कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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होते हुए शुक्लपक्ष के चन्द्रमा के समान प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त होने लगे ॥३०॥ कल्केर्ज्येष्ठास्त्रय शूरा कवि प्राज्ञ सुमन्त्रका । पितृमातृप्रियकरा गुरुविप्रप्रतिष्ठिता ॥ ३१ ॥ कल्केरशा पुरो जाता. साधवो धर्म्मतत्परा । गार्ग्यभर्ग्यविशालाद्या ज्ञातयस्तदनुव्रता ॥ ३२ ॥ विशाखयूप भूपाल पालितास्तापवर्जिता । ब्राह्मणा कल्किमालोक्य परा प्रीतिमुपागता. ॥ ३३ ॥ ततो विष्णुयशा पुत्र धीर सर्वगुणाकरम् । कल्कि कमलपत्राक्ष प्रोवाच पठनाहृतम् ॥ ३४ ॥ तात ते ब्रह्मसस्कार यज्ञसूत्रमनुत्तमम् । सावित्री वाचयिष्यामि ततो वेदान्पठिष्यसि ॥ ३५ ॥ भगवान् कल्कि के उत्पन्न होने से पहले माता-पिता को प्रिय, गुरु-ब्राह्मण का हित करने वाले इनके तीन भाई और उत्पन्न हो चुके थे । उनके नाम कवि, प्राज्ञ और सुमन्त्रक थे । भगवान् के ही अंश से उनकी जाति मे, उनके अनुगामी, साधु स्वभाव वाले एव धार्मिक प्रवृत्ति वाले गार्ग्य, भर्ग्य और विशाल आदि भगवान् से पहिले ही उत्पन्न हो चुके थे ॥३१-३१॥ विशाखयूप-नरेश द्वारा परिपालित यह सभी ब्राह्मण भगवान् का दर्शन करके सम्पूर्ण पाप-ताप से छूटकर अत्यत हर्षित हुए ॥३३॥ फिर अपने कमलनयन एव सर्वगुण सम्पन्न पुत्र को अध्ययन करने के योग्य वय वाला हुआ देखकर विष्णुयश उनसे बोले ॥३४॥ हे पुत्र ! मै तुम्हारा श्रेष्ठ ब्रह्म सस्कार, उपनयन और सावित्री का श्रवण कराऊँगा, फिर तुम वेदाध्ययन करना ॥३५॥ को वेद का च सावित्री केन सूत्रेण सस्कृताः । ब्राह्मणा विदिता लोक तत्तत्त्व वद तात माम् ॥ ३६ ॥ वेदो हरेर्वाक् सावित्री वेदमाता प्रतिष्ठिता ।