भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( १९ )

चौपाई

ऐसे जग जिव ज्ञान चलाई । धर्मदास तोहि कथा सुनाई ॥ यही जगत की उलटी रीती । नाम न जाने कालसों प्रीती ॥ वेद रीति सुनियो धर्मदासा । मैं सब भाख कहों तुम पासा ॥ वेद पुरान में नामहि भाषा । वेद लिखा जानों तुम साखा ॥ छऊ शास्त्र मिलिझगराकीन्हा । ब्रह्मरूप काहू नहि चीन्हा ॥ चीन्हो है जो दूसर होई । भर्म विवाद करे सब कोई ॥ मूल नाम ना काहू पाये । साखा पत्र गह जग लपटाये ॥ डार पत्रको जो कोई धरही । निश्चय जाय नरकमें परही ॥ भूले लोग कहैं हम पावा । मूल वस्तु विन जन्म गमावा ॥ जीव अभागि मूल नहि जाने । डार पत्र में पुरुष बखाने ॥ पढ़े पुराण औ वेद बखाने । सत् पुरुष जगभेद न जाने ॥ वेद पढ़े औ भेद न जाने । नाहक यह जग झगड़ा ठाने ॥ वेद पुराण यह करे पुकारा । सबहीसे इक पुरुष नियारा ॥ ताहि न यह जग जाने भाई । तीन देवमें ध्यान लगाई ॥ तीन देव की करहीं भक्ती । जिनकी कभी न होवे सुक्ती ॥ तीन देवका अजब खयाला । देवी देव प्रपंची काला ॥ इनमें मत भटको अज्ञानी । काल झपट पकड़ेगा प्राणी ॥ तीन देव पुरुष गम्य ना पाई । जगके जीव सब फिरे भुलाई ॥ जो कोइ सत् पुरुष गये भाई । जा कहैं देख डरे जमराई ॥ ऐसा सबसे कहियो भाई । जग जीवोंका भरम नशाई ॥ साखी-रूप देख भरमो नहीं, कहैं कबीर विचार । अलख पुरुष हृदये लखे, सोइ उतारि है पार ॥ चौपाई-जो जो वस्तु दृष्टिमें आई । सोई सबहि काल धर खाई ॥ मूरति पूजै सुक्त न होई । नाहक जन्म अकारथ खोई ॥