कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context( २६७ ) सरित्समुद्रा गिरयो लोका सस्थाणुजङ्गमा । सहर्षा ऋषयो देवा जाते विष्णौ जगत्पतौ ॥ १२ ॥ बभूवु सर्वसत्वानामानन्दा विविधाश्रया । नृत्यन्ति पितरो हृष्टास्तुष्टा देवा जगुर्यश ॥ १३ ॥ चक्रुर्वाद्यानि गन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणा ॥ १४ ॥ द्वादश्या शुक्लपक्षस्य माधवे मासि माधव । जात ददृशतु पुत्र पितरौ हृष्टमानसौ ॥ १५ ॥ भगवान् श्रीहरि विष्णुयश के द्वारा उनकी पत्नी के गर्भ में प्रविष्ट होकर भ्रूण रूप हुए ।।११।। यह जानकर कि विष्णु पृथिवी पर आ गये है, सभी सरिता, समुद्र, पर्वत, स्थावर जगम प्राणी, ऋषि- गण और देवगण आदि सभी प्रसन्न हो उठे ।।१२। तथा सभी जीव विभिन्न प्रकार से हर्ष प्रकट करने लगे, पितर नाचने लगे और देवता प्रभु के गुणगान मे तत्पर हुए ।।१३।। गधर्व बाजे बजाने और अप्सराये नृत्य करने लगी ।।१४।। वैशाख शुक्ला द्वादशी के दिन भगवान् ने अवतार लिया । उनको प्रकट होते हुए देखकर माता-पिता पुलकित हो उठे ।।१५।। धातुमाता महाषष्ठी नाभिच्छेत्री तदम्बिका । गङ्गोदकक्लेदमोक्षा सावित्री मार्जनोद्यता ॥ १६ ॥ तस्य विष्णोरनन्तस्य वसुधाऽधात्पय सुधाम् । मातृका माङ्गल्यवच कृष्णजन्मदिने तथा ॥ १७ ॥ ब्रह्मा तदुपधार्याशि स्वाशग् प्राह सेवकम् । याही त मृतिकागार गत्वा विष्णु प्रबोधय ॥ १८ ॥ चतुर्भुजमिद रूपं देवानापि दुर्लभम् । त्यक्त्वा मानुषवद्रूप कुरुनाथ ! विचारितम् ॥ १६ ॥ इति ब्रह्मवचा श्रुत्वा पवन सुरभि सुखम् । सशीत प्राह तरमा ब्रह्मणो वचनाहत ॥ २० ॥