भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 898

( ३० )

ज्ञानबोध

आदि नाम जो नित गुन गावैं । कर विश्वास अमर पद पावैं ॥ जो कोइ सतगुरु नामको धावैं । तिनको साहब पार लगावैं ॥ पार हाय जो माया त्यागे । जन्म मरनको संशय भागे ॥ माया त्याग वैरागी होई । अजर अमरको पावैं सोई ॥

धर्मदास वचन

कह धर्मदाम सुनो प्रभु राई । भक्त भाव मोहि देव बताई ॥

कबीर वचन

भक्तोंकी यह कथा पसारा । धर्मदास सुनियो चित्त धारा ॥ जगमें भक्त भये अधिकारी । जोगी सन्यासी लट धारी ॥ शीव गोरख अरु बहु ब्रह्मचारी । मायाने सबको ठग डारी ॥ इनको ठग जब हमपर धाई । गुप्त नाम हम टेरे सुनाई ॥ लोट गइ माया बहुवारी । रहे जीत माया गइ हारी ॥ माया जल है कठिण अपारा । तासे गन सुनि बैठे हारा ॥ माया जाल परो मत भाई । धर्मदास जग कहो गुहराई ॥ भवसागर है भक्त बहुतेरा । जिनको तुमसे कहो निबेरा ॥ मौनी भये मुखहु नहिं बोलें । भेष बनाये घर घर डोलें ॥ अंगहि भस्म गले बिच माला । मठिया बैठ सुने मतवाला ॥ धून रमाय गुरिया सरकावे । गगन चढ़ाय के जग भरमावैं ॥ कान फाड़ शिर जटा बढ़ाये । माथे चन्दन तिलक लगाये ॥ वस्त्र रँगा जोगी बन आये । सतगुरु मिले न भेष बनाये ॥ बहुत करें जप तप रे भाई । आदि नाम कोई नहिं पाई ॥ पाहन सेवैं भक्त कहावैं । चन्दन तेल सिंदूर चढ़ावैं ॥ मानुष जन्म बड़े तप होई । नाम बिना झूठे तन खोई ॥ साधु युक्ति अस चाल बताऊँ । धर्मदास मैं तुम्हैं लखाऊँ ॥ काम क्रोध लोभ अहँकारा । सोई साधु जिन इतने मारा ॥ सूखा फीका करे अहारा । निशिदिन सुमरे नाम हमारा ॥