भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 734, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 734

( १५४ )

लक्ष्मणबोध

तब राजा कहे सुन गोरख आयी । ऐसा तुम करिहो तैसा पायी ॥ नहि माना गोरख द्वार उघारा । तब सतगुरु एक कला परचारा ॥ भागा गोरख दूर ते भाई । सतगुरु शरण सो बैठा जाई ॥ जगन्नाथ कहे सुनु गोरख आई । योगी हमरो दरश न पाई ॥ यहि औगुन गोरख से भयऊ । ताते योगी दरश न पयऊ ॥ जगन्नाथ राजा सो कहेऊ । अवधिपूर नहीं सो भयऊ ॥ ताते हाथ ठूंट रहि जायी । दिन सोलह बीते नहि पायी ॥ देह सम्पूर्ण होन न पायी । झगरू पण्डहि को समझायी ॥ झगरू पण्डा शिष्य भयो आयी । केतिक दिन ऐसे बिति जायी ॥ तब जगन्नाथ सो भेंट करायी । जगन्नाथ कह सुनो जी आयी ॥ तुम्हरी हमरी भली बनि आयी । तब हम तेहि कहा समुझायी ॥ कहैं कवीर सुनो त्रिभुवन राई । सिंचल द्वीप हम देखन जाई ॥

साखी-सिंचल द्विप हम जावहीं, जगन्नाथ चित लाउ ।

समुन्दरका भय मेटिके, अटल राज कराउ ॥

इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससम्भावे जगन्नाथ-

स्थापनवर्णनो नाम सप्तमस्तत्रंगः

इति ग्रन्थ लक्ष्मणबोध

संक्षेप सार

मोर

ग्रन्थपर साधारण वृद्धि

यद्यपि इस ग्रन्थमें लक्ष्मणजीको भी बोध करनेकी प्रसंगसे थोड़ी चर्चा आगयी है किन्तु प्रधानतः इस ग्रन्थमें वर्णन जगन्नाथजी की स्थापनाका है । इस जगन्नाथकी स्थापनाके विषयमें भी अनेक ग्रन्थोंमें बहुत मत भेद हैं इस कारण और-और ग्रन्थोंका भी इस विषयमें वर्णन थोडासा लिख देता हूँ ।