कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानसागर
( ९ )
चौपाई
कन्या सों अस कीन्ह अन्याई । सहजसों लियो जो तुरत बुझाई ॥ यहै चरित पुरुष जब देखा । दीन्हें शाप सो कहों विशेखा ॥ सवा लक्ष जीव करौ आहारा । तऊ न ऊदर भैर तुम्हारा ॥ सुमिरन कूर्म पुरुष को कीन्हा । अहहो पुरुष धरम सिरछीन्हा ॥ तुव आज्ञा मैं अंड जो दीन्हा । धर्मराज काहे सिर लीन्हा ॥ सुनत वचन प्रभु बहुत रिसाने । जोगजीत तबही उतपाने ॥ आज्ञा भई तुम वेग सिधारी । धर्मराज कहैं मार निकारी ॥ आज्ञा मांग चले तब ज्ञानी । धर्मराय सो बातैं ठानी ॥ अरे पापी तू पुरुष को चोरा । भागहु वेग कहा सुन मोरा ॥ सुनतहि कोध भये धर्म धीरा । जोग जीतके सन्मुख भीरा ॥ जोग जीत तबहीं फटकारा । जाय रहौ तब लोक ते न्यारा ॥ जोग संतायन चल भये जबही । धर्म धीर आयौ पुनि तबही ॥ बार अनेक युद्ध जिहि कीन्हा । मारे न मरत बहुत बल कीन्हा ॥
धर्मराज वचन
तब मैं हतौ पुरुष के ठाऊँ । तब नहिं सुन्यो तुम्हारौ नाऊँ ॥ को तुम हौ सो मोहि बताऊ । सहज भाव तुम फेर बनाऊ ॥
ज्ञानी वचन
धर्म धीर सों कहा बखानी । मर्दन धर्म नाम मम ज्ञानी ॥ जब तुम कीन्ह चार का काजा । तातैं पुरुष मोहि उपराजा ॥ मारहुँ तोहि कहौ सतभाऊ । अष्टांगी तैं कामिन खाऊ ॥ सुनतहि कोध धरम पर जरेऊ । जरत हुताश मनहु घृत परेऊ ॥
साखी-करहि युद्ध बहु भांति सों, कैसेहु क्षमा न होय । क्षण एक लरचौ सहज तुम, करु उपाय अब सोय ॥