐसा राम कबीर न जाना । धर्मदास सुनियो दै काना ॥ सुत्र के परे पुरुष को धामा । तहैं साहब है आदि अनामा ॥ ताहि धाम सब जीवका दाता । मैं सबसों कहता निज बाता ॥ कहत अगोचर सब के पारा । आदि अनादि पुरुष है न्यारा ॥ आदि ब्रह्म इक पुरुष अकेला । ताके संग नहीं कोइ चेला ॥ ताहि न जाने यह संसारा । बिना नाम है जमके चारा ॥ नाम बिना यह जग अरुझाना । नाम गहे सौ संतसुजाना ॥ सच्चा साहब भजु रे भाई । यहि जगसे तुम कहो चित्ताई ॥ धोखा में जिव जन्म गँवाई । झूठी लगन लगाये भाई ॥ ऐसा जग से कहु समझाई । धमदाम जिव बोधो जाई ॥ सज्जन जिव आवै तुम पासा । जिन्हें देव सतलोकहि बासा ॥ ज्ञानहीनके सुन षट करमा । धर्मदास उनके ये धरमा ॥ भरग गये वे भव जलमाहीं । आदि नाम को जानत नाही ॥ पीतर पाथर पूजन लागे । आदि नाम घटही से त्यागे ॥ तीरथ बर्त करे संसारे । नेम धरम असनान सकारे ॥ भेष वनाय विभूति रमाये । घर घर भिक्षा माँगन आये ॥ जग जीवनको दीक्षा देहीं । सत्तनाम विन पुरषहि द्रोही ॥ ज्ञान हीन जो गुरु कहावै । आपन भूला जगत भुलावै ॥ काम कोध मद लोभ विक्राग । इन्हें न त्यागे साध बिचारा ॥ ऐसा ज्ञान चलाया भाई । सत साहबकी सुध बिसराई ॥ यह दुनियां दो रंगी भाई । जिव गह शरण असुरकी जाई ॥ तीरथ व्रत तप पुन्य कमाई । यह जम जाल तहाँ ठहराई ॥ यहै जगत ऐसा अरुझाई । नाम बिना बूढ़ी दुनियाई ॥ जो कोइ भक्त हमारा होई । जात वरण को त्यागे सोई ॥
( २४ )
ज्ञानबोध
तीरथ व्रत सब देय बहाई । सतगुरु चरणसे ध्यान लगाई ॥ काम क्रोध मद लोभ न तेही । सोई पावै परम सनेही ॥ मनहीं बांध स्थिर जो करही । सो हंसा भवसागर तरही ॥ भक्त होय सतगुरुका पूरा । रहै पुरुष के नित्त हजुरा ॥ यही जो रीति साधकी भाई । सार युक्ति में कह गुहराई ॥ साखी-सत्तनाम निज मूल है, यह कबीर समझाय ॥ दोई दीन खोजत फिरें, परम पुरुष नहीं पाय ॥
सोरठा
सत्तनाम गुण गाव, गहै नाम सेवा करै । सहज परम पद पाव, सतगुरु पद विश्वास दृढ ॥
चौपाई
पाथर पूज हिंदु भुलाना । सुरदा पूज भूले तुरकाना ॥ कहैं कबीर ये दोह भुलाना । आदि पुरुष कोई नहीं जाना ॥ हिन्दू तुर्क दोई उपदेशा । नाम गहै मिटि काल कलेशा ॥ भवसागर कोइ पार न पावे । या जग में सब गोता खावे ॥ भव दरयाव है अगम अपारा । पुरुष भक्त उतरेंगे पारा ॥ धर्मदास जग कहो समझाई । आदि नाम बिन सुक्ति न पाई ॥ जो जन भजि हैं निर्भयनामा । सो हंसा पहुँचै निज धामा ॥ अजर नाम लै लोकहि जाई । दुष्ट काल तब रहे सुरझाई ॥ कर्मत्याग सब भजो यकनामा । कभी न हो भवसागर धामा ॥ ब्रह्मने जो राह चलाई । सो सब कहों मैं तुमसे गार्ई ॥ चार वरण अरु वेद बखाना । जगके जीव सबही उरझाना ॥ जात पांत ब्रह्म कर दीन्हा । सबमें ऊँच ब्राह्मणको दीन्हा ॥ ब्रह्म अपने मते चलाये । तीनों गुण जग नाम लखाये ॥ आदि नामकी सुध नहीं पाये । चारों जुग धोखाहि गुमाये ॥
बोधसागर
( २५ )
यह ब्रह्मा की है कगवृत्ती । जगहि लखाये झूठी रीती ॥ ब्रह्माने यह जग भरमाया । पत्त पुरुषका भेद न पाया ॥ तिहुँपुर कालके जाल पसारा । तामें अटके सब संसारा ॥ जात पांत कोई भेद न चीन्हा । मिथ्या राह जगहि गहलीन्हा ॥ ब्राह्मण प्रभुकी भक्ति न जाने । ब्रह्म रूप नाहीं पहचाने ॥ सार शब्द ब्राह्मण नहीं जाने । आदि नाम शूद्रही बखाने ॥ ब्राह्मण धरे शूद्र औतारा । करे मुक्ति तिहुँ पुरसे न्यारा ॥ धन्य शूद्र जो सेवा करई । आदि नामको हियमें धरई ॥ जाति वनरमें भेद बताऊँ । जो कोई समझे ताह लखाऊँ ॥ जाति बरण सब एकहि होई । दूसर जाति नहीं है कोई ॥ दूसर कर्म जाति है भाई । कर्म करे सो नाम धराई ॥ जैसो कर्म करे जो भाई । तैसी ताकी जात बनाई ॥ चार बरण सब एकहि जानो । दूसरे कर्म जो जात बखानो ॥ जाति बरणका चिह्न न कोई । कैसे जाति दूसरी होई ॥ दूसरि जाति कोई विधि माने । जग अज्ञात भेद न जाने ॥ जाति पांति होके नहिं आये । यह जगमें झगड़ा फैलाये ॥ जाति पांति नाहीं कोई न्यारी । एक जाति है सब संसारी ॥ भगके द्वार जीव सब आये । जन्म मरनमें बहुरि समाये ॥ राह एक आये संसारा । कौन ज्ञानसे भये नियोग ॥ एकइ घरसे सब जिव आये । एक बाप एक माता जाये ॥ ऊँच नीच सब सम कर जाना । ऊँच नीच सब झूँठ बखाना ॥ डार जनेऊ ब्राह्मण कहलायें । ब्राह्मणिको कहो का पहिराये ॥ सुनत करा मुसलमानहि कीन्हा । तुर्कानीको का कर दीन्हा ॥ ना हिन्दू ना तुर्क कहाये । ज्ञान हीन जिव धोखा खाये ॥ जात बरन मिथ्या कर जानो । सत्त कहे निश्चय कर मानो ॥
( २६ )
ज्ञानबोध
यह जग आंधर जानो भाई । नाम न जाने ऊँच कहाई ॥ ऊँच वही जो नामहि जानें । विना नाम सब नीच कहानें ॥ ना कोउ वर्ण नहीं कोउ भेषा । शब्द सरूपी जैहै देशा ॥ सब मिल भक्ति करो रे भाई । सतगुरु मुखसे यह फरमाई ॥ यह सतगुरुका ज्ञान है भाई । जो कोइलखे सो लोक सिधाई ॥ जात वर्ण हम भाख सुनाई । धर्मदास जगसे कहो जाई ॥ ऐसा तुम जग जान लख वो । सत्तलोकमें जिव पहुँचावो ॥
साखी-यह जग त्रयगुण भक्तमें, धूल परे धर्मदास ॥ नाम गहे विश्वास करि, जाय पुरुषके पास ॥ माना कहा कबारकी, सबको यहै पुकार । भरम जाल सब त्यागदे, गहले नाम अपार ॥
सारठा
जिन सब न म आधार विना नाम भव ना तरे । जाय काल दर्बार, सत्तपुरुष जो ना गहे ॥
चौपाई
कहै कबीर सुनो धर्मदासा । अब निज भेद कहों तुम पास ॥ अकह हतो पुनि कहा बखानी । उत्पति प्रलय हती मम वाणा ॥ आदि न अंत हती नहि माया । उत्पति प्रलय हती न काया ॥ सोहं ब्रह्म न नहि ओङ्कारा । काल निरंजन नहि औतारा ॥ दश आतारन चौबीस रूपा । तब नहि होता ज्योति स्वरूपा ॥ जब नहि चंद्रलोक दीपविस्तारा । तब नहि सुकृत करचो संसारा ॥ जब नहि लाक चंद्रसूर्य अरुतारा । तब नहि तीनों गुण औतारा ॥ वहां नहीं है दिन अरु राती । ऊच न नीच जात ना पांती ॥ नाही मुख पवन नहि पानी । समरथ गति काहू नहि जानी ॥ आदि ब्रह्म नहि करे पसारा । आप अकह तब हता नियारा ॥
बोधसागर
( २७ )
है अनाम अक्षर के माहीं । निहअक्षर कोइ जानत नाहीं ॥ अमर लोक जहाँ अम्बर काया । अकाल पुरुष जहाँ आपरहाया ॥ धर्मदास जहाँ वाम हमारा । काल अकाल न पावे पारा ॥ निरभय घर बोही है भाई । रोग न व्यापे काल न खाई ॥ समरथ घर हैं पैले पारा । सबके ऊपर है निरधारा ॥ जिनकी गम्य काल नहीं पाई । तीन देवकी कौन चलाई ॥ मन माया काल गति नाहीं । जीव सहाय बसै तेहिं ठाही ॥ ऐसा है वह देश हमारा । जहाँसे हम आये संसारा ॥ ताकी भक्ति करे जो कोई । भवते छूटै जन्म न होई ॥ वहाँ जाय जीव करे विलासा । अमरलोक जिवका नहीं नासा ॥ कहै कबीर सुनो धर्मदासा । आदिनाम मैं कहा तुम पासा ॥ जो कोई माने कहा तु हारा । निरभय जाय पुरुषके द्वारा ॥ मूरख सतगुरु मरम न पावे । भवसागरमें भटका खावे ॥ सार युक्ति मैं तुम्हें लखया । गन मुनि काहू भेद न पाया ॥ भाषा ग्रंथ ज्ञान उपदेशा । तुम अपने घट करो प्रवेशा ॥
सारखी-अस मुख है हमरे घरे, कहैं कबीर समझाय ।
सत्त शब्द तो कोई गहे, अस्थिर बैठे जाय ॥
सोरठा
चौथे पद निरवान, पूरे गुरुसे पाइये ।
कहे कबीर बखान, सत्त मान सतगुरु सही ॥
चौपाई
और सुनो गुरुमु का लेखा । भक्त होय सो करै विवेका ॥
जो कोई पान पम्बाना पावै । ताके निकट काल नहीं जावै ॥
पान परवाना पावै भाई । नाम गहे अरु भरम नशाई ॥
तन मन से गुरु सेवा लाई । गुरुसे देव और नहीं भाई ॥
गुरु से कपट शिष्य जो राखे । जमराजाके सुदगर चाखे ॥
( २८ )
ज्ञानबोध
सोई हंस काल घर जावे । सत् लोकमें वास न पावे ॥ निरभय घर कबहुँ ना पावै । कोट जन्मतिहिकालसतावै ॥ भक्ति कर पूजत हैं जो देवा । निश्चय जाय कालकी सेवा ॥ मनुष्य तन वे कभी न पावै । लख चौरासी भटका खावै ॥ जैसे कर्म करे संसारा । तस भुगते चौरासी धारा ॥ ना गुरु ना निगुरा पंथी । कहा कयो बांचैसे ग्रंथी ॥
साखी-भक्ति करें भरमत फिरे, जग छोड़े नहिं सोय ।
कहैं कबीर धर्मदास से, जिनका तरन न होय ॥
सोरठा
करनी देय वहाय, आदि नाम कह जानके ।
ता महाँ रहै समय, भरम जाल सब छोड़ दे ॥
धर्मदास वचन
चौपाई
धर्मदास तब कहै करजोरी । स्वामी सुनिये विनती मोरी ॥
हो स्वामी मैं बूझो तोहीं । करके कृपा बताइये मोहीं ॥
हो अविनाशी ब्रह्म कहाये । यह जगमें तुम कैसे आये ॥
यह सब भेद बताइय स्वामी । तुम सब घटके अंतर्यामी ॥
सकल चरित तुम मोहि बतावो । मैं जाते जगजीव चितावो ॥
यह जग तब पतियावे साई । चारों जुग तुम कहाँ रहाई ॥
साखी-सो अब मोहि बतावहूँ, तुम गुरु अगम अपार ।
धर्मदास विनती करे, सुनियो हो करतार ॥
कबीर वचन चौपाई
कहै कबीर सुनो धर्मदासा । अब यह भेद कहों तुम पासा ॥
वेद पुराण शास्त्र जग ठाना । भूले जीव न पांय ठिकाना ॥
बोधसागर
( २९ )
तीन लोक जिव काल सतावै । ब्रह्मा विष्णू पार न पावै ॥ सत् पुरुष तब मोहिं पठावा । जीव उबारन मैं जग आवा ॥ यहि कारण आयो संसारा । जगके जीव मैं करों उबारा ॥ जग जीवनको नाम लखावै । पकड़ हंस सतलोक पठावै ॥ हम हैं सतलोकके बासी । दास कहाय प्रगट भये कासी ॥ ना कोइ वर्ण नहीं कोइ भेशा । सत् पुरुषके थे हम देशा ॥ तहैंकी रचना अद्भुत भाई । सो मैंने तोहि पहिले सुनाइ ॥ और तोहि मैं कहूँ समझाई । धर्मदास सुन चित्त लगाई ॥ धरी देह भवसागर आये । धर्मदास तोहि नाम सुनाये ॥ कलियुगमें काशी चल आये । जब हमरे तुम दर्शन पाये ॥ तब हम नाम कबीर धराये । काल देख तब रह सुरझाये ॥ जो कोइ हमको चीन्हा भाई । जिनका काल धोक मिट जाई ॥ देह नहीं अरु दरसै देही । जग ना चीन्हे पुरुष विदेही ॥ नहीं बाप ना माता जाये । अब गतिहीसे हम चल आये ॥ हते विदेह देह धर आये । जग जीवोंके बन्द छुड़ाये ॥ नाम गहे तेहि लोक पठाये । बिना नाम जिव कालहि खाये ॥ गुप्त रहे नाहीं लख पावा । सो मैं जगमें आन चितावा ॥ चारों जुग भवसागर आये । आदि नाम जग ढेर सुनाये ॥ नाम सुने शरणागत आवें । तिनहीकी हम बंद छुडावें ॥ जीव प्रबोध लोक पहुँचावें । काल निरंजन देख डरावें ॥ चारों जगके चारों नामा । माया रहित रहै तिहि ठामा ॥ सतजुग सत् सुकृत कहलाये । त्रेता नाम सुनींद धराये ॥ द्वापरमें करुनामय कहाये । कलियुग नाम कबीर रखाये ॥ आदि नाम चारों जुग ढेरा । सज्जन जीव सुनतही दौरा ॥ जो जो जीव शरणमें आये । तिनको हमने नाम सुनाये ॥
( ३० )
ज्ञानबोध
आदि नाम जो नित गुन गावैं । कर विश्वास अमर पद पावैं ॥ जो कोइ सतगुरु नामको धावैं । तिनको साहब पार लगावैं ॥ पार हाय जो माया त्यागे । जन्म मरनको संशय भागे ॥ माया त्याग वैरागी होई । अजर अमरको पावैं सोई ॥
धर्मदास वचन
कह धर्मदाम सुनो प्रभु राई । भक्त भाव मोहि देव बताई ॥
कबीर वचन
भक्तोंकी यह कथा पसारा । धर्मदास सुनियो चित्त धारा ॥ जगमें भक्त भये अधिकारी । जोगी सन्यासी लट धारी ॥ शीव गोरख अरु बहु ब्रह्मचारी । मायाने सबको ठग डारी ॥ इनको ठग जब हमपर धाई । गुप्त नाम हम टेरे सुनाई ॥ लोट गइ माया बहुवारी । रहे जीत माया गइ हारी ॥ माया जल है कठिण अपारा । तासे गन सुनि बैठे हारा ॥ माया जाल परो मत भाई । धर्मदास जग कहो गुहराई ॥ भवसागर है भक्त बहुतेरा । जिनको तुमसे कहो निबेरा ॥ मौनी भये मुखहु नहिं बोलें । भेष बनाये घर घर डोलें ॥ अंगहि भस्म गले बिच माला । मठिया बैठ सुने मतवाला ॥ धून रमाय गुरिया सरकावे । गगन चढ़ाय के जग भरमावैं ॥ कान फाड़ शिर जटा बढ़ाये । माथे चन्दन तिलक लगाये ॥ वस्त्र रँगा जोगी बन आये । सतगुरु मिले न भेष बनाये ॥ बहुत करें जप तप रे भाई । आदि नाम कोई नहिं पाई ॥ पाहन सेवैं भक्त कहावैं । चन्दन तेल सिंदूर चढ़ावैं ॥ मानुष जन्म बड़े तप होई । नाम बिना झूठे तन खोई ॥ साधु युक्ति अस चाल बताऊँ । धर्मदास मैं तुम्हैं लखाऊँ ॥ काम क्रोध लोभ अहँकारा । सोई साधु जिन इतने मारा ॥ सूखा फीका करे अहारा । निशिदिन सुमरे नाम हमारा ॥
बोधसागर
( ३१ )
तत्त्व प्रकृति और बल माया । इन्हिं जीत तब साधु कहाया ॥ अन्त कपट सब देय बहाई । क्षमा गङ्गमें बैठ नहाई ॥ हार जीत और अभिमाना । इनसों रहित साधुको ज्ञाना ॥ बिहँसत बदन भजनको आगर । शीतल दया प्रेम सुखसागर ॥ सब षट् कर्म छोड़ अज्ञाना । धर ले केवल निर्गुन ध्याना ॥ धन्य धन्य जग साधु है सोई । जिन अपनी दुरमति सब खोई ॥ ऐसी रहन साधुकी भाई । जब हँसा निरभय पद पाई ॥ यह भक्तोंकी कथा सुनाई । निरभय पद कोइ बिरले पाई ॥ साधू लक्षण तुम्हें सुनाया । गन सुनि काहू भेद न पाया ॥ आदि नामको नित गुनगावो । सोवत जागत ना बिसरावो ॥ सत साहिब है सबसे न्यारा । ताहि जपे होवे भव पारा ॥ भक्त अनेक भये जग माहीं । जोग करै पै युक्ति न पाहीं ॥ जोगहि युक्तिनाम बिन नाहीं । झूठी माया आन लगाहीं ॥ नामहि गहै तेहि निहसंसा । नाम बिना बूझे सब हँसा ॥ नाम निरक्षर सुधि जब पावा । काल अपर्बल निकट न आवा ॥ माया त्याग भजो निज नामा । तब जिव जाय पुरुषके धामा ॥ सबसे कहो पुकार पुकारी । कोइ न माने नर अरु नारी ॥ सत्य पुरुषकी युक्ति न पाई । ऊदय धरे नहिं सत्य को भाई ॥ शिव गोरख सोइ पार न पावे । और जीवकी कौन चलावे ॥ कहें कबीर सुनो मम बानी । जोग युक्ति मैं कहों बखानी ॥ अब गेहीका सुनो विचारा । धर्मदास मैं कहों पुकारा ॥ गेही भक्त करे जो कोई । अब मैं तुमसे भाखों सोई ॥ गेही भक्ति सत्त गुरुकी करई । आदि नाम निज हृदसे धरई ॥ गुरु चरनसे ध्यान लगावै । अन्त कपट गुरुसे ना लागै ॥
( ३२ )
ज्ञानबोध
गुरु सेवामें फल सब आवै । गुरु विमुख नर पार न पावै ॥ गुरु वचन निश्चय कर मानै । पूरे गुरुकी सेवा ठानै ॥ विन विश्वास भक्ति परकाशा । प्रीति विना नहिं दुबिधा नाशा ॥ मीन मांस मद निकट न जाई । अंकुर भक्ष सो सदा कराई ॥ गुरुसे शिष्य करे चतुराई । सेवा हीन नर्कमें जाई ॥ परधन पाहन समझे भाई । झूठ वचन हृदये नहिं लाई ॥ पर तिरिया माता सम मानै । झूठ छोड़ सत्यहिको जाने ॥ जीवपै दया करै रे भाई । बुरे कर्म सब देय बिहाई ॥ हृदये दया प्रीति ना होई । सतगुरु सपने मिले न सोई ॥ नाम नेह गुरु सुतै लगावे । आदि नामको पल पल ध्यावे ॥ लेवै पान सुक्ति सहदानी । जाते काल न रोकै आनी ॥
सारखी-पुरुष नाम निशिदिन गहो, शब्द करो परतीत ।
अंक नाम निज पाइया, जाहो भवजल जीत ॥
सोरठा
भर्म तजे यम जाल, सत्तनाम लौ लावई ।
चले संतकी चाल, परमार्थ चित दे गहे ॥
चौपाई
गेही भक्त आरती आने । प्रति पूनोकी आरति ठाने ॥ अमावस आरती नहिं होई । ताहि भवन रह काल समोई ॥ पाख दिवस नहिं होवे साजू । प्रति पूनो कर आरति काजू ॥ पूनो पान लीन्ह धर्मदासा । पावे शिष्य होट सुखबासा ॥ छटे मास नहिं आरति भेवा । साल माह गुरु चौका सेवा ॥ नाम कबीर जपै लौलाई । तुम्हरा नाम कहे गुहराई ॥ ऐसी रहनि गेहि जो धरि है । गुरु प्रताप दोई निस्तरि है ॥
बोधसागर
( ३३ )
साखी-सो भव पार उतारि है, केवटसे कर प्रीत । जब सतगुरु केवट मिले, जैहै भव जल जीत ॥ सोरठा-काल जीव धर खाय, सत्तनाम जाने विना । बचि है एक उपाय, सत्त कबीर कह भव तरे ॥
चौपाई
सत्त कबीर गुरु धर्मदासा । जीव पठै है पुरुष के पास ॥ सत्त गुरु सत्त कबीरहि आहीं । गुप्त रहे जग चीन्हत नाहीं ॥ सतगुरु आप जगत पग धारे । दासा तन धर शब्द पुकारे ॥ काल निरंजन सब पर छाया । आदि नामका चिह्न भिटया ॥ धर अवतार असुर संहारा । जिव जाने यह धनी हमारा ॥ एही धोख नर्क सब जाहीं । जिव अचेत छल चीन्है नाहीं ॥ नर्क बास नहिं छूटै भाई । जो सतगुरु को चीन्है नाहीं ॥ ब्रह्मा विष्णु शिवसे नहिं देवा । जिन्ह बैकुण्ठवास नहिं देवा ॥ ऐसा काल अपरबल भाई । जिहिके छल जग चीन्है नाई ॥ जगमें जीव घात बहुतेरे । करे घात अरु पाप घनेरे ॥ दुष्ट अन्याई करजिवकी घाता । खेल शिकार माने मन माता ॥ जीव मार तन करत अहारा । जीव दया नहिं करत गँवारा ॥ जीवघाती खो बहुत दुख पावे । जन्मजन्म तिथिकाल सतावे ॥ काग देह धर विष्टा खाहीं । जन्म अनेक भ्रमे जगमाहीं ॥ जीव दया विन मुक्ति न पावैं । मीन मांस मद राक्षस खावैं ॥ धर्मदास यह जग बौराई । दुष्ट जीवकी कथा सुनाई ॥ जीव कष्ट मोहिं सहा न जाई । ज्ञान हीन नर जीव सताई ॥ यहि कारण हम जगमें आये । तीन लोक जम लूटत पाये ॥ पहले लूटे विष्णु सुरारी । फिर लूटे शंकर लटधारी ॥
( ३४ )
ज्ञानबोध
गनमुनि लूटे तपसी झारी । अरु लूटे सगले संसारी ॥ चन्द्र सूर्य तारागण सोई । कहै कबीर बचा नहिं कोई ॥ देखो यही काल की रीती । धर्म न परखो रीति अनीती ॥ ऐसा काल कठिन बरियारा । बचे सोह जो नाम पुकारा ॥ काल रीति मैं तोहिं सुनाई । धर्मदास जिव बोधा जाई ॥
साखी-कहे कबीर धर्मदास सों, तुम सुनियो चितलाय ।
काल भेद ना जानहीं मूरख रहै झुलाय ॥
सोरठा-तजो काल बरयार, जीव दया चितमें करो ।
उतरो भव जल पार, आदि नाम हृदय गहो ॥
सुनो संत मति धीर, कहो ज्ञान परखो हिये ।
काल अपरबल बीर, हृदये विवेकं दृढ ॥
चौपाई
आदि नाम है अजर शरीरा । तनमनसे गह सत्त कबीरा ॥
जोई गहे धर्मदास कबीरा । सो पावे सुख सागर तीरा ॥
काया बीर नाम है धीरू । सब घट रहे सभायक बीरू ॥
निजही शब्द कबीर है सारा । जाका है निज सकल पसारा ॥
एकै रूप शब्द पुर एका । एक भाव दुतिया नहिं देखा ॥
कैसे दुतिया कहिये सोई । दुतिया भर्म मिटै सब कोई ॥
एकहि हम तुम एक शरीरा । एक शब्द है मतिके धीरा ॥
दूसर भाव नहीं है आसा । सोई कबीर सोई धर्मदासा ॥
एक रूप एकै अनुहारी । एकहि पुरुष सकल विस्तारी ॥
आदि नाम मैं भाख सुनाओ । नाम गहे जब मुक्ती पाओ ॥
जो कोइ आदि नामको चीन्हा । तासो काल भयो बलहीना ॥
साखी-आदि नाम है मुक्तिका, जप जाने जो कोय ।
कोटि जाप संसारमें, तासे मुक्ति न होय ॥
बोधसागर
( ३५ )
सोरठा-बूझ लेहु हो हंस, आदि नाम निज सार है । अमर होय ते वंश, जिन जानो निज नामको ॥ और मन्त्र सब छार, आदि नाम निज मंत्र है । बूढ़ मरा संसार, कह कबीर निजनाम विन ॥
चौपाई
कहे कबीर सुनो धर्मदासु । चार गुरुकी कथा प्रकासु ॥ चार गुरु संसारहि कीन्हों । जिनके हा जिवमुक्ती दीन्हों ॥ वे हंसन को लोक पठाये । भवसागर जिव बहुरि न आये ॥ सार शब्द साहब का न्यारा । सोई शब्द कहैं गुरु उचारा ॥ सार शब्द काल नहिं पाईं । तीन देवकी कौन चलाई ॥ शब्द सङ्ग हंसा घर जाईं । काल अपरबल देख डराईं ॥ सार शब्द मैं तुमको दीन्हा । काल तुम्हारे रहे अधीना ॥ धर्मदास तुम मतिके धीरा । तुमको दीन्हा मुक्तिका वीरा ॥ तुमते जीव उतारि है पारा । सौंप दीन्ह तोहि जगको भारा ॥ सतजुग शिष्यसहतेजी कहाये । द्वापर चतुर्भुज नाम सुनाये ॥ त्रेता शिष्य बंकेजी भाई । कलियुगमें धर्मदास गुसाई ॥ चार गुरु भवसागर माहीं । धर्मदास वे जिव मुक्ताहीं ॥ यह मैं तुमसे कहां समझाईं । सब संशय तुम्हरे भिट जाईं ॥ वंस ब्यालिस तुम्हारे सारा । और सकल सब झूठ पसारा ॥ इनहीं सौंप देव जिव भारा । सब जीवनको करे उबारा ॥ धर्मदास तुम पुरुषके अंशा । अब हमको कछु नाहीं संशा ॥ होय पंथ भव सागर सारा । तुम्हरे वंश सब जीव उबारा ॥ ब्यालिस वंशराजलिख दीन्हों । अटल राज भवसागर कीन्हों ॥ धर्मदास मैं कहां बिचारी । यहि विधि निबहै सब संसारी ॥
साखी-नाम भेद जो जानहीं, सोई वंश हमार ।
नातर दुनिया बहुत है, बूढ़ मरा संसार ॥
( ३६ )
ज्ञानबोध
सोरठा-जैसे भव जल जीत, सार शब्द जो जानहीं । कठिन काल विपरीत, नातो जम ले जायगा ॥
धर्मदास वचन
चौपाई
धर्मदास तब विन्ती लाई । अब मैं पंथ करो गुन गाई ॥ अमरलोकके हो गुरु वासी । कारन कौन आये अविनाशी ॥ मृत्युलोक आये कैहि काजा । धर्मराय पापी बड़ राजा ॥
साहब कबीरका वचन
धर्मदाम तुम सुनियो भाई । जीवन काज पुरुष पठवाई ॥ सक्त पुरुष सतलोकके बासी । सकल हंसके लिये अविनाशी ॥ पुरुषदरश कोइ बहुरि न पावै । तीन लोकमें आन रहावै ॥ तीन लोक सब परले होई । अमरलोक सुखदायक सोई ॥ जीवकाज जगमें हम आये । धर्मरायसे जीव छुड़ाये ॥ आदि अनाम अमोल अपारा । अकह अगोचर सबसे न्यारा ॥ तहाँसे हम आये संसारा । पहुँचे काशी नगर मैझारा ॥ सत्त सत्त हम करें पुकारा । भवसागरके जीव उबारा ॥ नाम सुने जो मो लग धाये । जिनको हमने पार लगाये ॥ समझे सुने जो वाचा मेरी । काटूँ ताकी कर्मकी बेरी ॥ भगकी राह नहीं हम आये । जन्म मरन ना बहुरि समाये ॥ त्रिगुण पांच ताव हम नाही । इच्छारूप देह हम आहीं ॥ साखी-पांच तत्त्व गुन तीन नहीं, तामें सकल शरीर ।
सब कोइ हृदये चीन्हियो, सतगुरु पुरुष कबीर ॥
चौपाई
हम जमके शिर मर्दन द्वारा । जो कोइ गहे सो उतरे पारा ॥ जहाँ हम रहें काल तहाँ नाही । हंसन हम सुखदायक आहीं ॥
बोधसागर
( ३७ )
जो साहब सतलोक रहाई । तिनको सब कोई चीन्हौ भाई॥ नाम बिना दुखि तीनों देवा । जिनकी गन गंधर्व करें सेवा ॥ जगके देव सब काल अधीना । बचे सोई जो नामको चीन्हा ॥ हम बल एक शब्दका भाई । ताही बल हंसा सुत्काई ॥ जहाँ नाम काल गति नाही । बिना नाम है कालकी छाई ॥ ज्ञान हीन जाने नहीं भाई । जीव कै सँग मन काल रहाई ॥ जीव के संग कालको वासा । अज्ञानी जन गहे विश्वासा ॥ मनको कहो न कीजे कोई । मन जिवको भरमावे सोई ॥ कहे कबीर मन जात गँवारी । मनको कहो न करो नर नारी ॥ मनको कहो जो कर है भाई । भवसागरमें देय बहाई ॥ मन चंचल सो काल है भाई । मनको त्यागे निरमल हो जाई ॥ मनके रूप समानी माया । सब संसार व्याप्त यह छाया ॥ मन थिरकर परमात्म जाना । यहि विधितत्त्वलेय पहिचाना ॥ काल जाल ते तेही छूटे । काल विचारा ताहि न लूटे ॥ यही भेद धर्म सुन लीजे । शब्द माहि तुम बासा कीजे ॥ काल ज्ञान संसार बखाना । काल स्वरूप नहीं पहिचाना ॥ काल चरित्र तुमसे कहो भाई । यही भेद कोई नहीं पाई ॥ काया माया झूठी जानो । झूठा सकल पसारा मानो ॥ झूठो नाम साहबको नाही । बूझ लेव अपने हिय माहीं ॥ साखी-काल पाय जग ऊपजो, काल पाय सब धाय । कालपाय सब विनसही, काल काल कह खाय ॥ सोरठा-धर्मदास लेव जान, मुन्य सुरूपी मनहि है । वचन कबीर प्रमान, रूप रेख मनको नहीं ॥
चौपाई
परम पुरुष नाम गहो भाई । ताते हंसा लोक सिधाई ॥ आदि नाम है जिव रखवारा । उनको सब कोई करो पुकारा ॥