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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

मातृका न्यास वर्णन

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४२६ श्रीकालिका पुराण बताऊँ। जिसकी योनि के शिलाबल से आयोग से लौह आदि धातुयें सुवर्ण हो जाया करती हैं। जो मानव इसके मण्डल में स्नान करके और एक बार भी प्रदक्षिणा करता है वह परम निर्वाण को प्राप्त किया करता है । मातृका न्यास वर्णन श्री भगवान् ने कहा-हे वेताल भैरव! अब तुम मातृका न्यास का श्रवण करो जिसके द्वारा मनुष्य भी किए जाने से देवत्व को प्राप्त कर लिया करता है । वाग् और ब्रह्माणी प्रमुख हैं जिनमें ऐसी देवियाँ मातृका पर कीर्तित की गयी हैं उनके प्रयोग किए हुए मन्त्र और सब व्यञ्जन तथा स्वरों को जो चन्द्र बिन्दु से समन्वित हैं सभी कामनाओं के प्रदान करने वाले हैं । मातृका मन्त्रों का ऋषि ब्रह्मा ही कहे गए हैं । इनका छन्द गायत्री कहा गया है और इनका देवता सरस्वती देवी हैं । शरीर बुद्धि मुख्य में और सब कामार्थ साधन में विनियोग सनुदृष्ट किया गया है जो मन्त्रों की न्यूनता के पूरण करने में होता है । अकार के समकादि वेग है जो प्रथम कहा गया है । वहाँ पर स्थित चन्द्र बिन्दु से संयुक्त उन अक्षरों से बाहर आकर का उसी भाँति उच्चारण करके तथा अंगुष्ठों से नमः, इसको कह करके सबसे प्रथम अंगुष्ठों से मातृका मन्त्र का न्यास करना चाहिए । वे सब चन्द्र बिन्दुओं से युक्त सब ओर से ही करने चाहिए । ह्रस्व इकार से और दीर्घ ईकारान्त्य ‘क’ वर्ग से पूर्व की ही भाँति जिसमें स्वाहा अन्त में हो भली भाँति तर्जनियों में निवास करना चाहिए । एकार जिसके आदि में हो ऐसा वर्ग को और ऐकारान्त से हुम् को अनामिकाओं के जोड़े में हे भैरव! नियत रूप से वहाँ पर न्यास करें । ओंकार जिसके आदि में हो ऐसे पवर्ग को और अशेष को ओंकार वाला तथा वौषट् अन्त में लगाकर कार्य की सिद्धि के लिए कनिष्ठका में न्यास करना चाहिए । अकार जिसके आदि में हो ऐसे यकारादि वर्ग से और ‘क्ष’ के अन्त वाले से तथा ‘अ’ ‘इ’ अन्त वाले बल को

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प्राणियों के पृष्ठों में न्यास करे । शेष भाग में वषट्कार अस्त्र न्यास करना चाहिए । हृदय आदि छः अंगों में पूर्व की ही भाँति क्रम से न्यास करे । अंगुष्ठ जिनके आदि में हो ऐसे उक्त वर्गों से क्रम से उसी प्रकार छहों से करे । फिर उसी प्रकार से पाद, जानु, सक्थि, गुह्य और दोनों पाश्र्वों तथा वस्ती में पूर्व की ही भाँति अक्षरों के द्वारा क्रम से मन्त्रों का न्यास करना चाहिए । दोनों बाहुओं में, दोनों हाथों में, कटि में, नाभि में, जठर में, दोनों स्तनों में उसी प्रकार छहों के द्वारा विन्यास का समाचरण करे । मुख में, चिबुक में गण्ड में, दोनों कानों में, ललाट में, दोनों आँखों में, कक्ष में, षड्वर्गों में पूर्व की ही भाँति न्यास करना चाहिए । रोक कूप में, ब्रह्मरन्ध्र में, गुदा में, दोनों जंघाओं में, नखों में, दोनों हाथों में और पादों में उसी क्रम से पूर्व की ही भाँति समाचरण करना चाहिए । इस रीति से जो श्रेष्ठ मनुष्य मातृकाओं का न्यास करता है वह समस्त यज्ञ पूजाओं में पूत (पवित्र) और योग्य हो जाया करता है । इससे परम श्रेष्ठ मन्त्र कहीं पर भी विद्यमान नहीं है । जो सब कामनाओं का देने वाला, पुण्यमय और चारों वर्गों का प्रदान करने वाला है । वाग्देवता का हृदय में ध्यान करके और सब अक्षरों की मूर्तियों का ध्यान करके तीन बार क्रम युक्त मातृका मन्त्रों से अभिमन्त्रित कर जल का पान करे । वह वाग्मी, पण्डित, श्रीमान् और श्रेष्ठ कवि हो तो जाता है । बुद्ध पुरुष को चाहिए कि पूर्व में चन्द्र बिन्दु से युक्त स्वरों को पढ़े । इसके पीछे केवल समस्त व्यञ्जनों को पढ़ना चाहिए । अकार से आदि लेकर क्षकार के अन्त तक को पूरक श्वासों से पढ़े । जल करतल में लेकर अक्षरों की संख्या को पढ़कर उस जल को अभिमन्त्रित करके प्रथम पूरकों के द्वारा पान करे । द्वितीय को कुम्भकों से तथा तृतीय को रेचकों से करे । इस प्रकार से करके विचक्षण पुरुष जल को पीकर, वह दृढ़ अंगों वाला, पण्डित और पुत्र-पौत्रों से समन्वित हो जाता है । मातृका मन्त्रों से मन्त्रित करके जल को तीनों सन्ध्याओं में पीना चाहिए ।

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४२८ 𑁍 श्रीकालिका पुराण 𑁍 वह कवित्व को प्राप्त हो जाता है तथा जो भी कामों को मातृका मन्त्रों से मन्त्रित करके निरन्तर ऐसा करता है । हे महाभाग! पूरक, कुम्भक, रेचक से जल का पान करना है वह सभी कामनाओं को प्राप्त करके पुत्र-पौत्र की समृद्धि वाला हो जाता है । वह लोक में महाकवि, बलवान् और सत्यविक्रम वाला तथा सर्वत्र वल्लभ होकर अन्त में मोक्ष प्राप्त किया करता है । वह राजा, राजपुत्र और भार्या को मातृका मन्त्र का पान से वश में कर लेता है । न्यास क्रम में क्रम कहा गया है । यहाँ पर ही वर्ग क्रम कहा गया है । अक्षरों के जल का पान करे । जो-जो मन्त्र देवों के, ऋषियों के, राक्षसों के हैं वे सब मन्त्र मातृका तथा देवों से परिपूर्ण है । यह चतुर्वर्गप्रद मातृका मन्त्र कहा जाता है । हे पुत्र! यह अद्भुत मातृका न्यास तुमको बता दिया है । मार्कण्डेय कथन मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-प्रजापति दक्ष की एक पुत्री नाम से सुरभि हुई थी । वह गोओं की माता थी और वह महाभाग सभी लोकों के उपकार करने वाली थी । प्रजापति कश्यप से उसके उदर से एक तनया ने जन्म ग्रहण किया था । नाम से वह रोहिणी थी । वह शुभ्रा और मनुष्यों के सम्पूर्ण कामनाओं का दोहन करने वाली थी । उसमें अतीव तपोधन शुनःशेफ मुनि से जिसने जन्म प्राप्त किया था वह समस्त सुलक्षणों से युक्त कामधेनु, इस नाम से प्रख्यात हुई थी । वह सितमेघ के सदृश थी और चारों वेदों के चरणों वाली थी । वह अपने चारों स्तनों के द्वारा धर्म, अर्थ और कामों के प्रसव करने वाली थी । सुवर्ण के समान शरीर वाली उस कामधेनु ने जो सती थी, बहुत काल के होने पर निर्मिल और परम मनोहर यौवन को प्राप्त किया था । मेरु पर्वत के पृष्ठ भाग पर सञ्चरण करती हुई, चारू स्वरूप वाली, सुन्दर लक्षणों से समन्वित उसको बेताल ने देखा था और उसका सौन्दर्य देखकर बेताल के हृदय में कामवासना समुत्पन्न हो गई थी । उस कामधेनु ने उस बेताल को कामुक जानकर पशु धर्म से स्वयं

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६०८३ श्रीकालिका पुराण ६०८३ ४२९ ही उस चन्द्रशेखर के पुत्र का सेवन किया था। उस भगवान् शंकर के पुत्र ने उस कामधेनु में परम आनन्द की प्राप्ति की थी और उसने भी उससे आनन्द को प्राप्त करके बहुत ही हर्षित हुई थी। उन दोनों में सुरत क्रीड़ा में प्रवृत्त हो जाने पर गर्भ स्थित हो गया था। जब प्रसव काल मै प्राप्त हुआ तो उस समय में उसने महावृष को प्रसूत किया था। वह थोड़े ही समय में सुमहान् वृषभ हो गया था। उसके बहुत बड़ा ककुद था और सुन्दर सींगों से वह युक्त था। उत्क्षेपण करके विचलित दोनों कानों वाला था और बहुत लम्बी उसकी पूँछ थी। वह ककुद् से, सीगों से और कानों से सितअभ्र के ही समान था। विचलन करते हुए उस शृंगों से सिताचल की ही भाँति देवों के द्वारा वह देखा गया था। बेताल ने उसका नाम शृंग, यही रखा था। यह शृंग बहुत ज्ञानवान् था और उसने ईश्वर की समाराधना की थी। वह भगवान् शम्भु भी उस पर परम तुष्ट हो गए थे और उसने अभीष्ट वरदान दिया था। भगवान् हर ने उसे वृषभ शरीर वाला बनाकर अपना वाहन बना लिया था। वह बल वाला और चिरायु था तथा पृथ्वी के धारण करने में समर्थ था। शृंग महान् तेज वाला था और वह प्रभु का केतु भी हो गया था क्योंकि शृंग होकर वह महान् आत्मा वाले भगवान् शंकर का प्यारा हो गया था। अतएव शृंग, इस ख्याति को प्राप्त हो गया था। वह शृंग महादेव के ध्यान में समासक्त हो जाने पर कभी-कभी वरुण के गृह में गमन किया करता था। वहाँ पर भी सुरभि की जो पुत्रियाँ थी वे रूप और यौवन से सम्पन्न थी। ये उनके साथ खूबसूरत रूप धारण करके उनका सेवन किया करता था। वरुण के गृह में सभी लक्षणों से युक्त सुता उत्पन्न हुई थी। जो बहुत थीं इनकी सूति-प्रसूतियों से यह जगत् व्याप्त हो रहा है और उनसे यज्ञ प्रवृत्त हुआ करता है। आज्य से देव सन्तुष्ट हुआ करते हैं और आज्य में ही यज्ञ प्रतिष्ठित होते हैं। यह सम्पूर्ण स्थावर और जंगम अर्थात् चर अचर जगत् यज्ञाधान होता है। वह आज्य गौओं के अधीन है, इससे सभी कुछ गौ में ही स्थित

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४३० ६०३ श्रीकालिका पुराण ६०३ रहा करता है । हे द्विजोत्तमोँ! यह सम्पूर्ण विश्व गौओं के ही अधीन रहा करता है । वे सब गौएँ बेताल के वंश में ही होने वाली हैं और सदा सबकी प्रिय होती हैं । जो महात्मा बेताल के इस चरित्र का नित्य श्रवण किया करता है और इनके वंशों से जन्म को सुनता है वह सब सुखी और बलवान् हुआ करता है । उस पुरुष की न तो गौयें नष्ट होती हैं और न कभी वैभव ही विनष्ट हुआ करता है । उस पुरुष की न तो गौयें नष्ट होती हैं और न कभी वैभव ही विनष्ट हुआ करते हैं । उस पुरुष को भूत पिशाच आदि भी कभी नहीं देखा करते हैं । बेताल स्वयं ही उनकी निरन्तर रक्षा किया करता है । हे विप्रो! यह मैंने आपको बता दिया है जिस तरह से बेताल और भैरव! दोनों ने जन्म लिया था और पुत्रों को जन्म ग्रहण कराया था । अब तो आपके सभी संशय विच्छन्न हो गये होंगे । जिस तरह से कालिका देवी ने शंकर को मोहित किया था और जैसे शरीर के अर्ध में उत्पन्न हुई थी और भगवान् शुम्भ ने जैसे-जैसे किया था, यह सब कह दिया है । जो मनुष्य कालिका के लिए आपको नमस्कार है, ऐसा स्वयं कहता है उस पुरुष के हाथ में ही मुक्ति तो स्थित रहा करती है और तीनों का अर्थात् धर्म, अर्थ काम का वर्ग मुक्ति के ही वश में रहने वाला इनका अनुगामी हुआ करता है । इस रीति से परम पुण्यमय कालिका नाम वाला पुराण आपको वर्णित करके सुना दिया है । जो मन्त्रों से परिपूर्ण हैं, शुद्ध ज्ञान को देने वाला, कामनाओं का दाता परम श्रेष्ठ है । हे द्विजगणों! यह लोक में और वेदों में भी परम गोपनीय है । इसके लिए देवगन्धर्व और सिद्ध आदि सभी सदा स्पृहा किया करते हैं । इस पर उत्तम कालिका नामक पुराणामृत को महात्मा वसिष्ठ ने मुझसे ही सुना था और अध्ययन किया था । यह कामरूप सुरालय में भी इसी कारण से गुप्त है । हे महर्षिगणों! उसको इस समय में प्रकट करके ही भली भाँति आख्यात किया है । आप लोग भी इसको नहीं देवें यह सर्वदा लोकों में गोपन करने योग्य है । जो शठ हो, चञ्चल चित्त वाला हो, नास्तिक हो, अविजित आत्मा वाला हो, भक्ति और श्रद्धा से रहित हो उसको

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ൠ श्रीकालिका पुराण ൠ ४३१ इसे कभी भी नहीं देना चाहिए । जो एक बार भी इस कालिका पुराण का पाठ करता है वह सभी कामनाओं को प्राप्त करके अमृतत्व अर्थात् देवत्व को प्राप्त किया करता है । जिससे मन्दिर में यह लिखा हुआ उत्तम पुराण सदा स्थित रहता है, हे द्विजो! उसको कभी विघ्न नहीं होता जो पुराण सदा स्थित रहता है, हे द्विजो! उसको कभी विघ्न नहीं होता । जो प्रतिदिन इसका गोपनीय अध्ययन करता है जे कि यह परम तन्त्र है । हे द्विज श्रेष्ठों! उसने यहाँ पर ही सम्पूर्ण वेदों क अध्ययन कर लिया है । इस कारण से इससे अधिक अन्य कुछ भी नहीं है । विलक्षण पुरुष इसके अध्ययन से कृतकृत्य हो जाता है । इसके अध्ययन तथा श्रवण करने वाला पुरुष परम सुखी तथा लोक में बलवान् और दीर्घ आयु वाली भी हो जाता है । जो निरन्तर लोक का पालन करता है और अन्त में विनाश करने वाला है । यह सम्पूर्ण भ्रम या अभ्रम से युक्त है मेरा ही स्वरूप है, अतएव उसके लिए नमस्कार है । योगियों के हृदय में जिसका प्रपञ्च प्रधान पुरुष है, जो पुराणों के अधिपति भगबान् विष्णु और वह भगवान् शिव आप सबके ऊपर प्रसन्न हों । जो उग्र हेतु है, पुराण पुरुष है, जो शाश्वत तथा सनातन रूप ईश्वर है, जो पुराणों का करने वाला और वेदों तथा पुराणों के द्वारा जानने के योग्य है उस पुराण शेष के लिए मैं स्तवन करता हूँ और अभिवादन करता हूँ । जो इस प्रकार से समस्त जगत् का विशेष रूप से स्मरण किया करती है, जो मधुरिपु को भी मोह कर देने वाली हैं, जिसका स्वरूप रमा है और शिवा के स्वरूप से जो भगवान् शंकर का रमण कराया करती है माया आपके विभव को और शुभों को वितरित करे । ॥ श्रीकालिका पुराण समाप्त ॥

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४३२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 काली का अर्थ तत्त्व काली का शाब्दिक अर्थ है-कालः अर्थात् 'शिवः तस्य पत्नि काली ।' अथवा 'काली' शिव की पत्नी का नाम है । ये काली (भगवती) आदि और अन्त रहित अजन्मा और पूरे चराचर विश्व की स्वामिनी है । ये काल को उत्पन्न करने वाली तथा स्वयं उसे भी खा जाने वाली है । साकार-उपासकों और साधकों की सुविधा के लिए तन्त्र आदि शास्त्रों में इन्हीं का निराकार काली के गुण, ध्यान तथा स्वरूप आदि का वर्णन है । पौराणिक काली (मार्कण्डेय पुराण या दुर्गा सप्तशती में वर्णित) जो अम्बिका के ललाट से उत्पन्न हुई वह इन आद्या काली से भिन्न हैं । वे श्री दुर्गा जी के स्वरूपों से एक स्वरूप हैं । ॐ 卐 ॐ काली साधना मन्त्र क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं दक्षिण कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा । दक्षिण कालिका का यह बाईस अक्षर का मन्त्र सब मन्त्रों में प्रधान माना गया है । इस मन्त्र के वर्णों का अर्थ इस प्रकार है- जलरूपी 'ककार' मोक्ष को प्रदान करने वाला है तथा अग्नि रूप 'रेफ' सर्वतेजोमयी है । 'क्रीं क्रीं क्रीं- ये तीनों बीज सृष्टि, स्थिति एवं लय को करने वाले हैं ।' 'बिन्दु' निष्कल ब्रह्मरूप है, अतः कैवल्य फल को देने वाला है । हूं हूं- ये दोनों बीज शब्दज्ञान को देने वाले हैं । ह्रीं ह्रीं- ये दोनों बीज सृष्टि, स्थिति एवं लय को करने वाले हैं। 'दक्षिण कालिके'-इस सम्बोधन से देवी का सामीप्य प्राप्त होता है तथा 'स्वाहा'-यह मन्त्र संसार का मातृ स्वरूप है तथा समस्त पापों को क्षय करने वाला है । ॐ 卐 ॐ

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௵ श्रीकालिका पुराण ௵ ४३३ काली साधना मन्त्र भद्रकाली-मन्त्र अब भद्रकाली के मन्त्र का वर्णन किया जाता है । वह इस प्रकार है- क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा । यह बीस वर्ण वाला भद्रकाली का मन्त्र साधक को चतुर्वर्ग फल प्रदान करता है । 卐 ॐ 卐 श्मशान काली-मन्त्र इस श्मशान काली के मन्त्र का वर्णन किया जाता है । वह इस प्रकार है- क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं श्मशान काली क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा । इस इक्कीस अक्षर के मन्त्र से श्मशान काली की पूजा करनी चाहिए । यह भी चतुर्वर्गदायक है । 卐 ॐ 卐 महाकाली-मन्त्र अब महाकाली के मन्त्र का वर्णन किया जाता है । वह इस प्रकार है- क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं महाकाली क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा । इस बीस अक्षर के मन्त्र द्वारा महाकाली का पूजन करना चाहिए । यह भी चतुर्वर्गफलदायक है । 卐 ॐ 卐 काली गायत्री मन्त्र ॐ कालिकायै विद्महे श्मशानवासिन्यै धीमहि तन्नो घोरे प्रचोदयात् ।

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४३४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ पूजन विधि-इन देवियों में पूजन में यह विशेषता है कि यन्त्र के भूपुर में इन्द्रादि दिक्पाल तथा वज्रादि अस्त्रं, भूपुर के चतुर्द्वार में विष्णु, शिव, सूर्य और गणेश; भूगृह में लोकपाल, बाह्य में देवी के अस्त्र तथा भूपुर के चारों ओर पूर्वादि क्रम से विष्णु, शिव, सूर्य और गणेश का पूजन करना चाहिए । इसी प्रकार यन्त्र में ही गुह्यकाली, भद्रकाली, श्मशान काली-इन चारों देवियों का पूजन करना चाहिए । इनका यन्त्र सम्बन्धी कोई भेद नहीं है । सबके यन्त्र एक समान हैं । इनके यन्त्र का स्वरूप नीचे बताया गया है । यन्त्र का स्वरूप-उक्त चारों देवियों में यन्त्र को अंकित करने की विधि यह है कि पहले त्रिकोण, फिर षट्कोण तथा नवकोण अंकित करके उसके बाहर तीन वृत्त तथा केशर सहित अष्टदल पद्म अंकित करे । फिर तीन भूपुर वाला एक चुरस्त्रद्वार संयुक्त योनि मण्डल का स्वरूप अंकित करना चाहिए । यह 'त्रिपञ्चार यन्त्र' सब यन्त्रों से प्रसिद्ध हैं । 卐 ॐ 卐 गुह्य काली के मन्त्र अब 'गुह्यकाली' के मन्त्र तथा पूजा-प्रणाली का वर्णन किया जाता है । यह महाविद्या त्रिभुवन में अत्यन्त दुर्लभ तथा धर्मार्थ काम मोक्ष को देने वाली, महापापों को नष्ट करने वाली, समस्त सिद्धियों की प्रदाता, सनातनी तथा भोग को देने वाली प्रसिद्ध है । क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं गुह्ये कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा । नाम-भेद से यह मन्त्र गुह्यकाली तथा दक्षिणा काली दोनों की ही आराधना में प्रयुक्त होता है । यह मन्त्र समस्त सिद्धियों को देने वाला है । गुह्यकाली के अन्य मन्त्र इस प्रकार हैं- क्रीं हूं ह्रीं गुह्य कालिके क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा । इस षोडशाक्षर मन्त्र द्वारा आराधना करने पर साधक को चतुर्वर्ग की प्राप्ति होती है ।

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ४३५ क्रीं हूं ह्रीं गुह्ये कालिके हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा । यह चतुर्दशाक्षर मन्त्र सब तन्त्रों में गुप्त है । इस मन्त्र में 'गुह्ये' के स्थान पर 'दक्षिणे' पद जोड़ने से पंचदशाक्षरी दक्षिण कालिका का मन्त्र होता है । यथा- क्रीं हूं ह्रीं दक्षिणे कालिके हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा । गुह्यकाली का चतुर्दशाक्षर मन्त्र इस प्रकार है- हूं ह्रीं गुह्ये कालिके क्रीं क्रीं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा । गुह्य काली का नवाक्षर मन्त्र इस प्रकार है- क्रीं गुह्ये कालिके क्रीं स्वाहा । इसी मन्त्र में 'गुह्ये' के स्थान पर दक्षिणे शब्द जोड़ने पर दक्षिणा कालिका का दशाक्षर मन्त्र बनता है । यथा- क्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं स्वाहा । इस सब मन्त्रों की साधना में दक्षिण कालिका की पूजा-पद्धति में लिखे नियमानुसार न्यासादि करके पूजा तथा बलि करनी चाहिए । इसके बलिदान में यह विशेषता है कि पूर्व नियमानुसार बलि उत्सर्ग करके निम्नलिखित मन्त्र द्वारा बलि को निवेदित करना चाहिए । ऐं ह्रीं ऐह्येहि जगन्मातर्जगतां जननि गृहण बलिं सिद्धिं देहि देहि शत्रु क्षयं कुरु कुरु हूं हूं ह्रीं ह्रीं फट् ॐ कालिकायै नमः फट् स्वाहा । यदि गुह्यकाली के लिए बलि निवेदित करनी हो तो इस मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए- ऐह्येहि गुह्य कालिके मम बलिं गृह् गृह् मम शत्रुन नाशय नाशय खादय स्फुर स्फुर छिन्धि छिन्धि सिद्धिं देहि हूं फट् स्वाहा । आसन का मन्त्र भी अन्य प्रकार से है । यथा- ॐ सदाशिव महाप्रेताय गुह्य कल्पासनाय नमः ।

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यहाँ पृष्ठ पर मुद्रित पाठ का लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

४३६ ൠ श्रीकालिका पुराणे ൠ श्रीकाली क्षमापराधस्तोत्रम् प्राग्देहस्थो यदाऽहं तव चरणयुंग नाशितो नार्च्चितोऽहं । तेनाद्या कीर्त्तिवर्गैर्जठरजदहने वर्द्ध्यमानो बलिष्ठैः ॥ क्षिप्त्वा जन्मान्तरान्नः पुनरिह भविता क्वाश्रयः क्वापि सेवा । क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥ बाल्ये बालाभिलाषैर्जडित-जडमतिर्बाललीलाप्रसक्तो । न त्वां जानामि मातः कलिकलुषहरां भोगमोक्षप्रदात्रीम् ॥ नाचारो नैव पूजा न च यजनकथा न स्मृतिर्नैव सेवा । क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥ प्राप्तोऽहं यौवनञ्चेद्विषधरसदृशैरिन्द्रियैर्दष्टगात्रो । नष्टप्रज्ञः परस्त्रीपरधनहरणे सर्व्वदा साभिलाषः ॥ त्वत्पादाम्भोजयुग्मं क्षणमपि मनसा न स्मृतोऽहं कदापि । क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥ प्रौढो भिक्षाभिलाषी सुतदुहितुकलत्रार्थमन्नादिचेष्टाः । क्व प्राप्स्ये कुत्र यामीत्यनुदिनमनिशञ्चिन्तया मग्नदेहः ॥ नो ते ध्यानं न चास्था न च भजनविधिर्नामसंकीर्त्तनं वा । क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥ वृद्धत्वे बुद्धिहीनः कृशविवशतनुश्श्वासकासातिसारैः । कर्म्मानर्होऽक्षिहीनः प्रगलितदशनः क्षुत्पिासाभिभूतः ॥ पश्चात्तापेन दग्धो मरणमनुदिनन्ध्येयमात्रन्नचान्यत् । क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥ कृत्वा स्नानं दिनादौ क्वचिदपि सलिलं नो कृतं नैव पुष्पं । ते नैवेद्यादिकञ्च क्वचिदपि न कृतं नापि भावो न भक्तिः ॥ न न्यासो नैव पूजा न च गुण कथनं नापि चाऽर्च्चा कृता ते । क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥ जानामि त्वां न चाहं भवभयहरणीं सर्व्वसिद्धिप्रदात्रीं । नित्यानन्दोदयाढ्यान्त्रितयगुणमयीं नित्यशुद्धोदयाढ्याम् ॥ मिथ्या कर्म्माभिलाषैरनुदिनमभितः पीडितो दुःखसङ्घैः । क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥ कालाभ्रां श्यामलाङ्गीं विगलितचिकुरां खड्गमुण्डाभिरामां । त्रास्त्राणेष्टदात्रीम् कुणपगणशिरो मालिनीं दीर्घनेत्राम् ॥ संसारस्यैकसारं भवजननहरां भावितो भावनाभिः । क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥ ब्रह्माविष्णुस्तथेशः परिणमति सदा त्वत्पदाम्भोजयुग्मम् । भाग्याभावान्न चाहम्भवजननि भवतपादयुग्मं भजामि ॥

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ४३५ नित्यं लोभप्रलोभैः कृतवशमतिः कामुकस्त्वाम्प्रयाचे । क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥ रागद्वेषैः प्रमत्तः कलुषयुततनुः कामनाभोगलुब्धः । कार्याऽकार्य्याऽविचारी कुलमतिरहितः कौलसङ्घैर्विहीनः ॥ क्व ध्यानं ते क्व चार्च्चा क्व च मनुजपनैव किञ्चित् कृतोऽहम् । क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥ रोगी दुःखी दरिद्रः परवशकृपणः पांशुलः पापचेताः । निद्रालस्यप्रसक्तः सुजठरभरणे व्याकुलः कल्पितात्मा ॥ किं ते पूजाविधानं त्वयि क्वच नुमतिः क्वानुरागः क्व चास्था । क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥ मिथ्या व्यामोहरागैः परिवृतमनसः क्लेशसङ्गान्त्वितस्य । क्षुन्निद्रौघान्वितस्य स्मरणविरहिणः पापकर्मप्रवृत्तेः ॥ दारिद्र्यस्य क्व धर्मः क्व च जननि रुचिः क्व स्थितित्साधुसङ्गैः । क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥ मातस्तातस्य देहाज्जनननिजठरगः संस्थितस्त्वद्दृशेऽहम् । त्वं हन्त्री कारयित्री करणगुणमयी कर्महेतुस्वरूपा ॥ त्वम्बुद्धिश्चित्तसंस्थाप्यहमतिभवती सर्व्वमेतत्क्षमस्व । क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥ त्वम्भूमिस्त्वं जलञ्च त्वमसि हुतवहस्त्वं जगद्वायुरूपा । त्वं चाकाशम्मनश्च प्रकृतिरसि महत्पूर्व्विका पूर्व्वपूर्व्वा ॥ आत्मा त्वं चासि मातः ! परमसि भवती त्वत्परं नैव किञ्चित् । क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥ त्वं काली त्वं च तारा त्वमसि गिरिसुता सुन्दरी भैरवी त्वं । त्वं दुर्गा छिन्नमस्ता त्वमसि च भुवना त्वं हि लक्ष्मीः शिवा त्वम् ॥ धूमा मातङ्गिनी त्वं त्वमसि च बगला मङ्गलादिस्तवाख्या । क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥ स्तोत्रेणानेन देवीम्परिणमति जनो यः सदा भक्तियुक्तो । दुष्कृत्यादुर्ग्संऽम्परितरति शतं विघ्नता नाशमेति ॥ नाधिव्यांधिः कदाचिद्भवति यदि पुनस्स्र्व्वदा सापराधः । सर्वं तत्कामरूपे त्रिभुवनजननि क्षामये पुत्रबुद्ध्या ॥ ज्ञाता वक्ता कवीशो भवति धनपतिर्दानशीलो दयात्मा । निःपापी निष्कलङ्की कुलपतिकुशलः सत्यवाग्धार्मिकश्च ॥ नित्यानन्दो दयाद्यः पशुगणविमुखस्सत्यथाचारशीलः । संसाराब्धि सुखेन प्रतरति गिरिजापादयुग्मावलम्बात् ॥ ॥ इति श्रीकाली-अपराधक्षमापन-स्तोत्रम् ॥

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४३८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ श्रीकाली के सम्बन्ध में प्रयुक्त होनेवाले शब्दों का यथार्थ रूप श्मशानवासिनी-भगवती को श्मशानवासिनी भी कहा गया है । श्मशान का जो व्यावहारिक अर्थ होता है (जहाँ शव जलाये जाते हों) वह अर्थ यहाँ नहीं होता । श्मशान का भाव इस प्रकार जानना चाहिए- पंच महाभूत चिद्ब्रह्म में लय होते हैं । आद्याकाली चिद्ब्रह्म स्वरूपा हैं। लय होने के स्थान को श्मशान कहा जाता है । इस प्रकार जिस स्थान पर पंच महाभूत लय हों, वही श्मशान है और भगवती वहीं निवास करती हैं । सांसारिक काम, क्रोध, रागादि जिस स्थान पर भस्म होते हैं वह भी श्मशान है । इनके भस्म होने का स्थान मन है । जो मन काम, क्रोध, रागादि से रहित हो उसी श्मशान के समान मन में भगवती काली निवास करती हैं। अतःकाली के उपासकों को चाहिए कि वे अपने हृदय में काली को स्थापित करने से पूर्व उसे श्मशान के समान अर्थात् समस्त रागों से मुक्त बना लें । श्मशान में चिता-श्मशान में चिता के जलाने का अर्थ है-हृदय में ज्ञानाग्नि का निरन्तर बने रहना । अतः साधक को अपने श्मशानवत् हृदय में ज्ञानरूपी चिता को सदा जलाये रहना चाहिए । भगवती का आसन-भगवती का आसन शव का कहा गया है । इसका अर्थ यह है कि जब शिव से शक्ति अलग होती है 'शिव' शव रह जाता है । उस स्थिति में भगवती उसके ऊपर अपना आसन करती हैं अर्थात् उस पर अपनी कृपा करती हैं और उसे स्वयं में मिलाकर उसे भौतिक संसार से मुक्त कर देती हैं ।

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൵ श्रीकालिका पुराण ൴ ४३९ मुक्तकेशी—काली के बाल बिखरे हुए हैं—इसका आशय यह है कि भगवती केश-विन्यास आदि विलास के विकारों से मुक्त हैं । त्रिनेत्रा—इसका अर्थ है कि सूर्य, चन्द्र और अग्नि ये तीनों ही भगवती के नेत्र स्वरूप हैं । अथवा भगवती तीनों कालों भूत, भविष्य तथा वर्तमान को जाननेवाली हैं । बालावतंसा—काली ने अपने कानों में बालक का शव पहना है । इसका मतलब है कि वे बालस्वरूप निर्विकार साधक को अपने कानों के पास रखती हैं या बालक के समान सच्चे साधक के समीप ही उनके कान रहते हैं । प्रकटितरदना—श्री काली के दाँत-बाहर निकले हैं और वे उनसे बाहर निकली जीभ को दबाये हैं । इसका आशय है कि भगवती रजोगुण तथा तमोगुण रूपी जीभ को सत्वगुण रूपी उज्ज्वलता से दबाये हुए हैं । पीनपयोधरा—श्रीकाली के स्तन बड़े तथा उन्नत हैं—अर्थात् भगवती अपने स्तनों से तीनों लोकों को अमृतमय दूध रूपी आहार देकर उनका पालन करती हैं यानी वे अपने साधकों को अमरत्वरूपी दूध पान कराती हैं । चिर यौवना—इसका आशय है कि देवी में अवस्था (उम्र) सम्बन्धी कोई परिवर्तन नहीं होता । वे सदा युवावस्था में रहती हैं, वे अपरिवर्तनशीला हैं । करालवदना—काली का रूप भयानक काला है । इसका आशय है कि देवी का स्वरूप देखकर सामान्यजन भयभीत होते हैं । लेकिन जिनके चित्त में देवी का वास है या जो माँ काली के भक्त हैं, उन्हें डरने का कोई कारण नहीं । क्योंकि माँ काली के भक्तों से काल (यम) भी भयभीत रहता है ।

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४४० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ श्रीमद् शंकराचार्य विरचित- श्री कालिकाष्टक ध्यान गलद्रक्तमुण्डावलीकण्ठमाला, महोघोरराव सुदंष्ट्रा कराला। विवस्त्रा श्मशानालया मुक्तकेशी, महाकालकामाकुला कालिकेयम् ॥१॥ वे भगवती काली अपने कण्ठ में रक्त टपकते हुए मुण्डों की माला को पहने हुए हैं, वे अत्यन्त घोर शब्द कर रहीं हैं, उनकी सुन्दर दाढ़ें भयानक हैं, वे वस्त्रहीनां हैं, वे श्मशान में निवास करती हैं, उनके केश बिखरे हुए हैं और वे महाकाल के साथ कामातुर हो रही हैं ॥१॥ भुजेवामयुग्मे शिरोऽसि दधाना, वरं दक्षयुग्मेभयं वै तथैव। सुमध्याऽपि तुङ्गस्तना भरनम्रा, लसद्रक्तसृक्कद्वया सुस्मितास्या ॥२॥ वे अपने दोनों बायें हाथों में नरमुण्ड तथा खड्ग को धारण किये हैं तथा दोनों दाएँ हाथों में वर तथा अभय मुद्रा लिए हैं। वे सुन्दर कटि वाली, उत्तुङ्गस्तनों के भार से झुकी हुई सी, दो रक्तमालाओं से सुशोभित तथा मधुर-मुस्कान से युक्त हैं ॥२॥ शवद्वन्द्वकर्णावतंसा सुकेशी, लसत्प्रेतपाणिं प्रयुक्तैककांची। शवाकारमञ्चाधिरूढा शिवाभि- श्वतुर्दिक्षु शब्दायमानाऽभिरेजे ॥३॥ भावार्थ-उनके कानों में दो शवरूपी आभूषण हैं, उनके केश सुन्दर हैं, वे शवों के हाथों से सुशोभित करधनी को धारण किये हुए हैं, वे शवरूपी मंच पर आरूढ़ हैं तथा उनके चारों ओर शिवाओं का शब्द गूँज रहा है ॥३॥

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❧ श्रीकालिका पुराण ❧ ४४१ स्तुति विरंच्यादिदेवास्त्रयस्ते गुणास्त्रीन्, समाराध्य कालीं प्रधाना बभूवुः । अनादिं सुरादिं मखादिं भवादिं, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥१॥ भावार्थ-हे देवि ! तुम्हारे त्रिगुणात्मक रूप से उत्पन्न ब्रह्मा आदि तीनों देवता तुम्हारी ही आराधना करके प्रधान हुए हैं। तुम्हारा स्वरूप अनादि, सुरादि तथा विश्व का मूलभूत है, उसे देवता भी नहीं जानते हैं ॥१॥ जगन्मोहिनीम् तु वाग्वादिनीम्, सुहृद्पोषिणी शत्रुसंहारणीयम् । वचःस्तम्भनीयम् किमुच्चाटनीयम्, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥२॥ भावार्थ-तुम्हारी मूर्ति संसार को मोहित करनेवाली, शत्रुओं का संहार करनेवाली, वचन का स्तम्भन करनेवाली तथा दुष्टों का उच्चाटन करनेवाली है, तुम्हारे इस स्वरूप को देवता भी नहीं जानते हैं ॥२॥ इयं स्वर्गदात्री पुनः कल्पवल्ली, मनोजास्तु कामन्यथार्थ प्रकुर्यात् । तथा ते कृतार्था भवन्तीति नित्यं, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥३॥ भावार्थ-ये मूर्ति स्वर्ग को देनेवाली, कल्पलता के समान और भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करनेवाली है, जिससे वे सदैव कृतार्थ बने रहते हैं। तुम्हारे इस स्वरूप को देवता भी नहीं जानते हैं ॥३॥ सुरापानमत्ता सुभक्तानुरक्ता, लसत्पूतचित्ते सदाविर्भवस्ते । जपध्यानं पूजासुधाधौतपं‌का, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥४॥

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४४२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ भावार्थ-तुम सुरापान से मस्त रहती हो तथा अपने भक्तों पर कृपा बिखेरती हो, जप-ध्यान-पूजा रूपी अमृत से निर्मल तथा पवित्र हृदय से तुम्हारा अविर्भाव सुशोभित होता है। तुम्हारे इस स्वरूप को देखता भी नहीं जानते हैं ॥४॥ चिदानन्दकन्दं हंसन्मन्दमन्दं, शरच्चन्द्र कोटिप्रभापुञ्जबिम्बम्। मुनीनां कवीनां हृदि द्योतमानं, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥५॥ भावार्थ-तुम चिदानन्द की मूल, मन्द-मन्द मुस्काने वाली, करोड़ों शरद् चन्द्रमाओं की प्रभा से युक्त मुख वाली एवं मुनियों तथा कवियों के हृदय को प्रकाशित करने वाली हो। तुम्हारे इस स्वरूप को देवता भी नहीं जानते हैं। महामेघकाली सुरक्ताऽपि शुभ्रा, कदाचिद्विचित्रा कृतिर्योगमाया। न बाला न वृद्धा न कामातुराऽपि, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥६॥ भावार्थ-तुम महामेघों के समान कृष्णवर्णा, रक्तवर्णा तथा शुभ्रवर्णा भी हो। तुम कभी-कभी विचित्र आकृति को धारण करने वाली योगमाया हो। तुम न बाला हो, न वृद्धा हो और न कामातुरा हो। तुम्हारे स्वरूप को देवता भी नहीं जानते हैं ॥६॥ क्षमास्वापराधं महागुप्तभावं, मयालोकमध्ये प्रकाशीकृतं यत्। तव ध्यानपूतेन चापल्यभावात्, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥७॥ भावार्थ-मैंने तुम्हारे ध्यान से पवित्र चापल्यभाव से तुम्हारे अत्यन्त गुप्त भाव को जो संसार में प्रकट कर दिया है, उस अपराध के लिए तुम मुझे क्षमा करो। तुम्हारे इस स्वरूप को देखता भी नहीं जानते हैं ॥७॥

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ४४३ यदि ध्यान युक्तं पठेद्यो मनुष्य,- स्तदा सर्वलोके विशालो भवेच्च । गृहे चाष्टसिद्धिर्मृते चापि मुक्तिः स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥८॥ भावार्थ-जो मनुष्य ध्यान युक्त होकर इस अष्टक का पाठ करता है, वह सम्पूर्ण संसार में उच्चपद प्राप्त करता है । उसके घर में आठों सिद्धियाँ बनी रहती हैं तथा मृत्यु के पश्चात् मुक्ति प्राप्त होती है । हे देवि ! तुम्हारे इस स्वरूप को देवता भी नहीं जानते हैं ॥८॥ ॥ इति श्री मच्छंकराचार्य विरचितं श्रीकालिकाष्टम् समाप्तम् ॥ श्री काली स्तुति या कालिका रोगहरा सुवंद्या वैश्यैः समस्तै व्यवहारदक्षैः । जनैर्जनानां भयहारिणी च सा देवमाता मयि सौख्यदात्री ॥१॥ या माया प्रकृतिः शक्तिश्चण्डमुण्ड विमर्दिनी । सा पूज्या सर्वदेवैश्च ह्यस्माकं वरदाभव ॥२॥ विश्वेश्वरी त्वं परिपासि विश्वं विश्वात्मिका धारयसीति विश्वम् । विश्वेशवन्द्याभवती भवन्ति विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः ॥३॥ देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य । प्रसीद विश्वेश्वरी पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ॥४॥ या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः पापत्मनां कृतिधियां हृदयेषु बुद्धि । श्रद्धां सतां कुलजन प्रभवश्य लज्जा तां त्वां नताः स्मरपरिपालय देवि विश्वम् ॥५॥

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४४४ ❡ श्रीकालिका पुराण ❡ श्रीकाली चालीसा दोहा-जय काली जगदम्ब जय, हरनि ओघ अघ पुंज । वास करहु निज दास के, निशदिन हृदय-निकुंज ॥ जयति कपाली कालिका, कंकाली सुख दानि । कृपा करहु वरदायिनी, निज सेवक अनुमानि ॥ जय जय जय काली कंकाली । जय कपालिनी, जयति कराली ॥ शंकर प्रिया, अपर्णा, अम्बा । जय कपर्दिनी, जय जगदम्बा ॥ आर्या, हला, अम्बिका, माया । कात्यायनी उमा जगजाया ॥ गिरिजा गौरी दुर्गा चण्डी । दाक्षाणायिनी शाम्भवी प्रचंडी ॥ पार्वती मंगला भवानी । विश्वकारिणी सती मृडानी ॥ सर्वमंगल शैल नन्दिनी । हेमवती तुम जगत वन्दिनी ॥ ब्रह्माचारिणी कालरात्रि जय । महारात्रि जय मोहरात्रि जय ॥ तुम त्रिमूर्ति रोहिणी कालिका । कूष्माण्डा कार्तिकी चण्डिका ॥ तारा भुवनेश्वरी अनन्या । तुम्हीं छिन्नमस्ता शुचिधन्या ॥ धूमावती षोडशी माता । बगला मातंगी विख्याता ॥ तुम भैरवी मातु तुम कमला । रक्तदन्तिका कीरति अमला ॥ शाकम्भरी कौशिकी भीमा । महातमा अग जग की सीमा ॥ चन्द्रघण्टिका तुम सावित्री । ब्रह्मवादिनी माँ गायत्री ॥ रुद्राणी तुम कृष्ण पिंगला । अग्निज्वाला तुम सर्वमंगला ॥ मेघस्वना तपस्विनि योगिनी । सहस्त्राक्षि तुम अगजन भोगिनी ॥ जलोदरी .सरस्वती डाकिनी । त्रिदशेश्वरी अजेय लाकिनी ॥ पुष्टितुष्टि धृति स्मृति शिव दूती । कामाक्षी लज्जा आहूती ॥ महोदरी कामाक्षि हारिणी । विनायकी श्रुति महा शाकिनी ॥ अजा कर्ममोही ब्रह्मणी । धात्री बाराही शर्वाणी ॥ स्कन्द मातु तुम सिंह वाहिनी । मातु सुभद्रा रहहु दाहिनी ॥ नाम रूप गुण अमित तुम्हारे । शेष शारदा बरणत हारे ॥ तनु छवि श्यामवर्ण तव माता । नाम कालिका जग विख्याता ॥ अष्टदश तव भुजा मनोहर । तिनमहं अस्त्र विराजत सुंदर ॥ शंख चक्र अरु गदा सुहावन । परिघ भुशुण्डी घण्टा पावन ॥ शूल बज्र धनुबाण उठाये । निशिचर कुल सब मारि गिराये ॥ शुंभ निशुंभ दैत्य संहारे । रक्तबीज के प्राण निकारे ॥

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൏ श्रीकालिका पुराण ൏ ४४५ चौंसठ योगिनी नाचत संगा। मद्यपान कीन्हेउ रण गंगा ॥ कटि किंकिणी मधुर नूपुर धुनि। दैत्यवंश कांपत जेहि सुनि-सुनि ॥ कर खप्पर त्रिशूल भयकारी। अहै सदा सन्तन सुखकारी ॥ शव आरूढ़ नृत्य तुम साजा। बाजत मृदंग भेरि के बाजा ॥ रक्त पान अरिदल को कीन्हा। प्राण तजेउ जो तुम्हिं न चीन्हा ॥ लपलपति जिह्वा तव माता। भक्तन सुख दुष्टन दुःख दाता ॥ लसत भाल सेंदुर को टीको। बिखरे केश रूप अति नीको ॥ मुंडमाल गल अतिशय सोहद। भुजामाल किंकण मनमोहत ॥ प्रलय नृत्य तुम करहु भवानी। जगदम्बा कहि वेद बखानी ॥ तुम मशान वासिनी कराला। भजत तुरत काटहु भवजाला ॥ बावन शक्ति पीठ तव सुन्दर। जहाँ बिराजत विविध रूप धर ॥ विन्ध्यवासिनी कहूँ बड़ाई। कहूँ कालिका रूप सुहाई ॥ शाकम्भरी बनी कहूँ ज्वाला। महिषासुर मर्दिनी कराला ॥ कामाख्या तव नाम मनोहर। पुजवहिं मनोकामना द्रुततर ॥ चंड मुंड वध छिन महं करेउ। देवन के उर आनन्द भरेउ ॥ सर्व व्यापिनी तुम माँ तारा। अरिदल दलन लेहु अवतारा ॥ खलबल मचत सुनत हुँकारी। अगजग व्यापक देह तुम्हारी ॥ तुम विराट रूपा गुणखानी। विश्व स्वरूपा तुम महारानी ॥ उत्पति स्थिति लय तुम्हरे कारण। करहु दास के दोष निवारण ॥ माँ उर वास करहू तुम अंबा। सदा दीन जन की अवलंबा ॥ तुम्हरो ध्यान धरै जो कोई। ता कहँ भीति कतहूँ नहिं होई ॥ विश्वरूप तुम आदि भवानी। महिमा वेद पुराण बखानी ॥ अति अपार तव नाम प्रभावा। जपत न रहत रंच दुःख दावा ॥ महाकालिका जय कल्याणी। जयति सदा सेवक सुखदानी ॥ तुम अनन्त औदार्य विभूषण। कीजिये कृपा क्षमिये सब दूषण ॥ दास जानि निज दया दिखाबहु। सुत अनुमानित सहित अपनावहु ॥ जननी तुम सेवक प्रति पाली। करहु कृपा सब विधि माँ काली ॥ पाठ करै चालीसा जोई। तापर कृपा तुम्हारी होई ॥ दोहा:- जय तारा जय दक्षिणा, कलावती सुखमूल । शरणागत 'राजेश' है, रहहु सदा अनुकूल ॥ ॥ इति काली चालीसा समाप्त ॥