BharatKosha
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished2,136 pages

Page 633 of 2136

Read in context
Page 633

बोधसागर

( ५३ )

चौपाई-सुजनजन वचन

हंस सुजन जन कहैं सुनायी । सबही हंसा सुनो चितलायी ॥ जैसी देह सवॉरी हंसा । तैसी लेहु हमारे पंसा ॥

हंस वचन

चरणाभृतहि तुर्त सो लीना । कैसी महिमा गुरु की कीना ॥

हंस सुजनजन वचन

कितने पान शिष होये पायी । कौन वस्तु तुम पान चढ़ायी ॥ जैसी वस्तु संसार चढ़ावै । वैसी देह इहाँ सो पावै ॥ इहाँ मोती वहाँ हीरा लैहो । तेहि सम रूप देह सो पैहो ॥ जैसी सवॉरे देह तुम दासा । वैसे लोक करो तुम वासा ॥ जिन वहि अवसर देह बनायी । मंजुल करी मैं बैठक पाई ॥ द्वादश सहस सुर हंसनको रूपा । बैठे हंस दीप सम भूपा ॥ गो चढ़ाय पान जिन लीन्हा । पुछुप दीप तिन हंसा चीन्हा ॥ आठ हजार सुरज परकासू । सब आनन्द होय सुख बासू ॥ वृषभ चढ़ाय पान जो पावे । मंजु लोकमहैं हंस सो जावे ॥ दश सहस सूर छवि छाजे । बैठे हंसा राज विराजे ॥ हीरा मोती लै पान जो पावे । उदय द्रौप मैं हंसा जावे ॥ तेहि हंस मैं सुरज की जोती । झलके रोम मैं जैसे मोती ॥ वस्तर देहकै देह बनावे । सो हंसा सुख सागर पावे ॥ वह तो ज्ञान द्रौप मैं जावैं । चार सुरज ज्योति तिन पावैं ॥ पैसा धातु बर्तन लायी । सुख सागरमें ध्यान लगायी ॥ पैहैं सो षोडश भानु सरूपा । बसे सो हंसा द्रौप समीपा ॥ तीन से बत्तिस जिन देहबनाये । आपन आपने द्रौप सिधाये ॥ पैसठ हंस पहुंचे निज ठाई । जिन तो इल्म फकीरी पाई ॥ कहै सुजन जन सुनो रे भाई । धनि धनि तुमरी अधिककमाई ॥ तुम्हरी सरवर कोउ न कीन्हा । तुम तो गुरुको वश करलीन्हा ॥