कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextतृतीय अध्याय ततो वस्तु गुरुकुले यान्त कल्किं निरीक्ष्य स । महेन्द्राद्रिस्थितो रामः समानीयाश्रम प्रभु ॥१॥ प्राह त्वा पाठयिष्यामि गुरुं मा विद्धि धर्मत' । भृगु वंश समुत्पन्न जामदग्न्य महाप्रभुम् ॥२॥ वेद वेदाङ्ग तत्वज्ञ धनुर्वेद विशारदम् । कृत्वा निःक्षत्रिया पृथिवी दत्वा विप्राय दक्षिणाम् ॥३॥ महेन्द्राद्रौ तपस्तत्तु मागतोऽहद्विजात्मज । त्व पठात्र निज वेद यच्चान्यच्छास्त्रमुत्तमम् ॥४॥ इति तद्वच आश्रुत्य सप्रहृष्टतनूरूह । कल्कि. पुरो नमस्कृत्य वेदाधीतो ततोऽभवत् ॥५॥ सूतजी बोले — भगवान् कल्कि को गुरुकुल वास के लिए जाते देख कर महेन्द्र पर्वत निवासी परशुराम उन्हे अपने आश्रम मे ले गये ।१। वहाँ पहुँच कर परशुराम ने उनसे कहा—मैं भृगु वंश मे उत्पन्न, महर्षि जमदग्नि का पुत्र, वेद-वेदांग के तत्व की जानने वाला, धनुर्वेद-विद्या- विशारद परशुराम हूँ ।२। मैंने इस पृथिवी को क्षत्रिय-विहीन करके ब्राह्मणो को दक्षिणा स्वरूप दे डाली थी । अब तुम मुझे धर्म पूर्वक गुरु मानो, मैं तुमको शिक्षा दूँगा । हे द्विजात्मज ! मैं इस महेन्द्र पर्वत पर तपस्या करने के लिए आया हूँ, तुम यहाँ अपना वेदाध्ययन करो तथा अन्य जो भी कोई शास्त्र पढना चाहो, उसे पढो ।३-४। यह सुन कर भगवान् कल्कि ने आनन्द से गद्गद् होकर परशुराम को प्रणाम किया और फिर वेदाध्ययन करने लगे ।५। २७३