कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 735, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( १५५ )
जब श्रीकृष्णजीका स्वधाम गमन हुआ तब बौद्धावतार हुआ। और जब जगन्नाथजीका अवतार हुआ उस समय उड़ीसा देशका राजा इन्द्रदमन था। उस राजा इन्द्रदमनको कृष्णजीने स्वप्न दिखलाया कि तू मेरा मन्दिर उठा। जगन्नाथजीकी आज्ञानुसार राजा मन्दिर बनाने लगा, जब मन्दिर तैयार होगया तब समुद्र आया और मन्दिरको ढहाकर लेगया और भूमि बराबर कर गया। इसके उपरान्त फिर राजाने मन्दिर बनवाना आरंभ किया फिर उसकी वही दशा हुई। फिर बनवाया फिर वही दशा होगयी। इस प्रकार कई बेर राजाने मन्दिर बनवानेकी इच्छा की पर समुद्रने उसको तैयार होने नहीं दिया तब राजाने दुःखी होकर उस इमारत का बनवाना ही छोड़ दिया इस समय कबीर साहबने अपने वचनका स्मरण किया जैसा कि निरंजनगोष्ठि आदि ग्रन्थोंमें लिखा है कि, निरंजनने कबीर साहबसे निवेदन किया था कि जब मेरा जगन्नाथका अवतार होगा तब समुद्र मेरे मंदिरको तोड़ेगा, उस समय आप कृपा करके समुद्रको हटा देवें और मेरे मंदिरको स्थापित करा देवें तब आप वचनबद्ध हुए थे कि, मैं तुम्हारा मंदिर स्थापित करा दूँगा और समुद्रको हटा दूँगा। उसी वचनके अनुसार कबीर साहब उड़ीसा देशमें आन उतरे और राजा इन्द्रदमनके पास जाकर बोले, कि हे राजा! तुम जगन्नाथके मंदिरको बनाओ तब राजाने निवेदन किया कि, महाराज समुद्र मंदिरको बनाने नहीं देता मेरा कुछ वश नहीं चलता, जब मैं बनाता हूँ तब वह आकर ढहा जाता है मैं क्या कहूँ ? कबीर साहबने कहा कि राजा ! मैं इसी प्रयोजनसे आया हूँ अब प्रसन्नतापूर्वक ठाकुरद्वारा बनवाओ