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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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२७४ ] [ कल्कि पुराण साङ्गं चतुःषष्टिकलां धनुर्वेदादिकञ्च यत् । समधीत्य जामदग्न्यात्कल्किः प्राह कृताञ्जलिः ॥६॥ दक्षिणां प्रार्थय विभो ! या देया तव सन्निधौ । ययामे सर्वसिद्धिः स्याद्या स्यात्तव तोषकारिणी ॥७॥ ब्रह्मणा प्रार्थितो भूमन् ! कलिनिग्रहकारणात् । विष्णुः सर्व्वाश्रयः पूर्णः स जातः सम्भले भवान् ॥८॥ मत्तो विद्यां शिवाद्शस्त्रं लब्ध्वा वेदमयं शुकम् । सिंहले च प्रियां पद्मा धर्मान्संस्थापयिष्यसि । ६॥ जब भगवान् कल्कि चौंसठ कलाएं और सम्पूर्ण धनुर्वेद का ज्ञान प्राप्त कर चुके तब उन्होंने हाथ जोड कर परशुराम से कहा- ।६। हे विभो ! जिस दक्षिणा के देने से मुझे सर्वसिद्धि की प्राप्ति होगी और जिस दक्षिणा की प्राप्ति से आप संतुष्ट हो सकेंगे, वह दक्षिणा मुझे बताने की कृपा करिये ।७। परशुराम बोले-- हे भूमन् ! कलिकाल का नाश करने के लिए ब्रह्माजी ने जिन भगवान् श्री हरि से निवेदन किया था, वे ही आप भगवान् विष्णु शम्भल ग्राम मे अवतरित हुए हैं ।८ और मुझसे विद्या, भगवान् शंकर से शस्त्र और वेदमय शुक तथा सिंहल देश से अपनी पत्नी पद्मा को प्राप्त करके भूमण्डल पर धर्म की स्थापना करेंगे ।६। ततो दिग्विजयेभूपान् धर्महीनान् कलिप्रियान् । निगृह्य बौद्धांन् देवापिं मरुञ्च स्थापयिष्यसि ।१०। वयमेतैस्तु संतुष्टाः साधुकृत्यैः सदक्षिणाः । यज्ञं दानं तपः कर्म करिष्यामो यथोचितम् ।११। इत्येतद्वचनं श्रुत्वा नमस्कृत्य मुनिं गुरुम् । बिल्वोदकेश्वरं देवं गत्वा तुष्टाव शंकरम् ।१२। पूजयित्वा यथान्याय शिवं शान्तं महेश्वरम् । प्रणिपत्याशुतोषं तं ध्यात्वा प्राह हृदिस्थितम् ।१३।

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