कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
राजाका सद्गुरुसे लोक लेजानेको विनती करना
बोधसागर
( ४५ )
जो ऐसी नाहीं बनि आवै । ताके पान संग वृषभ चढावै ॥ वृषभ चढावे पावे सोई । पढुप दीप रूप बहु होई ॥ वृषभ नाम नील है भाई । उनकी शोभा बहुतहिं पाई ॥ नाम नील वरन है स्वेता । ताको रूप कहा कहु केता ॥ जो वृषभ नहीं बनि आवै । तो लै गौ सो देह बनावै ॥ गौ देह सो पान जो पावे । मंजुल करि वह हंस रहावे ॥ दश हजार सुर झलके देही । पहुँचे हंसा होय विदेही ॥ हीरा मोती लाल जवहिरा । पान चढे पुनि देह उजिहिरा ॥ बस्तर दे पुनि पान चढावे । ज्ञान दीपमें लै पहुँचावे ॥ पांच सौ सूर्य समान सरूपा । परसत तहाँ सो होय अनूपा ॥ कंचन रूपा धातु चढावै । तैसो शोभा देहमें पावै ॥ कहुँ पुकार करो निवैरा । देह विना कहँ करै बसेरा ॥
राजा वचन
धरे राम सतगुरुको पाऊ । हो सतगुरु तुम हंस मुकताऊ ॥ सत्यगुरु मैं तुव बलि जाऊ । सर्व भेद तुम मोहिं बताऊ ॥ कछु न मोसे राखु दुराई । देत हौं तुमको पुरुष दुहाई ॥ जो तुम कहौं करौं मैं सोई । तुमसो दिल पतियाना मोई ॥ कृपा करो मैं प्रीति लगाऊँ । कसनी देहु सो सकल सहाऊँ ॥
सतगुरु वचन
तब सतगुरु कहे समझायी । काहे को तुम देत दुहायी ॥ सबही कहौं तुम पूछो तैसी । लोक राह है सो पुनि जैसी ॥ गही बाँहि उबारै तोहि राई । यहि हंसन की अहे कमाई ॥ जो तुम किरिया दीन्हा मोई । कछु न तुम सौं राखूं गोई ॥ यह कहिसतगुरु युगति बनाया । ले राजाको अंक मिलाया ॥ अंक मिला कटी सब माया । पारस रूप जो भई काया ॥
सद्गुरुका प्रसाद पाना
( ४६ )
जगजीवनबोध
अंक मिलाया भये नृप पारस । उघडी दृष्टि अधिक भै आरस॥ लोक द्रौप दृष्टि भै आई । भिन्न भिन्न सब द्रौप दिखाई ॥ भये राजा मन महा अनन्दा । मानो ऊँगे पूर्ण चन्दा ॥
राजा वचन
धन सतगुरु तुम्हरी बलिहारी । बूडत जीव तुम लीन्ह उबारी ॥ अब सतगुरु प्रसाद कछु कीजै । महा प्रसाद जीवनको दीजै ॥
सतगुरु वचन
सतगुरु कहै सुनो तुम राई । महा प्रसादकी जुगति बताई ॥ कंचन केरी थार मँगाओ । अमृतकी झारी भर लाओ ॥ आसन डारिके पुरुष बैठोओ । स्वेत बहुत सब हंस ले आओ ॥ इतना करि तब चरण खटारो । होय अधीन तन मनको मारो ॥ सुनि राजा सब युक्ती लीन्हा । सतगुरुको बहु बन्दन कीन्हा ॥ चरणखटारि पोंछि जब लियऊ । आसन बिठाय पुरुष कहँ दियऊ ॥ तब सतगुरु अस करबे लीना । सीथ प्रसाद सबनकूँ दीना ॥ पाय प्रसाद भये बड भागा । शून्य महल मन मोहरा जागा ॥ कहै समरथ कहु कैसा स्वादा । कहत बने नहि बनत अघादा ॥
सारखी-महाप्रसाद के करतही, निःतत्त्व होय जाय ।
रंचक घटमें संचरे, सतगुरु लोक दिखाय ॥
राजा वचन--चौपाई
सतगुरु कहिये बात विशेषा । लोक द्रौप सबही हम देखा ॥ धन्य सतगुरु तुम्हारे बलि जाऊँ । लोक द्रौप सब दृष्टिहि पाऊँ ॥
सतगुरु वचन
चौका युक्ती नहीं बनि आवै । महा प्रसाद कै देह बनावै ॥ तुमसे राजा कहु समझायी । पाख मास भै पान तुम पायी ॥ पुरुष पान सो पावे जबहीं । अगम ज्ञान सो सूझे तबहीं ॥
पान माहात्म्य
बोधसागर
( ४७ )
यही ज्ञान मैं भेद समझायी । तुम हंसन से कहो बुझायी ॥ हमरो प्रतिहार पान है भाई । पलपल खबर हंसकी लाई ॥ सोई वस्तु लै लोक पहुँचावे । सोई पान संग हंसन आवे ॥ जाका तुमसे कहूँ विचारा । पान लहे सो हंस हमारा ॥ जैसुनि लगन पान जो पावे । निर्भय लोक हमारे आवे ॥ पान परख विन झूठ कडिहारा । धोखे लेइ जिवन कर भारा ॥ धर्मराय माँगि है पाना । जब ही हंसा करे निर्वाना ॥ साखी-सब ही पहुँचे लोकमें, चढै पानपर अंक । कटे कर्म सब जन्मके, हंस होय निःशंक ॥
हंस ( राजा ) वचन-बोपाई
हंस कहे सुनो गुरुदेवा । जीवकि अवधि बताओ भेवा ॥ जादिन अंत अवस्था आवे । ताकर भेद हंस किमि पावे ॥ सोम शुक्र दिन औ बुधवारा । ताका कहिये चन्द्र सरदारा ॥ आपनि आपनि चौकी आवै । तौ यह जीव बहुत सुख पावै ॥ चले चूक चौकी कर फेरा । तौ कायानगरमें होय बखेरा ॥ गुरुबारका भेद बताऊँ । दो भावै गुरु दरस दिखाऊँ ॥ एकै आवै एक न आवै । ता दिन जीव बहुत दुःख पावै ॥ बार तिथि चौकी चूक करही । तो निश्चय ना बाचै देही ॥ सरब भेद मैं तोहि बताया । विरले हंस भेद यह पाया ॥ तुम सों हंस कहूँ समझायी । गुप्त भेद ना बाहिर जायी ॥ अब हम पृथ्वी परिक्रमा जावै । भूले हसन करें चितावै ॥ तुम राजा बैठि राज कराओ । सार शब्द जपन चित लाओ ॥
राजा वचन
जब सतगुरु तहाँ ऐसो कहिया । तब राजा मन चिता भइया ॥ राजा चरण धरयो तब आई । तुम विनु कैसे रहूँ गुसाई ॥ हमको राखो चरण लगायी । नहि देहु सत्यलोक पठायी ॥
सद्गुरुका पाटनसे चलनेका विचार प्रगट करना और वहाँके हंसोंकी विनती
( ४८ )
जगजीवनबोध
करक संक्रान्ति चन्द्रकी भाई । जल तत्त्व ते चन्द्र कहाई ॥ जब चन्दा घर चन्दा सोई । रोग व्याधि शोक ना होई ॥ चन्द्र पेलिके सूर समावे । पास छः में लोकहिं जावे ॥ अब पाँच तत्त्वका कई बखाना । जानेगा कोइ हंस सुजाना ॥ परबत पंच काया के बारै । गुरु गम हंसा करै विचारै ॥ पीत वरन है मन्दिर वारा । तामें पुरुष दरश गुरु सारा ॥ स्वेत वरन है पुरुष परमाना । ताका दरश करै कोइ स्याना ॥ तीजे लालवरन पुरुष परमाना । देखत हैं सो हंस सुजाना ॥ चौथा हरा रंग है सूरत । ताको ध्यान धरि देखिये सूरत ॥ पाँचवें स्याम वरन अधिकारा । सो देखै कोइ हंसा प्यारा ॥ जो कोइ इनसै सुरति लगावै । स्वास स्वासकी खबर बतावै ॥ रवि मंगल शनिश्चर वारा । तापर सूर होय असवारा ॥
कालज्ञान
सतगुरु वचन
सतगुरु कहै सुनो रे भाई । अगम के भेद कई समझाई ॥ भिन्न भिन्न करके भेद बताऊँ । आगम कहिये दृष्टि दिखाऊँ ॥ वर्ष छः मास मासका भाऊँ । पाख आठदिन बरनि सुनाऊँ ॥ इंगला पिंगला सुषुमनि नारी । चले लगन सो लेहु विचारी ॥ पाँच तत्त्व हैं उनके पास । वह सब आगम कहैं तमासा ॥ स्याना हंस होय जो भाई । तिनको अगम देहुं बताई ॥ छः मासका भेद बताऊँ । अगम लहो सो कहि समझाऊँ ॥ दोग्य संक्रान्तिका भेद बतायी । एक मकर दूजा करक कहायी ॥ मकर संक्रान्ति सूरज सो देखा । तत्त्व पृथ्वी स्वर सूर विशेषा ॥ जो सूर घर सूरज आवे । छः मास काया सुख पावे ॥ सूरज पेलि चन्द्र जो आवे । छः मासमें जीव चलावे ॥
सद्गुरुका राजाको अपना प्रतिनिधि बनाकर गमन करना
बोधसागर
( ४९ )
पल पल राय नवावै माथा । मोको कैसे छुडाओ साथा ॥ गुरु विन कैसे रहौं अकेला । दिग दिग होये जीव न चेला ॥
सतगुरु वचन
सतगुरु कहै सुनो मोर भाई । हम संगे रहो लै जाउँ लिवाई॥ सदा रहौ हंसन के पास। हमको रहै हंसनकी आसा ॥ देह सो दर्शन तुम्हे दिये राई । विदेही होय संग रहूँ सहाई ॥ विदेही दरश जब हंस पावे । देखि दरश होय अधिक उछावे॥ सतगुरु चलन खबर सब पावा । धीरे धीरे सब हंसा आवा ॥ आये हंसा विन्ती करहीं । हे साहब हम धीर कस धरहीं ॥ जो तुम जाओ सतगुरु साहब । हमहु संग सब तुम्हरे आयव ॥ तुम विनु गुरु कैसे रहि जावै । जल विनु मच्छी ज्यों तडपावै॥ हम पाये आनंद दरश तुम्हारे । मोको न छोडो स्वामि हमारे ॥
सतगुरु वचन
काहे को हठ करत हौ भाई । सबही हंस सुनो चित लाई ॥ देह धरी अब करो सुख वासा । सदा रखो निज नामकी आसा॥ घर में रहि कुल धर्म निवाहो । जो सब साँचि भक्ति तुम चाहो॥
सबहंस वचन
माता पिता त्रिया नहिं चहिये । सुत नारीसे नहिं नेह लगैये ॥ सतगुरु तुमही हौ यक साँचा । झूठ और सकल जग काचा ॥ विना दर्श सो दुख हम पावै । नित चरणामृत कहँसे लावै ॥ तुम विनु देह छुटि सो जावै । कहँ गुरुवचन बहुरि सो पावै ॥ विना दरश सब जगकी माया । सबहि छुटे नहिं चहिये काया॥
सतगुरु वचन
सतगुरु कहै सुनो रे भाई । सबही रहो नाम लौ लायी ॥ सदा रहूँ मैं उनके पास। धरे ध्यान जो साँचकी आसा॥
राजाका सत्यलोक गमनकी तय्यारी करना और अधिकारी हंसोंका साथ जाना
( ५० )
जगजीवनबोध
सुनो हंस गहो पद सांची । ध्यान विदेह में रहि हो रांची॥ इतना कहि सतगुरु बतलावा । सबको विदेह ध्यान समझावा॥ ध्यान पाइ आनन्द सबै भयञ्ज । सतगुरुदरश प्रत्यक्षहि पयञ्ज ॥ फिर सतगुरु राजहि समझावा । सब हंसन को करहु चितावा ॥ पुनि हंसनसे अस प्रभु भाख्यो । हमरे ठौर राय तुहि राख्यो ॥ हम सम रायको सबही जानो । हमसन राय को अन्त न मानो॥ तब सदगुरु तहाँ ते पगुधारा । सब हंसन दुख भयो अपारा ॥ चलत गुरु सब सीस नवाया । करि मिलाप गुरु कण्ठ लगाया॥ तुम सों राजा कहू चितायी । रहो सदा शब्द लवलायी ॥ चले गुरु समरथ जेही वारा । रोवै हंस बहैं जल धारा ॥ जैसे रंकहि रतन हिराना । जैसे भुजंग मणी विसराना ॥ मानि सतगुरु आज्ञा लीना । विदेह ध्यान गुरु दर्शन दीना ॥ ध्यान पाइ गुरु करें सब भक्ती । काल नाल सब छूटी युक्ती ॥ केते दिवस ऐसे चलि गयञ्ज । तबही राजा आगम पयञ्ज ॥ सब हंसनको वेगि बुलायी । राजा कहै शब्द बतलायी ॥
राजा वचन
जेहि कारण हम भक्ति कराई । सो दिन अब पहुँचा है आई ॥ ताल पखावज वेगि लै आओ । शब्द चलावा मंगल गाओ ॥ बाजा बाजे बहुत वधायी । सबै त्रिया मिलि मंगल गायी ॥ सब ही लोक खबर यह पायी । राय जगजीवन लोक सिधायी ॥ पाटन नगर में बहुत उछावा । घर घर तिरिया करे बधावा ॥ बैठे राजा आसन धारी । जुरे हंस जहाँ बहुत अपारी ॥ ले परवाना बन्दगी कीना । सबही हंस परिकरमा दीना ॥ रानी पांच कुँवर दौय जाना । ❁ दासी चार हजुरी साना ॥
• इसके विरुद्ध दूसरों पुस्तकोंमें इस प्रकार लिखा है
जब राजा एक शब्द उचारा । कौन कौन चले हमारे लारा ॥-
सत्यलोकके मार्गमें धर्मरायसे हंसोंका वार्तालाप
बोधसागर
( ५१ )
चार प्रधान सात उमराऊ । प्रोहित द्योय द्वियै मन भाऊ ॥ इतना जन परवाना लीना । राजा संग सो प्याना कीना ॥ पावत बीरा जिव निस्तारेऊ । अमर लोक कहैं प्याना धारेऊ ॥ दशम द्वार सो न्यारा द्वारा । जेही राह हँस पगु धारा ॥ धन्य भाग हँसन तब जाना । राजाके संग कीन पयाना ॥ आये प्रथम धरम के डेरा । जहैं चौतरा रायधरम केरा ॥ धर्मराय जब लेखा मांगा । तब हँसा लेखा देने लागा ॥ जिन जिन कौल चुकाने भाई । सो सो रहे धर्मकी ठाई ॥
जीव बचन धर्मराय प्रति
जीव कहे सुनो धर्मराया । हम सतगुरुका परवाना पाया ॥ ज्ञान ध्यान हम बहुते जाने । और जाने अमर सो ज्ञाने ॥ हमको तुम काहे रोकत भाई । संगी हमारे आगे चले जाई ॥
धर्मरायबचन
भूला जीव मुख करे चतुरायी । ऐसी बतन मुक्ति न पायी ॥ साखी गावे सब संसारा । का सबही जिव उतरे पारा ॥ जो जीव होऐ कौलके साचा । तिन सबपर हम पाले बाचा ॥ सतगुरु सेवा कीन बनायी । हमरे शिरसु पावैं धरि जायी ॥ भक्ति हीन छुए अंग हमारा । छूवउ अंग होय जरि छारा ॥
—तब इतने हँस आगे पगुधारा । संग जान को कीन बोचारा ॥ रानी पांच कुर्वर द्योय जानी । दासी अष्ट नव हजुरी सानी ॥ पांच प्रधान प्यारह उमराओ । छडी दार सातसो मन साओ ॥ बारह कापस्थ सत्रह साहूका । बढई चार अरु सात लुहारा ॥ सत्रह मुनार अठारह बनजारा । चौकीदार चले संग चारा ॥ नव कुरमी सत्रह कोरी । तेरह कुन्हार सबै सर मोरी ॥ धोबी उजला धोवन हारा । पांच चले राजाकी लारा ॥ छः धमार बन्दगी कीना । राजा के संग प्याना दीना ॥ पाये बीरा जीव चलावा । निकसा जीव ठाठरी पढावा ॥
कामिनीसे बातचीत
( ५२ )
जगजीवनबोध
चार सहस्र सै सात रु बावन । इतना जिय चलु लोकहिं ठावन॥ दोसै कौल चुकाने भाई । सो रहे धर्म राय की ठाई ॥ चार हजार सात सै बावन । दोय सै धरमराज ठहरावन ॥ चार हजार बावन सै पाँचा । मानसरोवर पहुँचो सो साँचा ॥ जहाँ कामिनी मंगल गावै । सजि आरति ले आगे आवै ॥
कामिनी वचन
करी निछावर बूझै बाता । कैसे आये यहि मग धाता ॥ माया मोह बन्द्यो संसारा । कैसे छाडे कुल परिवारा ॥
हंस वचन
कहे हंस सतगुरु गम दीन्हा । जब हम दर्शन तुम्हारा लीन्हा॥ देह बनी सो आगे आये । रहिता सब जिव वहाँ रहाये ॥ चार हजार एकसौ बावन । एते हंस तेहीं ठावन ॥ चार सौ आगे किया पयाना । हेतु द्रौप पहुँचे अस्थाना ॥ मान सरोवर हंस रहायी । सबमिलिकरहि बहुत बधायी॥ सब पूछे कामिनि सो बात । यह सब हंस कहाँ को जाता ॥
कामिनी वचन
कह कामिनि सुनु हंसा भाई । तुम गुरु कर कह कीन कमाई ॥ परवाना की यह बडावा । सो तुम मानसरोवर आवा ॥ उन हंसन गुरु भक्ति करायी । जुगति जुगति उन देह बनायी ॥ आगे हेत द्रौप मैं जैहैं । हंस सुजन जन कंठ लगै हैं ॥
हंस वचन
सब हंसा मिलि विनती कीन्हा । हम चाहैं तुव दर्शन लीन्हा ॥ साखी-बैठि हंस विन्ती करे, सुनु समरथ अरदास । देही सवारे लोकमें, उपजे प्रेम विलास ॥
हंस गुंजन जनसे बातचीत
बोधसागर
( ५३ )
चौपाई-सुजनजन वचन
हंस सुजन जन कहैं सुनायी । सबही हंसा सुनो चितलायी ॥ जैसी देह सवॉरी हंसा । तैसी लेहु हमारे पंसा ॥
हंस वचन
चरणाभृतहि तुर्त सो लीना । कैसी महिमा गुरु की कीना ॥
हंस सुजनजन वचन
कितने पान शिष होये पायी । कौन वस्तु तुम पान चढ़ायी ॥ जैसी वस्तु संसार चढ़ावै । वैसी देह इहाँ सो पावै ॥ इहाँ मोती वहाँ हीरा लैहो । तेहि सम रूप देह सो पैहो ॥ जैसी सवॉरे देह तुम दासा । वैसे लोक करो तुम वासा ॥ जिन वहि अवसर देह बनायी । मंजुल करी मैं बैठक पाई ॥ द्वादश सहस सुर हंसनको रूपा । बैठे हंस दीप सम भूपा ॥ गो चढ़ाय पान जिन लीन्हा । पुछुप दीप तिन हंसा चीन्हा ॥ आठ हजार सुरज परकासू । सब आनन्द होय सुख बासू ॥ वृषभ चढ़ाय पान जो पावे । मंजु लोकमहैं हंस सो जावे ॥ दश सहस सूर छवि छाजे । बैठे हंसा राज विराजे ॥ हीरा मोती लै पान जो पावे । उदय द्रौप मैं हंसा जावे ॥ तेहि हंस मैं सुरज की जोती । झलके रोम मैं जैसे मोती ॥ वस्तर देहकै देह बनावे । सो हंसा सुख सागर पावे ॥ वह तो ज्ञान द्रौप मैं जावैं । चार सुरज ज्योति तिन पावैं ॥ पैसा धातु बर्तन लायी । सुख सागरमें ध्यान लगायी ॥ पैहैं सो षोडश भानु सरूपा । बसे सो हंसा द्रौप समीपा ॥ तीन से बत्तिस जिन देहबनाये । आपन आपने द्रौप सिधाये ॥ पैसठ हंस पहुंचे निज ठाई । जिन तो इल्म फकीरी पाई ॥ कहै सुजन जन सुनो रे भाई । धनि धनि तुमरी अधिककमाई ॥ तुम्हरी सरवर कोउ न कीन्हा । तुम तो गुरुको वश करलीन्हा ॥
सब हंसोंको लेकर ज्ञानीजीका सत्यपुरुषके सन्मुख जाना और सत्यपुरुषकी प्रसन्नता
( ५४ )
जगजीवनबोध
तन मन धनकी कौन चलायी । तुम तो आपा दिय विसरायी॥ इन सब हंसन देह बनायी । तुम तो देही गुन विसरायी ॥ जो तुम कहो करौं मैं सोई । तुमरी सरवर नाहीं कोई ॥ सुरति तुम्हारी अधिक सहाई । सतगुरु तुमरे प्राण समायी ॥ यह वस्तु तुम कैसे चीन्हा । कैसे गुरुको वश करि लीन्हा ॥ कैसे तन आशा विसरायी । कैसे इल्म फकीरी पायी ॥ सब हंसनकी देह बनाऊँ । ताको तैसो दीप मिलाऊँ ॥ सतगुरु वशि करि राखे पासा । सुनो हंस मुँहि तुमरी आशा ॥ सदा सतगुरु हंस सनेही । तुम आर्पित सतगुरुकी देही ॥ सदा करै सतगुरु की पूजा । तुमसा हंस न देखा दूजा ॥
हंस वचन
हंस कहे सुन पुरुष पुराना । हम कहैं जानै जीव अजाना ॥ हम तो हते भवजल के माहीं । महा अन्ध कछु सूझत नाहीं ॥ तब समरथ गुरु आनिचिताया । बूढत देखि उबारन आया ॥ जो गुरु कहा सोई हम कीन्हा । एक गुरु विलु और न चीन्हा ॥ तिनसों पूछ कीन कर जोरी । समरथ मानो विन्ती मोरी ॥ हम नहीं चाहें लोक औ द्रीपा । सदा रहैं गुरु चरण समीपा ॥ तब गुरु कहो सुनो रे भाई । सर्व ज्ञान का मूल बताई ॥ हमरे संग रहा जो चाहो । नौतम सुरति कि देह बनाओ ॥ और सकल झूठ कर जानो । एक गुरु हम सांचे मानो ॥ तन मन धन सो बदला कीना । तब गुरु इल्म फकीरी दीना ॥ तब गुरु आपा दिया मिटायी । देहीको गुण दियो विसरायी ॥ पान इकोत्तर से हम पाये । पानपान हम देह बनाये ॥ लोक द्रीप हम कछु न चाहा । हमको सतगुरु दर्शक लाहा ॥ हंसा सुरति गुरुकी कीन्हा । स्वरूप सहित गुरुदर्शन दीन्हा ॥ सब ही हंस धरेउ गुरु पाऊ । करि बन्दगि सब सीस नवाऊ ॥
बोधसागर
( ५५ )
सतगुरु वचन
सतगुरु कहै हंस सुनु बाता । कहाँ वे जीव तुम्हारे साथा ॥
हंस सुजनजन वचन
हंस सुजन मिलि अंक लगाये । कहो हंस कस कीन कमाये ॥
सतगुरु वचन
इनकी मैं का कहूं बड़ाई । ये तो सब निज हंसा आई ॥ निश्चय बात हमारी मानी । काया माया खाकै जानी ॥ सतगुरु हंसको लोक चढ़ायी । सहस्र अठासी द्रौप दिखायी ॥ जेहि जेहि हंस सवारी काया । द्रौप द्रौप सब दृष्टि बताया ॥ देखो हंस कह सब अस्थाना । देखो द्रौप सबही मन माना ॥ सबहीं हंस करे पछतावा । यह गतिहम वहां नाही पावा ॥ लै हंसनको पहुँचे तहँवा । महापुरुष विराजे जहँवा ॥
साखी-द्रौप वर्नन कह कहौं, सबै मनोरथ काज ।
सब द्रौपनते न्यार है, सत्यपुरुष को राज ॥
चौपाई
जब हंसनको ले पहुँचाये । तब सतपुरुष उठि कंठ लगाये ॥ जब ही पुरुष अंक भरि लीना । पारस देह सब हंसन कीना ॥
पुरुष वचन
कहै पुरुष ज्ञानी भल आये । इतने हंस कवन विधि लाये ॥
ज्ञानी वचन
ये तब जानो पुरुष पुराना । मैं केहि मुख सों करौं बखाना ॥ चार हजार सातसों बावन पाये । एते हंस दरश तुव आये ॥ सबही आये लोक मैझारा । दुइ सै रोके धरम वटपारा ॥ कौल किया पुनि गये भुलायी । पांजी द्वार धरम पर जायी ॥ मान सरोवर केते रहाये । उनको देही नाहि बनाये ॥
ग्रन्थसार
( ५६ )
जगजीवनबोध
और द्वीपन सब कीन बसारा । जैसी हंसन देह सँवारा ॥ इन तन मन सो बदला कीना । शिष्य होय इन वस्तुहि लीना ॥ जो सब सुना है ग्रन्थन नामा । सोई सब कीना इन कासा ॥ एकोत्तरसै पान इन पावा । नौ तम सुरती देह बनावा ॥ नेह कीन घर रहै जग मारी । काया के गुण दिया बिसारी ॥ कसनी किसि सोतन बदले चीन्हा । गुरुको इन सब वशकरि लीन्हा ॥ जीवत मृतक होय रहे जगमाहीं । जासै दरस तुम्हारा पाहीं ॥ सुनिके पुरुष हरष बहु कीना । फिर फिर हंस अंक भर लीना ॥ कहा देउ तोहि हंस बडाई । तुमतोको अमर लोक चलि आई ॥ अरध सिंहासन आसन पाये । सब हंसन शिर छत्र धराये ॥ हर्षित वदन औ बहुत हुलासा । सदा रहो तुम हमरे पास ॥ बैठयो महा पुरुष दरवारा । कोटिन सूर हंस उजियारा ॥ अमृत फलका करो अहारा । धन्य हंस बडभाग तुम्हारा ॥
पुरुष वचन-ज्ञानीप्रति
ज्ञानी फेर जाओ संसारा । पृथ्वी जाय करो विस्तारा ॥ सबसों कहियो यहि उपदेशा । सब ही चलो पुरुषके देशा ॥ साखी-कहै कबीर सुख अति धनो, पूर्ण प्रेम विलास । यह सब जीव चितावनि, जगजीवन परकाश ॥
इति श्रीबोसागरांतर्गत जगजीवनबोध-
नामक पंचमस्तत्रंगः समाप्तः
श्रीग्रन्थ जगजीवनबोध समाप्त
परिशिष्ट भाग
ग्रन्थसार
संसारमें जन्म लेनाही दुःखके महासागरमें पड़ना है । जन्मही शोकका सागर और भयका पहाड़ है जन्मही अनेक कर्मोंका घर,
बोधसागर
( ५७ )
पातककी खान और कालके दुःख देनेका स्थान है। जन्म कुविद्या का फल, लोभका कमल और ज्ञानका आवरण है। जन्म ही जीवका बन्धन, मृत्युका कारण और अन्त जंजालोंके मूल है। जन्म ही सांचे सुखका छल, चिंताका जंगल और वासनाओंका विस्तार है। जीवकी मिथ्या दशा, कल्पनाका भण्डार और ममतारूपी डाकिनीका लीला स्थान जन्म ही है। मायाकी लीलाकी रंगभूमि, तमोगुणकी गहरी और भयानक कूप और जीवको मोक्षमार्गसे भटकानेका जड़ जन्म ही है। जीवको मिथ्या देहाभिमानमें फँसाकर सत्य पदसे अष्ट कर कालके नाना पाशोंमें फसानेवाला जन्मके सिवाय दूसरा कौन है ? यदि जन्म न हो तो शरीरकी झूठी ममतामें पड़ा हुआ यह जीव मिथ्या विषय-वासनामें लगकर अपने सत्य ज्ञानस्वरूपको भूलकर मिथ्या आशा और झूठी तृष्णामें फँसकर क्यों कालका चारा बने। यदि जीव शरीरके साथ सम्बद्ध न होता तो इसे नाना प्रकारकी विपत्ति और संकटमें पड़कर दुःख उठानेकी क्या आवश्यकता थी ? जन्म लेनेवाले शरीरका मूल विचार करनेपर इस शरीर ऐसी अपवित्र वस्तु कोई भी नहीं मिलती। रजोदर्शनवाली स्त्रीके मासिकस्त्रावके पश्चात् बचे हुए और पिताके शरीरसे निकलते हुए अपवित्र वीर्य द्वारा इस शरीरकी उत्पत्ति है। जब ऐसी अपवित्र वस्तुओंके संयोगसे यह शरीर बना है तब इसमें पवित्रताका कहाँ पता है। स्त्रीके रक्तके औटाने पर इस शरीरका लोथडा बनता है यद्यपि ऊपरसे देखनेमें अपवित्र जनोंको यह सुन्दर देख पड़ता है तथापि भीतर तो वैसेही घृणित नरकका थैला बना हुआ है, फिर यह शरीर कैसा देख पड़ता है, जैसे चमड़े भिगोनेका चमारका कुण्ड हो। चमारका कुण्ड तो
( ५८ )
जगजीवनबोध
धोनेसे शुद्ध भी हो जाता है, किन्तु इसे नित्य प्रति धोने पर भी न इसकी दुर्गन्धि जाती है न इसमें पवित्रता आती है ।
हड्डियोंकी ठठरी बनाकर उसमें नस और नाडियोंका बन्धन लगाया है और मेद और मांससे इसे जोडा है, जिस लोहूका नाम ही अशुद्ध है उसी रक्तसे इस शरीरकी जब बनावट है तब इसकी पवित्रताका क्या ठिकाना है ? शरीर दुर्गन्धिसे भरा है क्योंकि अन्दर बाहर मलिन वस्तुओंसे ही इसकी बनावट हुई है । समस्त शरीरमें शिर सबसे श्रेष्ठ कहा जाता है, किन्तु उसमें भी नाकमें से सदा दुर्गन्धि बहा करती है और कान पकनेपर ऐसी दुर्गन्धि निकलती है कि, निकट भी खड़ा नहीं रहा जाता । आंखमेंसे कीचड़ और मुँहमेंसे थूक, लार और दुर्गन्धि निकला करती है । इस प्रकारसे समस्त शरीर अपवित्र और मलिन वस्तुओंसे बना हुआ है ।
उत्तमसे उत्तम पदार्थ भी भोजन कर लेनेपर वह कई घण्टोंही में घृणित मल बन जाता है । निर्मल शुद्ध जल पीनेसे शरीरके संयोग द्वारा वह सूत्र हो जाता है और इन्हीं पदार्थोंसे शरीरका पोषण भी होता है, राजासे प्रजातक महान भक्त, राजासे महान पापी अघकर्मोत्क सबके पेटमें ये अपवित्र पदार्थ भरे हुए हैं और इन अपवित्र पदार्थोंका शरीरसे ऐसा सम्बन्ध है कि यदि कोई इन मलोंको शरीरसे निकाल कर शरीरको शुद्ध करना चाहे तो तुरत ही प्राणी मृत्युको प्राप्त होवे । जिस समयमें यह जीव अपनी वासनाके अनुसार शरीर धारण कर माताके गर्भमें प्रवेश करता है और नव महीनेतक यह शरीर माताके उदरमें रहता है, उसमें नाक मुँह आदि नवों दर्वाजे बन्द होते हैं और जिस समय वायुका तो प्रवेश भी नहीं होता,
बोधसागर
( ५१ )
उस समय में माताके शरीर से जो अपवित्र रक्त निकलता है उसकी गर्मी द्वारा हड्डी और मांस जलता है। ऊपरसे चमड़ेकी थैली न होने के कारण बालकका मांससमय शरीर माताके तीखे चरपरे आदि पदार्थोंके सेवनसे महान कष्टित होता है। गर्भके ऊपर एक सपेद २ चमड़ा लपेटा होता है और गर्भ मलमूत्र के नरक कुण्डके निकटही होता है तथा उसकी नाभिमें एक नली लगी होती है जिसके द्वारा गर्भका पोषण होता है। वात पित्त तथा विषा आदि अनेक अपवित्र पदार्थोंसे और नाना प्रकारके पेट के कीड़ोंके नाक तथा मुहँके पास फिरनेपर बालकका मन चबराता है। इस प्रकारसे अनेक असंख्य कष्टमें नव महीना तक कैद हुये जीवको अत्यन्त कष्ट और दुःखके कारण इसे प्रभु सदगुरुका स्मरण आता है तब उस समय अत्यन्त विनीत भावसे प्रार्थना करता है कि, 'हे सदगुरु! हे परमात्मन्! यदि इस बार कृपा करके मुझे इस कष्टमें से छुटकारा दे तो मैं अपने आत्माके कल्याणके मार्गको धारण कर फिरसे ऐसे कष्टमें आने से छुटकारा कर लूँगा।' इसही प्रकार से अनेक समयतक प्रार्थना करते करते प्रभुकी कृपासे समय पूरा होनेपर माताके पेट में पीड़ा आरम्भ होती है। उस समयमें मुँह नाक और मस्तिष्क जो श्वासके मार्ग हैं। मांसके टुकड़ोंसे एकदम बन्द होजाते हैं, श्वासोच्छासका द्वार बन्द होते ही बालकको मूर्च्छा आती है और जीव अचेतनावस्थामें तड़फड़ाने लगता है। तड़फड़ानेमें यदि शरीर आड़ा टेढ़ा हुआ तब बाहरवाले लोग गर्भको काटकर निकालनेकी सम्मति देते हैं। यदि किसी युक्तिसे ठीक हुआ तो हुआ नहीं तो हाथ डालकर बालकका जोई अंग हाथआया उसीको काटना आरम्भ करते हैं और क्रमशः काटकर उसे बाहर निकालते हैं। बहुत बार ऐसा होता है कि, स्वयम् बालक तो मरता ही है उसके
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जगजीवनबोध
साथ २ माताका भी प्राण नाश होता है । यदि पूर्व पुण्यकी सहायतासे शरीर सीधाही बाहर निकला तब प्रथम शिर बाहर आता है, मार्ग छोटा होनेसे धाई सिरको पकड़कर बल पूर्वक बाहर खींचती है इसमें भी कभी २ ऐसा होता है कि शिर बाहर निकला और थड उसमें ही अटक जाता है । उस दशामें बालककी मृत्यु होती है और संयोगसे माता बच गयी तो बालकके शरीरको काटकर बाहर निकालते हैं । यदि पुण्यवश सकल शरीर बाहर निकल आया और बालक जीता जागता रहा तो बाहर आतेही बाहर के पवन लगनेसे बालकको इतना कष्ट होता है कि, मानो सहस्र बिछुवोंने एकसाही डंक मारा है ऐसे असह्य कष्ट के कारण कभी २ बालक अचेत हो जाता है तब उसको चेत दिलाने के लिये नाना प्रकारके उपाय किये जाते हैं । कभी बालक को च्यूंटी काटकर जगाते हैं और कभी २ शस्त्रका प्रयोग भी करना पड़ता है । और जब बालक रोता है तब सबको आनन्द आता है इस प्रकार से महान कष्ट भोगकर यह जीव जब बाहर निकल कर संसारके पदार्थोंको देखता है और नाना प्रकार के मोहमें फँसानेवाली मायाके जाल माता पितादि की प्यारी प्यारी बातों को सुनता है तब गर्भ के कष्ट और प्रार्थना तथा वचन को भूलकर मोह माया में फँसता है और जगतके नाना प्रकारके क्षणिक सुख और दुःखमें पड़ा हुआ यह, साहिब और अपने स्वरूप को भूलकर भी कभी याद नहीं करता । इस प्रकारका गर्भका दुःख सर्वे प्राणीको होता है, वही कथा इस ग्रन्थमें जगजीवन ( जीव ) के बहाने से ग्रन्थकारने लिखकर सबको उपदेश दिया है ।
इति
भारतपथिक कवीरपंथी-
स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित
श्री-गुरुडबोध
मुद्रक एवं प्रकाशकः
खेमराज श्रीकृष्णदास,
अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, बम्बई-४०० ००४
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Physique
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सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
श्रीगणेशाय नमः
श्रीगणेशाय नमः