कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context( २६६ ) यात यूय भुव देवा स्वाशावतरणैरता । राजानौ मरुदेवापी स्थापयिष्याम्यह भुवि ॥ ७ ॥ पुण्डरीकाक्ष भगवान् ने देवताओ की दुःख-गाथा सुनकर ब्रह्माजी से कहा- हे विभो ! मै शम्भल ग्राम मे विष्णुयश के यहाँ, उनकी पत्नी सुमति के गर्भ से उत्पन्न हूँगा ॥४॥ हे ब्रह्मन् ! हम चारो भाई मिलकर उस कलि को नष्ट कर डालेगे । अब सभी देवताओ को भी अपने-अपने बाँधवो सहित पृथिवी पर अवतार लेना है ॥५॥ मेरी प्रिया लक्ष्मी सिंहल द्वीप मे महाराज बृहद्रथ की रानी कौमुदी के गर्भ से उत्पन्न होगी, इसका नाम पद्मा होगा ॥६॥ मरु और देवापि नामक दो राजाओ को भी पृथिवी पर उत्पन्न करुँगा । हे देवगण ! अब तुम भी शीघ्रही अपने-अपने अंश के सहित भूमण्डल पर अवतार धारण करो ॥७॥ पुन कृतयुग कृत्वा धर्मान्संस्थाप्य पूर्ववत् । कलिक्याल सनिरस्य प्रयास्ये स्वालय विभौ ॥ ८ ॥ इत्युदीरितमाकर्ण्य ब्रह्मा देवगणैर्वृत । जगाम ब्रह्मसदन देवाश्च त्रिदिव ययु ॥ ६ ॥ महिमा स्वस्य भगवान्निजजन्मकृतोद्यमः । विप्रर्षे ! शम्भलग्राममाविवेश परात्मकः ॥ १० ॥ हे विभो ! जब पृथिवी पर सत्ययुग का पुन आविर्भाव कर दूँगा और धर्म का पूर्ववत् स्थापन तथा कलिकाल रूपी नाग को नष्ट कर डालूँगा, तब पुन अपने इस लोक मे आ जाऊँगा ॥८॥ देवताओ से घिरे हुए ब्रह्माजी ने भगवान् की यह आज्ञा सुनकर ब्रह्मलोक को प्रस्थान किया और सब देवता अपने स्वर्ग लोक को चले गये ॥६॥ हे ऋषियो ! अपनी महिमा से महिमान्वित भगवान् विष्णु इस प्रकार शम्बल ग्राम मे स्वय अवतार धारण करने के लिए प्रविष्ट हुए ॥१०॥ सुमतयां विष्णु यशसा गर्भमाधत्त वैष्णवम् । ग्रह-नक्षत्र-राश्यादि-सेवित-श्रीपदाम्बुजम् ॥ ११ ॥