कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 900, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३२ )
ज्ञानबोध
गुरु सेवामें फल सब आवै । गुरु विमुख नर पार न पावै ॥ गुरु वचन निश्चय कर मानै । पूरे गुरुकी सेवा ठानै ॥ विन विश्वास भक्ति परकाशा । प्रीति विना नहिं दुबिधा नाशा ॥ मीन मांस मद निकट न जाई । अंकुर भक्ष सो सदा कराई ॥ गुरुसे शिष्य करे चतुराई । सेवा हीन नर्कमें जाई ॥ परधन पाहन समझे भाई । झूठ वचन हृदये नहिं लाई ॥ पर तिरिया माता सम मानै । झूठ छोड़ सत्यहिको जाने ॥ जीवपै दया करै रे भाई । बुरे कर्म सब देय बिहाई ॥ हृदये दया प्रीति ना होई । सतगुरु सपने मिले न सोई ॥ नाम नेह गुरु सुतै लगावे । आदि नामको पल पल ध्यावे ॥ लेवै पान सुक्ति सहदानी । जाते काल न रोकै आनी ॥
सारखी-पुरुष नाम निशिदिन गहो, शब्द करो परतीत ।
अंक नाम निज पाइया, जाहो भवजल जीत ॥
सोरठा
भर्म तजे यम जाल, सत्तनाम लौ लावई ।
चले संतकी चाल, परमार्थ चित दे गहे ॥
चौपाई
गेही भक्त आरती आने । प्रति पूनोकी आरति ठाने ॥ अमावस आरती नहिं होई । ताहि भवन रह काल समोई ॥ पाख दिवस नहिं होवे साजू । प्रति पूनो कर आरति काजू ॥ पूनो पान लीन्ह धर्मदासा । पावे शिष्य होट सुखबासा ॥ छटे मास नहिं आरति भेवा । साल माह गुरु चौका सेवा ॥ नाम कबीर जपै लौलाई । तुम्हरा नाम कहे गुहराई ॥ ऐसी रहनि गेहि जो धरि है । गुरु प्रताप दोई निस्तरि है ॥