भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 167

अवुरागसागर

( ३९ )

ब्रह्मादि शिवसनकादिनारदको उन बचि भागहो ॥ सुनुधरमनिविरलाबच शब्द सतसो लागि हो ॥२८॥ सो-० सत्य शब्द परताप, कालकला व्यापै नहीं ॥ निकट न आवै पाप, मनवच कर्म जो पदगहे ॥२९॥

शाप देदेने पर अधाका पश्चाताप और निरंजनके डरसे डरना । छन्द

शाप तीनोंको दैलियो मन माहीं तब पछतावई ॥ कस करहि मोहि निरंजनापल छमा मोहि नआवई ॥

निरंजनका अधाको शाप देना

आकाशबानी तबै भयी यहू काह कीन भवानिया ॥ उत्पत्तिकारणतोहिपठाई कहा चरित यह ठानिया ॥ सो-० नीचहि ऊच सिताय, बदल मोहि सोपावई ॥ द्वापर युग जब आय तुमहिं पञ्च भर्तार हो ॥३०॥

अधाका निडर होना । कबीर वचन धर्मदासप्रति

शाप ओयल जब सुनेउ भवानी । मनसन गुने कहा नहि बानी ॥ ओयल प्रभाव शाप हम पाया । अब कहा करब निरंजनराया ॥ तोरे वस परी हम आई । जस चाहौ तस करौ मितार्ई ॥

विष्णुका गौरसे श्याम होने का कारण अधावचन विष्णुप्रति

पुनि कहि माता विष्णु दुलारा । सुनहु पुत्र इकवचन हमारा ॥ सत्य सत्य तुम कहौ बुझाई । पितुपद परसन जब गै भाई ॥ प्रथमहु तो तुम गौर शरीरा । कारण कौन श्याम भये धीरा ॥

विष्णुवचन अधा प्रति

आज्ञा पाय हम तत्काला । पितुपद परसन चले पताला ॥ अक्षत पुहुप लीन्ह करमाहां । चले पताल पंथ मग जाहां ॥ पहुँचि शेष नाग पहुँ गयऊ । विषके तेज हम अलसयऊ ॥