कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextचतुर्थ-अध्याय 1 ततः कल्कि सभा मध्ये राजामानो रवियथा । बभाषे तं नृप धर्म-मयो धर्मान् द्विज प्रियान् ।१। कालेन ब्रह्मणो नाशे प्रलये मयि सङ्गताः । अहमेवासमेवाग्रे नान्यत् कार्यमिदं मम ।२। प्रसुप्तलोकतन्त्रस्य द्वैतहीनस्य चात्मन । महानिशान्ते रन्तु मे समुद्भूतो विराट् प्रभुः ।३। सहस्रशीर्षा पुरुषा सहस्राक्षः सहस्रपात् । तदङ्गजोऽभवद्ब्रह्मा वेदवक्रो महाप्रभुः ।४। सूतजी बोले मुनीश्वरो ! उस समय सभा के मध्य मे भगवान् कल्कि सूर्य के समान विराजमान होकर विशङ्खयूप नरेश के प्रति धर्म- प्रसङ्ग कहने लगे ।१। कल्कि बोले—कालान्तर मे जब यह ब्रह्माण्ड नाश को प्राप्त होगा तब प्रलय होने पर मुझ मे विलोन हो जायगा । सृष्टि से पूर्व मैं ही विद्यमान था, अन्य कुछ भी नही था । इस सम्पूर्ण जगत् का कारण मैं ही हूँ ।२। सम्पूर्ण विश्व की प्रसुप्ति और द्वैतहीना- त्मिका महा रात्रि का अन्त होने पर मैं सर्वशक्ति सम्पन्न विराट्र्मूर्ति रूप मे आविर्भूत होता हूँ ।३। वह विराट्मूर्त्ति सहस्र मस्तक, सहस्र नेत्र और सहस्र चरण वाली हुई, उसी मूर्ति के अङ्ग से ब्रह्माजी उत्पन्न हुए ।४। जीवोपाधेर्ममांशाच्च प्रकृत्या मायया स्वया । ब्रह्मोपाधिः स सर्वज्ञो मम वाग्वेदशासितः ।। २८१