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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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२८२ ] [ कल्किपुराण ससर्ज जीव जातानि कालमाया शयोगतः देवा मन्वादयो लोका स प्रजापतयः प्रभुः ॥६॥ गुणिन्‍या मायायाशा मे नानोपाधौ ससजरे । सोपाधय इमे लोका देवा सस्थाणुजङ्गमाः ॥७॥ ममांशा मायया सृष्टा यतो मय्याविशन् लये । एवविधा ब्राह्मणा ये मच्छरीरा मदात्मिकाः॥८॥ मामुद्धरन्ति भुवने यज्ञाध्ययनसत्क्रियाः । मां प्रसेवन्ति शसन्ति तपोदानक्रियास्विह ॥६॥ स्मरन्त्यामोदयन्त्येव नान्ये देवादयस्तथा । ब्राह्मणा वेदवक्तारो वेदा मे मूर्तयः पराः ॥१०॥ ब्रह्म उपाधि वाले सर्वज्ञपुरुष ने मेरी वेद वाणी के शासनानुसार मेरी माया प्रकृति की शक्ति, काल और अंश के सम्मिश्रण से इस जीवो- पधारी जाति को प्रकट किया । इस प्रकार मनु आदि प्रजापतियों के सहित देवता प्रकट हुए।५-६। मेरे अंश से त्रिगुणात्मिका माया अनेक प्रकार की उपाधि धारण करके इस लोक में देवता एव स्थावर जंगम सृष्टि प्रकट करती है ।७। माया सृष्टि का रचियता मेरा अंश अन्त मे मुझ में ही लय हो जाता है । इसी प्रकार ब्राह्मण मेरे ही आत्म स्वरूप एव देह हैं ।८। क्योकि ब्राह्मण यज्ञ वेदाध्ययन आदि श्रेष्ठ कार्यों के द्वारा मेरा उद्धार तथा तप दानादि द्वारा मेरी सेवा करते हैं ।६। वेदवक्ता ब्राह्मण जिस प्रकार स्मरण द्वारा मुझे प्रसन्न करते हैं, उस प्रकार देवतादि अन्य कोई भी मुझे प्रसन्न नहीं करते, क्योकि वेद ही मेरी परम मूर्ति है ।१०। तस्मादिमे ब्राह्मणाजास्तै पुष्टस्त्रिजगज्जनाः । जगन्तिमे शरीराणि तत्पोषे ब्रह्मणो वरः ॥११॥ तेनाहं तान्ममस्यामि शुद्धसत्वगुणाश्रयः। ततो जगन्मय पूर्वं मां सेवन्तेऽखिलाश्रयाः ॥१२॥