कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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अनुरागसागर
ब्रह्माको जगानेके लिये अधाका गायत्रीको युक्ति बताना
सो०-अद्या आयसु पाइ, गायत्री तब ध्यान महँ ॥ निज कर परसेउ जाय,ब्रह्मा तबहीं जागिहै ॥२४॥ गायत्री पुनि कीन्ह तैसी । माता युक्ति बताई जैसी ॥ गायत्री तब चित्त लगाई । चरणकमल कहँ परसेउ जाई॥
ब्रह्माका जागकर गायत्रीपर क्रोध करना
ब्रह्मा जाग ध्यान मन डोला ॥ व्याकुल भयो वचन तब बोला ॥ कवन अहै पापिन अपराधी । कहा छुड़ायहु मोरि समाधी ॥ शाप देहुँ तोकहँ मैं जानी । पिताध्यानमोहिखण्डचोआनी
गायत्री वचन ब्रह्माप्रति
कहि गायत्री मोहिन पापा । बृक्षि लेहु तब देहहु शापा ॥ कहाँ तोहिसो सांची बाता । तोहि लेन पठयी तुव माता ॥ चलहु वेगि जननिलावहुबारे । तुम विन रचना को विस्तारे ॥
ब्रह्मावचन गायत्रीप्रति
ब्रह्मा कहे कौन विधि जाऊँ । पितादरश अजहुँ नहि पाऊँ ॥
गायत्रीवचन ब्रह्माप्रति
गायत्री कह दरशन पैहो । बेगि चलहु नहि तो पछते हो ॥
ब्रह्माका गायत्रीको साक्षी देनेको कहना और गायत्रीका
ब्रह्मासे रति करनेकी बात कहना
ब्रह्मा कहै देहु तुम साखी । परस्यो सीस देख मैं आंखी ॥ ऐसे कहो मातु समुझायी । तोतुम्हरे सङ्ग हम चलिजायी ॥
गायत्रीवचन ब्रह्माप्रति
कह गायत्री सुन श्रुति धारी । हम नहीं मिथ्या बचन उचारी ॥ जो मम स्वारथ पुरवहु भाई । तो हम मिथ्या कहब बनाई ॥
ब्रह्मावचन गायत्रीप्रति
कह ब्रह्मा नहि लखी कहानी । कहौँ बुँझाय प्रगटकी बानी ॥