कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context( २७१ ) त्रिगुणञ्च त्रिवृत्सूत्र तेन विप्रा प्रतिष्ठिता ॥ ३७ ॥ दशयज्ञै सस्कृता ये ब्राह्मणा ब्रह्मवादिन । तत्र वेदाश्च लोकाना त्रयाणामिह पोषका ॥ ३८ ॥ यज्ञाध्ययन दानादि तप स्वाध्याय सयम । प्रीणयन्ति हरि भक्त्या वेद तन्त्र विधानत ॥ ३६ ॥ तस्माद्यथोपनयन कर्मणोऽह द्विजै सह । सस्कत्तु बान्धवजनैस्त्वामिच्छामि शुभे दिने ॥ ४० ॥ पिता के वचन सुनकर कल्कि भगवान् ने पूछा—वेद क्या है । सावित्री क्या है । किस सूत्र से सस्कारित पुरुष ब्राह्मण सज्ञक होता है ? हे तात ! यह सब मुझे बताइये ॥३६॥ पिता बोले—वेद भगवान् विष्णु की वाणी है, सावित्री ही प्रतिष्ठा एव वेद-माता है । त्रिगुण-सूत्र को त्रिवृत्ताकार करके धारण करने पर ब्राह्मण नाम से प्रतिष्ठित होता है ॥३७॥ तीनो लोको के पोषक एव दशयज्ञ द्वारा सस्कृत ब्रह्म- वादी जो ब्राह्मण है, उन्ही के पास वेद निवास करते है ॥३८॥ यही दश सस्कार वाले विप्र वेद, तन्त्र और शास्त्रादि के विधान से यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, स्वाध्याय, सयम आदि के सहित भक्ति करते हुए भगवान् को प्रसन्न करते है ॥३६॥ इसी लिए ब्राह्मणो, बाँधवो आदि के सहित किसी शुभ दिन मै तुम्हारा उपनयन सस्कार करना चाहता हू ॥४०॥ के च ते दश सस्कारा ब्राह्मणेषु प्रतिष्ठिता । ब्राह्मणा केन वा विष्णुमर्चयन्ति विधानत ॥ ४१ ॥ ब्रह्मण्या ब्राह्मणाज्जातो गर्भाधानादिसस्कृत । सन्ध्यात्रयेण सावित्री-पूजा-जप-परायणः ॥ ४२ ॥ तपस्वी सत्यवाग्धीरो धर्मात्मा त्राति ससृतिम् । विष्ण्वर्चनमिद ज्ञात्वा सदानन्दमयो द्विज ॥ ४३ ॥ कुत्रास्ते स द्विजो येन तारयत्यखिल जगत् । सन्मार्गेण हरिप्रीणान्कामदोग्धा जगत्त्रये ॥ ४४ ॥