भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( ३७ )

जो साहब सतलोक रहाई । तिनको सब कोई चीन्हौ भाई॥ नाम बिना दुखि तीनों देवा । जिनकी गन गंधर्व करें सेवा ॥ जगके देव सब काल अधीना । बचे सोई जो नामको चीन्हा ॥ हम बल एक शब्दका भाई । ताही बल हंसा सुत्काई ॥ जहाँ नाम काल गति नाही । बिना नाम है कालकी छाई ॥ ज्ञान हीन जाने नहीं भाई । जीव कै सँग मन काल रहाई ॥ जीव के संग कालको वासा । अज्ञानी जन गहे विश्वासा ॥ मनको कहो न कीजे कोई । मन जिवको भरमावे सोई ॥ कहे कबीर मन जात गँवारी । मनको कहो न करो नर नारी ॥ मनको कहो जो कर है भाई । भवसागरमें देय बहाई ॥ मन चंचल सो काल है भाई । मनको त्यागे निरमल हो जाई ॥ मनके रूप समानी माया । सब संसार व्याप्त यह छाया ॥ मन थिरकर परमात्म जाना । यहि विधितत्त्वलेय पहिचाना ॥ काल जाल ते तेही छूटे । काल विचारा ताहि न लूटे ॥ यही भेद धर्म सुन लीजे । शब्द माहि तुम बासा कीजे ॥ काल ज्ञान संसार बखाना । काल स्वरूप नहीं पहिचाना ॥ काल चरित्र तुमसे कहो भाई । यही भेद कोई नहीं पाई ॥ काया माया झूठी जानो । झूठा सकल पसारा मानो ॥ झूठो नाम साहबको नाही । बूझ लेव अपने हिय माहीं ॥ साखी-काल पाय जग ऊपजो, काल पाय सब धाय । कालपाय सब विनसही, काल काल कह खाय ॥ सोरठा-धर्मदास लेव जान, मुन्य सुरूपी मनहि है । वचन कबीर प्रमान, रूप रेख मनको नहीं ॥

चौपाई

परम पुरुष नाम गहो भाई । ताते हंसा लोक सिधाई ॥ आदि नाम है जिव रखवारा । उनको सब कोई करो पुकारा ॥

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