कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( ९ )
जहां तहां सब जग भर्मावै । ज्ञान संच कछु रहन न पावै ॥ एक शब्दकी केतक आसा । हमरे हैं चौरासी फांसा ॥
ज्ञानी वचन
बोले ज्ञानी शब्द विचारी । छूटै चौरासी की धारी ॥ छूटै पांच पच्चीस गुन तीनों । ऐसो शब्द पुर्ष सुहि दीन्हो ॥
निरञ्जन वचन
हे ज्ञानी का करों बड़ाई । हमते नाह छूट जिव जाई ॥ इतने जुग भये का तुम देखा । ज्ञानी हंस न एकै पेखा ॥ का तुम करो का शब्द तुम्हारा । तीन लोक प्रलय तर डारा ॥ साधु सन्त हम देखी रीती । प्रलय परे सकल सब जीता ॥ कर्म रेख बाँधै सब साधा । सुरनरसुनि सकलो जग बांधा ॥
ज्ञानी वचन
ज्ञानी कहै काल अन्यायी । शब्द बिना तू खाय चबायी ॥ अब तुम कस खेहौ बटपारा । पुर्ष शब्द दीन्हौ टकसारा ॥ जनके जीवत लेउँ उबारा । कर्म रेख तोरो घर न्यारा ॥ पांच पच्चीस और गुन तीनों । इतने मोर हम लेउँ छीनो ॥ पांच जानेकी मेटी आसा । पुर्ष शब्द भाषौ विश्वासा ॥ शुभअरु अशुभ काकरे निबेरा । मेटी काल सकल उरझारा ॥
निरञ्जन वचन
तिगुन काल तब बोले बानी । उरझ जीव सकल जमखानी ॥ कै केसे तुम शब्द पसारो । कौनसी विधि तुम जीव उबारो ॥ ऐसे जीव सकल हैं करनी । कैसे पहुँचै पुर्षके सरनी ॥ जगमें जीव क्रोध विकरारा । कैसे पहुँचै पुर्षके द्वारा ॥ क्रोधी जीव प्रेत अभिमानी । धरी है जन्म नर्कको खानी ॥